सिद्धमकरध्वज 2ग्रा
पुष्पधन्वा रस। 10 ग्रा.
लक्ष्मी विलास रस 1 ग्रा
अभ्रक भष्म (शतपुटी) 2.5 ग्रा
अश्वगंधा चूर्ण। 2 ग्रा.
---------------------------------
1*2 मख्खन व मिश्री के साथ ।
केप . एडिझुआ 1----1
केप, सिमेंटो। 1----1
दूध के साथ
सी. अश्वगंधारिष्ट
क्रौंच पाक
शुक्रवार, 5 अप्रैल 2019
शुक्राणु अल्पता/Increase sperm count
मंगलवार, 2 अप्रैल 2019
ग्लुकोमा
आमलकी रसायन100ग्राम,
सप्तामृत लौह10ग्राम,
पुनर्नवादि मंडूर10ग्राम
आधा आधा चम्मच गिलोय स्वरस के साथ भोजन से पहले
भृंगराज आसव 4 -4चम्मच भोजन के बाद
प्रातः गर्दन को गोल गोल गुमवाये।
दवा चिकित्सकीय देखरेख मे ले
नेत्र ज्योति बढाने के लीये योग
सप्तामृत लौह 500 mg+शहद एक चम्मच+गौ घृत एक चम्मच दिन में 2 बजे रात को 9 बजे।तीन महीने तक या छ माह तक।
या
स्वर्ण बसन्त मालती 125mg
सप्तामृतलोह 500"
प्रवालपिष्टी 125"
त्रिफला चुर्ण 2gr
गिलोय सत्व 250mg
------------------------------------
एकमात्रा /
प्रात: सायं
मधु एवं गोघृत के अनुपान से।
सहपान--बादाम केशर युक्त गौदुग्ध। छ: माह तक
या
भृंगराज चूर्ण100ग्राम,
काले तिल100ग्राम
सप्तामृत लौह10ग्राम,
आधा आधा चम्मच दूध से
दवा चिकित्सकीय देखरेख मे ले
सोमवार, 1 अप्रैल 2019
आयुर्वेद दोहे
1.
सोंठ शतावर और असगंधा
ठीक करे दुखते कन्धा
बूढ़ा लेवे तो जवानी आवे ।
जवान लेवे तो थकान जावे ।।।
2.
सोंठ शतावर और असगन्ध:
गून्द बिदाम विदारीकन्द :
घी मिश्री मिलाओ चन्द :
दारुण रोग का काटे फंद :::::::
3.
नीम हमारी घर की शोभा
जामुन से बचपन की यारी
आक धतूरा और कांटेली
पुनर्नवा पहचान हमारी
4.
तुलसी हरिद्रा मधू मधुर
त्रिफ्ला त्रि कटु गिलोय
वात पित्त कफ सब सधै
ईन्हे लेत सुख होय।।।
5.
गोजिह्वा बन्फसा ख्त्मी लिसोडा
बाजार से लाओ थोडा थोडा
उबालकर पीजिए सुबह और शाम
काहे की खांसी काहे का जुकाम।।।
जय धन्वतरि भगवान
सोमवार, 17 दिसंबर 2018
Urine incontinence/ मूत्र असंयतता in female , age 55-60
पुष्यानुग चूर्ण100ग्राम, कुकुटाण्ड त्वक भस्म10ग्राम, त्रिवंग भस्म5ग्राम, चंद्रप्रभा वटी10ग्राम, लोध्रासव 4-4चम्मच, ब्रह्म रसायन1चम्मच रात को दूध से।
weaknesses
धातु पौष्टिक चूर्ण 100 ग्राम
रजत भस्म 2 ग्राम
मल सिंदूर 2 ग्राम
त्रिवंग भस्म 5 ग्राम आधा-आधा चम्मच सुबह शाम
शक्ति रसायन एक चम्मच सुबह शाम
बदाम पाक एक चम्मच रात को दूध से
रविवार, 9 दिसंबर 2018
Tonsillitis ( टांसिलाईटिस
टंकण भस्म -5gm
गोदंती भस्म -5gm
फिटकरी भस्म सफेद -5 gm
महालक्षमी विलास रस गोल्ड -5gm
त्रिभुवनकीर्ति रस- 5 gm
पुनर्नवादि मंडूर -5gm
अरोग्यावर्धनी वटी -5gm
खदिरादि वटी -5gm
सबको कसकर घुटाई करके 60बराबर मात्रा की पुड़िया बना लें । सुबह-शाम शहद ,पान के रस से चाटकर , गर्म पानी पीएं ।
चुल्ले की मिट्टी 100ग्राम
काली मिर्च 100ग्राम
सेधा नमक 100 ग्राम
हल्दी 25ग्राम
चारों को बारीक करके कपड़े से छान लें ।
माचिस की तीली से मसाला उतारकर रूई लपेटकर , रूई को पानी से या सरसों के तैल से गीला करलें , फिर इस मिश्रण को रूई पर लगाकर टांसिल पर लगाएं । दिन में दो- तीन बार ।
पानी में सेंधा नमक , मीठा सोड़ा , टंकण भस्म , स्फटिका भस्म मिलाकर गरारे करें ।
नुस्खा:-
शहद , तुलसी के 5पत्तों का रस ,पान के पत्ते का रस , अदरक का रस मिलाकर दिन में दो तीन बार चाटें ।
रविवार, 2 दिसंबर 2018
बारबार यूरिन आता
अश्वगंधा चूर्ण100ग्राम, शुद्ध शिलाजीत10ग्राम, त्रिवंग भस्म5ग्राम,आधा आधा चम्मच, हल्दी व केसर मिले दूध से दें, प्रातः काले तिल व गुड़ का सेवन करवाएं सर।
शनिवार, 27 अक्टूबर 2018
गुरुवार, 25 अक्टूबर 2018
रविवार, 6 मई 2018
अमलतास
इसका संस्कृत साहित्य में एक नाम "कर्णिकार" भी है और महाकवि कालिदास ने इसकी शोभा का वर्णन इस तरह किया है, अन्य ने भी :--
"समदमधुभराणां कोकिलानां च नादै: कुसुमितसहकारै: कर्णिकारैश्च रम्य: | इषुभिरिव सुतीक्ष्णैर्मानस मानिनीनां तदुति कुसुममासो मनमथोद्वेजनाय|| ऋतुसहार ||
"वर्ण प्रकर्षे सति कर्णिकारं दुनोति निर्गन्धतया स्म चेत: || कुमारसंभव||
"अशोटनिर्भर्स्तिपद्मरागमाकृष्टहेमद्युतिकर्णिकारम् | मुक्ताकलापीकृतसिन्धुवारं वसन्त पुष्पाभरणं वहन्ती || कुमारसंभव||
🍂आनन्दराय ने अपने जीवानन्दनम् नामक नाटक में :--
"कृतमाले टिट्टिभको रसालवृक्षे कोकिला वसति | नीपविटपे शिखण्डी जम्बूशिखरे शुक एक:||
🌷🙏इनका अर्थ- भावार्थ आचार्य वर सुधाकर जी शर्मा करें🌹
🌷आरग्वध🌷
अमलतास का संस्कृत में सबसे अधिक प्रचलित नाम आरग्वध है, इस शब्द की व्युत्पत्ति इस प्रकार बताई है:--"आ समन्तात् रुजं बधति (छिन्नति) इति *वा* आरगं रोगशंकां वधतीति आरग्वध: ||"
यानि रोगों को नष्ट करने वाला होने से इसका नाम आरग्वध है |
🍂प्राकृतिक वर्गीकरण में यह शिम्बीकुल ( लेग्युमिनोसी) की वनोषधि है | इस कुल में फल सेम की आकृतिसम होते हैं | इस Leguminoseae कुल के तीन उपकुल हैं :--
1. अपराजित उपकुल.
2. पूतिकरंज उपकुल.
3. बब्बूल उपकुल.
इनमें किरमालो पूतिकरंज उपकुल Caesalpiniidae नामक उपकुल की 12 औषधियों में से एक है |
🍂भा.प्र.कार ने हरीतक्यादि वर्ग तथा महर्षि चरकेण तिक्तस्कंध तथा सुश्रुत ने आरग्वधादिगण एवं श्यामादिगण में इसे अधोभागदोषहर कहकर निरुपित किया है तथा व्याधिघात कहा है|
: 🌷अमलतास के संस्कृत नाम और उनकी निरुक्ति:--
आरग्वध:--- "आ समन्तात् रग्यते शंक्यते इति आरक्। आरगं रोगशंकामपि हन्ति इति| यह रोग की शंका मात्र को नष्ट करता है|
"आ रगणम् इति अपि, "रगे शंकायाम्" इस प्रकार भी निरुक्ति की जाती है |
"आ समन्तात् रुजं वधति छिनत्ति इति |" यह चारों तरफ से रोग या वेदना मात्र का नाश करता है|
🍂राजवृक्ष:--
"राजा चासौ वृक्षश्चेति| वृक्षाणां राजा इति वा |
यह वृक्षों में राजा के सम है, क्योंकि इसके पुष्प अतिशय शोभादायी होते हैं |
"रोगाणां राजानं वृश्चति इति वा| रोगराजं वृश्चतीति वा | यह रोगों के राजा ( बिबंध) को नष्ट करता है |
प्राचीन समय में यह राजपथ पर दोनों तरफ लगाया जाने से भी राजवृक्ष कहा जाता है |
🍂सम्पाक:--
"सम्यक् पाको$स्य इति |" शं कल्याणं पाको$स्य इति वा (शम्पाक:)| इसके प्रयोग से दोषमात्र का पचन शीघ्र तथा सम्यक.होता.है |
🍂शम्याक् :-- शमीं शिम्बीम् अकति इति शम्याक: |"
आरेवत:--
"आ रेवयति नि:सारयति मलं सारकत्वात् इति |" यह रेचक एवं सारक होने से मल को भलीभाँति बाहर निकालता है |
"अरेवती रोगदेवता| अरेवत्यां भव: इति आरेवत: | आरेवते ज्वरो$नेन वा इति आरेवत: | यह अरेवती नामक रोगदेवता के नाश के लिए उत्पन्न होता है |
अथवा इससे ज्वर यानि रोगमात्र का नाश होता है |
🍂कृतमाल:-- कृता माला$स्य पुष्पै: इति | इसके सोने के रंग जैसे फूलों से मालाएँ बनायी जाती हैं , जो बहुत सुन्दर लगती हैं |
🍂सुवर्णक:-- स्वर्णसम सुन्दर वर्ण पुष्प तथा ( सुपर्णक- पाठान्तर ) इसके नवीन पत्र सुन्दर होने के कारण | यानि यह वृक्ष सुदर्शनीय होता है |
🍂आरोग्यशिम्बी :-- इसकी फली का गूदा आरोग्य संरक्षण में उत्तम.है ( गुजराती- गरमालानो गोल )||
🍂द्रुमोत्पल :--
इसके पुष्प कमल सम शोभायमान होते है, सपुष्प होने पर यह द्रुमों में उत्पल सम शोभित होता है |
🍂परिव्याध:-- यह रोगों को चारों तरफ से ताडन करके बाहर निकालता है |
🍂कर्णिकार:-- प्रभूत मात्रा में पुष्प कलिकाएँ आती हैं, जो पूरे वृक्ष को आच्छादित कर लेती हैं |
🌹अन्य नाम:--
व्याधिघात, दीर्घफल, चतुरंगुल, प्रग्रह |
🍂 अमलतास, किरमालो, गरमालो आदि.
महाराष्ट्र- बाहवा| पंजाबी- गिर्दनली| मालवी- किरमाल, गिरमाल |.
Cassia fistula.
अंग्रेजी- Purging Cassia.
🍂पंक्तिपत्रो महाशिम्बी विटपी राजपादप:| महाजम्बूपत्रसदृक्पत्रश्च गिरिवासि च || शिवदत्त: ||
कैंसर में प्रयोग का तो पता नहीं |लेकिन यह परम स्रंसन द्रव्य ( फली का गूदा) है |
🍂 जो किशोर- किशोरी रात में सोते हुए दांत किटकिटाते हों या दांत पीसते हों या अचानक जिनकी निद्रा भंग हो जाती हो या भयज स्वप्न देखते हों तथा नींद उचटकर भयभीत से हो जातेहों :--
एसे रोगियों के सिरहाने बिस्तर के नीचे गिर्दनली की पकी तथा सूखी फली रख दें | कुछ दिन में ठीक हो जाएगा | ठीक होने की रफ्तार मंद हो तो, फली बदलते रहें ||
कैंसर के रोगी के तीन लक्षण शूल,विबंध, ज्वर आरग्वध से एक साथ शमन हो रहे हैं।लेखन भी है, कार्य कर सकता है।
✔🌹यानि यह एक सहायक ओषध सिद्ध है | इसके गुणधर्म विवेचन में तथा इसके स्रंसन गुणधर्म की अभिव्यंजना के समय यह सिद्ध हो जाएगा | यूँतो इसे विषहर भी माना है और विभिन्न अगद योगों में भी यह.घटक है|
काम करेगा सर🌷🙏
फलियां बदलते रहना एक एक सप्ताह से और देव धनत्तर तथा ओषधियों के राजा चन्द्रमा तथा ओषधि को प्रणाम कर, सिरहाने रख लें | डॉ हरिओम जी ,हमने जब से होश आया है , खाट के अंदर अमलतास की फली लगी देखी है
माताजी का पीहर थानागाजी ,सरिस्का के जंगल के पास था , किसी वैद्य जी द्वारा बताया गया होगा ।।
इसी कारण हमारा भी भला हो गया ।।। इसलिए तो इसका नाम व्याधिघात और आरग्वध है|
यह ओषधि कुछ दिव्यता भी रखती है | यानि इसके कुछ कार्मुकताएँ प्रभाव जन्य हैं |: श्रीराम जी अपने क्षेत्र में तो पहले लगभग सभी चारपाइयों में इसकी फली लगाते थे: इसको बालग्रह के शमन में समर्थकारी ओषधि के रुप में ग्रामीण जन मानता है | पूतना, अन्धपूतनादि बालग्रहों के दुष्प्रभाव की शामक मानी जाती है गिर्दनली🌷🙏
🌷महर्षि चरक ने अमलतास को तिक्तस्कंध में वर्णित करते कुष्ठघ्न, कण्डूघ्न होने के साथ विरेचन निरुपित किया है |
🌷 महर्षि सुश्रुत ने अधोभागदोषहर बताकर विरेचन द्रव्यों में श्रेष्ठ माना है |
🍂 विरेचक दो प्रकार के होते हैं:-- सामान्य और तीव्र |
🍂पुनश्च सामान्य विरेचन के अनुलोमन एवं स्रंसन दो उपभेद होते हैं |
🌹स्रंसन द्रव्यों में आरग्वध का मुकाबला नहीं है, सुश्रुत इसे सर्वश्रेष्ठ मान रहे हैं|
🍂शारंगधर द्वारा स्रंसन की परिभाषा भी देखिए:--
"पक्तव्यं यदपक्त्वैव श्लिष्ठं कोष्ठे मलादिकम् | नयत्यध: स्रंसनं तद यथा स्यात् कृतमालकम् ||
🍂यानि अरावली की रणथम्बोर की उपत्यकाओं में प्रयोगेण शारंगधर आचार्य ने भी यही पाया, जो चरकादि ने पाया, हो उदाहरण भी कृतमाल ( अमलतास) का ही दिया है |
सुतरां जहाँ मृदुविरेचन आवश्यक समझें वहां इस व्याधिघात का ही प्रयोग प्रशस्त है|
🌹सुश्रुत आरग्वधादि तथा श्यामादिगण में परिगणन करते हुए कह रहे हैं कि आरग्वधादि गण कफ व विष का हारक है तथा प्रमेह, कुष्ठ, ज्वर, वमन और कण्डू नाशक है |
श्यामादिगण गुल्म, विष, आनाह तथा उदररोग नाशक है |
सियार लाठी भी कहते ह
: ✔🌹
राजस्थान में धनबहेडा भी |
अरबी-- खियारशंबर.
फारसी - खियार चंवर.
सिन्धी - छिमकणी.
बंगला- सोंदाल.
तामिल- इराद्यविरुट्टम् | अमलतास:- एक जाती विशेष में शादी के समय दुल्हन को गले में पहनायी जाती है जिसे बड़ा गहना कहा जाता है।
जो बच्चे बिस्तर पर पेशाब करते हैं उनके सिरहाने अमलतास की फली रख देने से प्रभाव मात्र से लाभ होता है🌷राजेशजी सर बात तो बढिया पूछत भये आप😄
लेकिन इन कारणों की गवेषणा शेष हैं |
🙏और फिर सुनो ना ! इस आरेवत ( अमलतास) की ही बात नहीं है केवल, एसी बहुत सारी वनोषधियों हैं जिनके प्रभाव अदभुद् है तथा निघण्टुओं में एवं सहिताओं में उन कार्मुकताओं को प्रभावजन्य घोषित कर दिया है|
🌷लेकिन जैसे आप उन कारणों को जानना चाहते हैं यानि कार्मुकता के आधारों को जानने की लालायित हैं, वैसे ही हर कोई जानने को उत्सुक होगा 🌷
क्योंकि विग्यान के प्रकटीकरण यानि प्रयोग की आधारभूमि को जानना ही गवेषणा है |
और यह काम आयुर्वेद में बाकी है और जब यह काम हो जाएगा, तब, जनमानस भी आयुर्वेद को ग्राह्य मान लेगा🙏🌷
: 🌷अमलतास:--
उपयोगी अंग-- फली की मज्जा, मूल त्वक, पुष्प- पत्र |
छाल से *सुमारी* नामक रस निकारकर चमडा रगा जाता है, पहले छाल को पानी में सडाकर रेशा निकाले जाते थे, जिनकी रस्सी बनाई जाती थी | इसके तने से एक लाल रंग का रस भी निकलता है, जो ब्रह्मवृक्ष पलाश के गोंद जैसा जम जाता है |
🌷भेद :-- यद्यपि निघण्टुओं में इसके भेद नहीं मिलते हैं, लेकिन विद्वत जन ने *कर्णिकार* को हृस्व अमलतास माना है |
जिसे बगला में छोटा.सोनालुगाछ, मराठी में लघु बाहवा, तेलगु में किरुगक्के कहते है, फलियां छोटी होती.हैं
🍂श्रीकृष्णप्रसाद त्रिवेदी के अनुसार *राजनिघण्टु* का कर्णिकार लघु अमलतास है | यह मध्य प्रदेश में पाया जाता है | देखिए राजनिघण्टु:--
"कर्णिकार: सरस्तिक्त: कटूष्ण: कफशूलहा | उदरकृमिमेहघ्नो व्रणगुल्महरो नृप ||
🌹वैसे अमलतास को :-
रस में मधुर, तिक्त|
गुण:-- गुरु, मृदु, स्निग्ध|
वीर्य- शीत |
विपाक- मधुर|
दोषकर्म- वातपित्तनाशक| यह मधुर और स्निग्ध होने से वायु तथा शीत होने से पित्तशामक| रेचन ( स्रंसन- श्लिष्ठ मल निष्कासन) होने से कोष्ठगत पित्त और कफ का भी संशोधक है | पित्ते तु विरेचनम्- तो कहा ही है |
🌵अधिक प्रयोग से मरोड व कुंथन ( प्रवाहण) जनक है|
क्वाथ करने से फलमज्जा की शक्ति कम होती है , अत हिम या फाण्ट प्रयोग हितकर है |
🌷दुष्प्रभाव निवारक:-- मस्तगी, अनीसून और स्नेह | 🌷महर्षि चरक ने अमलतास को तिक्तस्कंध में वर्णित करते कुष्ठघ्न, कण्डूघ्न होने के साथ विरेचन निरुपित किया है |
🌷 महर्षि सुश्रुत ने अधोभागदोषहर बताकर विरेचन द्रव्यों में श्रेष्ठ माना है |
🍂 विरेचक दो प्रकार के होते हैं:-- सामान्य और तीव्र |
🍂पुनश्च सामान्य विरेचन के अनुलोमन एवं स्रंसन दो उपभेद होते हैं |
🌹स्रंसन द्रव्यों में आरग्वध का मुकाबला नहीं है, सुश्रुत इसे सर्वश्रेष्ठ मान रहे हैं|
🍂शारंगधर द्वारा स्रंसन की परिभाषा भी देखिए:--
"पक्तव्यं यदपक्त्वैव श्लिष्ठं कोष्ठे मलादिकम् | नयत्यध: स्रंसनं तद यथा स्यात् कृतमालकम् ||
🍂यानि अरावली की रणथम्बोर की उपत्यकाओं में प्रयोगेण शारंगधर आचार्य ने भी यही पाया, जो चरकादि ने पाया, हो उदाहरण भी कृतमाल ( अमलतास) का ही दिया है |
सुतरां जहाँ मृदुविरेचन आवश्यक समझें वहां इस व्याधिघात का ही प्रयोग प्रशस्त है|
🌹सुश्रुत आरग्वधादि तथा श्यामादिगण में परिगणन करते हुए कह रहे हैं कि आरग्वधादि गण कफ व विष का हारक है तथा प्रमेह, कुष्ठ, ज्वर, वमन और कण्डू नाशक है |
श्यामादिगण गुल्म, विष, आनाह तथा उदररोग नाशक है |
रविवार, 22 अप्रैल 2018
मधुमेह,मुखपाक,कब्ज
1.
मधुमेह नाशक चूर्ण 100gm
त्रिफला चूर्ण 50 gm
त्रिवंग भस्म 5gm
सुतशेखर रस 10gm
2.
गुड़मार अर्क (2-2चम्मच खाने से पहले)
3.
स्फटिक भस्म। (10gm 1 लीटर पानी कुल्ला दिन में दो बार)
4.
तरुणिकुसुमाकर चूर्ण (5gm रात को )
शनिवार, 21 अप्रैल 2018
कुक्कर कास
स्फटिक भस्म60mg,
अभ्रक भस्म60mg,
गोदन्ती भस्म60mg मिलाकर
सिरप कुक्कर कास प्रहार रस 1-1चम्मच के साथ दें।
गर्म पानी में1-1चम्मच शहद दिन में दो बार दें।
सोमवार, 12 जून 2017
दद्रु कुष्ट/फंगल डिसीज
दद्रु दावानल
+
जिंक आँक्साइड
+
जात्यादितैल
स्थानिक लेप
रसमाणिक्य। 125mg
गंधक रसायन250mg
त्रिफलाचूर्ण 1gm
शुक्ति भष्म। 250mg
______________--____
1×2
स्थानिक अलाबू चिकित्सा आवश्यक ।
यदि दद्रु कुष्ट/फंगल डिसीज में शरीर से ढकी जगहो पर है तो वस्त्र को गर्म पनी मे धो कर धूप मे पुरा दिन सुखने दे ,उल्टे करके पुनः सुखावे । सम्भव हो तो गर्म प्रेस करावे । फंगस कपडो से भी निकालना आवश्यक है । वरना रोग की पुनरावृत्ति होगी।
बुधवार, 17 मई 2017
अतिस ---- औषधीय प्रयोग और स्वास्थ्य लाभ
बच्चो के पाचन संस्थान एवं श्वसन संस्थान की यह एक उत्तम औषधि है , जो हिमालय क्षेत्र में पायी जाती है | इसका क्षुप 1 से 3 फुट ऊँचा सीधा शाखाओ से युक्त होता है | इस वनौषधि का ज्ञान हमारे आयुर्वेदाचार्यो को प्राचीन समय से ही था , प्राय सभी रोगों को हरने वाली इस औषधि को शास्त्रों में विश्वा या अतिविश्वाके नाम से उल्लेखित किया गया है | इसकी विशेषता यह है की यह विष वर्ग वत्सनाभ के कुल की होने के बाद भी विषैली नहीं है एवं इसका सेवन मनुष्य को चारो तरफ से स्वास्थ्य लाभ देता है | अतिस के पत्र 2 से 4 इंच लम्बे होते है जो उपर से लट्वाकर होते है , इसके पुष्प हरिताभ नील वर्ण के एवं चमकीले होते है जो मंजरी के रूप में लगते है | अतिस के फल गोल होते है और 5 कोशो वाले होते है जिनमे बीज उपस्थित रहते है |
अतिस का मूल ही मुख्य रूप से औषध उपयोग में लिया जाता है , जो की दो कंदों के रूप में होता है | इसमें
से एक कंद पिछले वर्ष का और दूसरा कंद इसी वर्ष का होता है | अतिस का ताजा कंद 1 से 1.5 इंच लम्बा और .5 इंच मोटा होता है | इसकी कंद का वर्ण ऊपर से धूसर एवं तोड़ने पर सफ़ेद रंग का और अन्दर काली बिंदियो से युक्त होता है |
अतिस के पर्याय
संस्कृत - अतिविषा , विश्वा, घुन्बल्ल्भ, श्रंगी , शुक्लकंदा , भंगुरा, घुणप्रिय , काश्मीरा |
हिंदी - अतिस
मराठी - अतिविष
बंगला - आतिच
गुजराती - अतिवखनी, कली, वखमी, अतिवस, अतिविषा
पंजाबी - अतिस, सुखी हरी, चितिजड़ी, पत्रिश, बोंगा
लेटिन - Aconitum Heterophyllum
अतिस का रासायनिक संगठन
अतिस के मूल में अतिसिन ( Atisine ), हेटेरेतेसैन (Heteratisine) , एतिदीन (Atidine), हेतिदीन (Hetidine), हेतेरोफ्य्ल्लिसिने (Heterophyllisine) , आइसोएतिसिन (Isotisine) , स्टार्च और तिक्त क्षार आदि मौजूद होते है |
अतिस के गुणकर्म और रोगप्रभाव
अतिस दीपन , पाचन, ग्राही, ज्वरातिसरनाशक , क्रमिघ्न, कास नाशक, एवं अर्शोघ्न, बालको के छर्दी , कास आदि रोगों में विशेष लाभकारी है | अतिस की मूल वाजीकारक, पाचक, ज्वार्घन, कटु, बलकारक, कफशामक, अमाशयक्रिया वर्धक , अर्श, रक्तस्राव , शोथ और सामान्य दुर्बलता में लाभकारी है |
अतिस का औषधीय प्रयोग और स्वास्थ्य लाभ
1. श्वास - कास
⇒श्वास-कास में 5 ग्राम अतिस मूल के चूर्ण को 2 चम्मच शहद के साथ मिलाकर चाटने से खांसी में आराम मिलता है एवं कफ शरीर से निकलता है
⇒अतिस चूर्ण 2 ग्राम के साथ पुष्कर मूल चूर्ण 1 ग्राम मिला ले और इसे शहद के साथ सुबह शाम चाटें | श्वास - कास रोग में तुरंत आराम मिलेगा |
⇒अस्थमा आदि में अतिस चूर्ण , नागरमोथा, कर्कटश्रंगी तथा यवक्षार इन सभी को सामान मात्रा में लेकर इनको 2 से 3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सेवन करे | अस्थमा या दमा रोग में यह बेहद कारगर है |
2. बालरोग
⇒अतिस की मूल को पिसकर चूर्ण बनाले और इसे शीशी में भरकर रखे | बालको के सभी रोग जैसे - उदरशूल,ज्वर, अतिसार आदि में 250 से 500 mg शहद के साथ दिन में दो या तीन बार चटाए |
⇒अतिसार ( दस्त ) और आमातिसार में 2 ग्राम अतिस चूर्ण देकर , 8 घंटे तक पानी में भिगोई हुई 2 ग्राम सोंठ को पीसकर पिलाने से लाभ होता है |इसका प्रयोग तब तक करे जब तक अतिसार बंद ना हो जावे |
⇒अगर बच्चो के पेट में कीड़े हो तो 2 ग्राम अतिस और 2 ग्राम वायविडंग का चूर्ण लेकर शहद के साथ बचो को चटाने से पेट के कीड़े नष्ट होजाते है |
3. उदर रोग में अतिस का प्रयोग
⇒वमन में 1 ग्राम अतिस चूर्ण और 2 ग्राम नागकेशर चूर्ण को मिलकर सेवन करने से वमन जल्दी ही रुक जाता है |
⇒पाचन शक्ति कमजोर हो तो 2 ग्राम अतिस चूर्ण के साथ 1 ग्राम सोंठ का चूर्ण या 1 ग्राम पिप्पली का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चाटने से पाचन शक्ति मजबूत बनती है एवं पाचन से सम्बंधित सभी रोगों में लाभ मिलता है |
⇒रक्तपित की समस्या में 3 ग्राम अतिस चूर्ण के साथ 3 ग्राम इन्द्र्जौ की छाल का चूर्ण मिळाले और इसे शहद के साथ सुबह- शाम चाटें | रक्तपित की समस्या के साथ साथ अतिसार में भी तुरंत लाभ मिलेगा |
⇒गृहणी रोग में अतिस, सोंठ और नागरमोथा को मिलकर इनका क्वाथ तैयार करले | इसका सेवन सुबह- शाम गुनगुने जल के साथ करे | इससे गृहणी रोग में आम दोष का पाचन होता है |
⇒मन्दाग्नि में अतिस, सोंठ, गिलोय और नागरमोथा को सामान मात्रा में लेकर इनका काढ़ा बनाले | इसके सेवन से भूख खुलकर लगती है एवं पाचन क्रिया में सुधर होता है |
⇒अतिस के 2 ग्राम चूर्ण को हरेड के मुरबे के साथ खाने से अमातिसर में लाभ मिलता है |
4. अन्य रोगों में अतिस का घरेलु उपयोग
⇒अर्श रोग में अतिस के साथ राल और कपूर मिलकर , धुंवा देने से रक्तार्श में फायदा मिलता है |
⇒शरीर या यौन दुर्बलता में अतिस के 2 ग्राम चूर्ण के साथ इलाइची और वंस्लोचन को मिलाकर , मिश्री युक्त दूध के साथ सेवन करने से शरीर में बल बढ़ता है एवं यौन कमजोरी भी जाती रहती है |
⇒ज्वर् रोग में अतिस के 1 ग्राम चूर्ण को गरम पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से जल्दी ही बुखार उतर जाता है |
⇒विषम ज्वर में अतिस के 1 ग्राम चूर्ण के साथ कुनैन मिलाकर दिन में तीन या चार बार सेवन करवाने से विषम ज्वर में जल्दी ही आराम आता है |
⇒यौन शक्ति की वर्द्धि के लिए अतिस चूर्ण 5 ग्राम को शक्कर या दूध के साथ सेवन करे | इससे जल्दी ही यौन शक्ति में इजाफा होता है |
















