शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

आयुर्वेदिक औषद्धियों

जानिए अपनी कुछ आयुर्वेदिक औषद्धियों के बारे में जो शरीर की विभिन्न व्यवस्थाओ को शक्ति प्रदान करती है :-
1........चंद्रप्रभा वटी :-
आयुर्वेद में इसके उपयोग बहुत विस्तार से दिये गयें हैं। यह मूत्र रोगों पर और यौन रोगों पर विशेष असर दिखाती है। बार बार पेशाब आना, पेशाब में शक्कर का जाना, स्त्री को सफ़ेद पानी का जाना, मासिक धर्म की अनियमितताए, पुरुषों को पेशाब में धातु जाने की समस्या, पेशाब में जलन होना ऐसे अनेक विकारो पर यह दवा काम करती है।
यह स्नायु और हड्डी को भी मजबूती प्रदान करती है। इसलिए इसका प्रयोग कमजोरी में भी करते है।
इसकी 1-1 गोली सुबह शाम नाश्ते या भोजन के बाद पानी से ले। इसे शहद या दूध से भी ले सकते है।
2.......... योगराज गुग्गुल :-
इस दवा का प्रयोग स्नायुओ को मजबूती प्रदान करता है। बुढ़ापे की व्याधियो जैसे पैर की पिंडलियों में दर्द होना, घुटनों में दर्द होना वगैरह के लिए यह दवा अच्छा असर दिखाती है।
इसकी 1-1 गोली सुबह शाम नाश्ते या भोजन के बाद पानी से ले. इसे शहद से या दूध से भी ले सकते है।
3....... त्रयोदशांग गुग्गुल :-
यह वात विकारो की एक जबरदस्त दवा है। इसके प्रयोग से लकवे (पक्षाघात) में अद्भुत लाभ होता है। लकवा होने के बाद जितने जल्दी इसे प्रयोग में लाया जायेगा लाभ उतना ही जल्द होंगा। यदि लकवा होने के बाद ज्यादा समय बीत गया है तो एक लम्बे काल के लिए इस दवा का नियमित सेवन करना होगा।
सर्वाइकल स्पोंडीलायटिस में भी यह अच्छा काम करती है।
इसकी 1-1 गोली सुबह शाम नाश्ते या भोजन के बाद पानीसे ले। इसे शहद से या दूध से भी ले सकते है।
4.......... सितोपलादी चूर्ण :-
यह खांसी की एक जबरदस्त दवा है। सूखी खांसी पर इसे जादू की तरह काम करते हुए देखा गया है। एक चौथाई चम्मच चूर्ण शहद के साथ एक दिन में 3-4 बार ले सकते है।
5....... हरिद्रा खंड :-
यह खुजली की एक जबरदस्त दवा है। शीत पित्त में भी ये दवा जादू की तरह काम करती है। इसे आधा चम्मच रोजाना पानी से तीन बार ले सकते है।
6........सितोपलादि चूर्ण :-
सभी प्रकार के कास (खांसी), श्वास रोग, क्षय, राजयक्ष्मा, मुँह से खून गिरना,
साथ-साथ थोडा ज्वर रहना, जुकाम आदि मे इस चूर्ण से बहुत लाभ होता है।
एक से तीन ग्राम की मात्रा शहद या शुद्ध घी के साथ लें।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

किशमिश

किशमिश ---
1. कब्‍ज - जब किशमिश को खाई जाती है तो यह पेट में जा कर पानी को सोख लेती हैं। जिस वजह से यह फूल जाती है और कब्‍ज में राहत दिलाती है।
2. वजन बढाए- हर मेवे की तरह किशमिश भी वजन बढाने में मददगार साबित होती है क्‍योंकि इसमें फ्रकटोज़ और ग्‍लूकोज़ पाया जाता है जिससे एनर्जी मिलती है। अगर आपको भी अपना वजन बढाना है और वो भी कोलेस्‍ट्रॉल बढाए बिना तो आज से ही किशमिश खाना शुरु कर दें।
3. अम्लरक्तता- जब खून में एसिड बढ जाता है तो यह परेशानी पैदा हो जाती है। इसकी वजह से स्‍किन डिज़ीज, फोडे़, गठिया, गाउट, गुर्दे की पथरी, बाल झड़ने, हृदय रोग, ट्यूमर और यहां तक कि कैंसर होने की संभावना पैदा हो जाती है। किशमिश में अच्‍छी मात्रा में पोटैशियम और मैगनीशियम पाया जाता है जिसको खाने से अम्लरक्तता की परेशानी दूर हो जाती है।
4. एनीमिया- किशमिश में भारी मात्रा में आयरन होता है जो कि सीधे एनीमिया से लड़ने की शक्‍ति रखता है। खून को बनाने के लिये विटामिन बी कॉमप्‍लेक्‍स की जरुरत को भी यही किशमिश पूरी करती है। कॉपर भी खून में लाल रक्‍त कोशिका को बनाने का काम करता है।
5. बुखार- किशमिश में मौजूद फिनॉलिक पायथोन्‍यूट्रियंट जो कि जर्मीसाइडल, एंटी बॉयटिक और एंटी ऑक्‍सीडेंट तत्‍वों की वजह से जाने जाते हैं, बैक्‍टीरियल इंफेक्‍शन तथा वाइरल से लड़ कर बुखार को जल्‍द ठीक कर देते हैं।
6. शराब के नशे से छुटकारा- शराब पीने की इच्छा हो तब शराब की जगह 10 से 12 ग्राम किशमिश चबा-चबाकर खाते रहें या किशमिश का शरबत पियें। शराब पीने से ज्ञानतंतु सुस्त हो जाते हैं परंतु किशमिश के सेवन से शीघ्र ही पोषण मिलने से मनुष्य उत्साह, शक्ति और प्रसन्नता का अनुभव करने लगता है। यह प्रयोग प्रयत्नपूर्वक करते रहने से कुछ ही दिनों में शराब छूट जायेगी।
7. यौन दुर्बलता- इस समस्‍या के लिये रोजाना किशमिश खाएं क्‍योंकि यह कामेच्छा को प्रोत्साहित करती है। इसमें मौजूद अमीनो एसिड, यौन दुर्बलता को दूर करता है। इसीलिये तो शादी-शुदा जोडों को पहली रात दूध का गिलास दिया जाता है जिसमें किशमिश और केसर होता है।
8. हड्डी की मजबूती- किशमिश में बोरोन नामक माइक्रो न्‍यूट्रियंट पाया जाता है जो कि हड्डी को कैल्‍शियम सोखने में मदद करता है। बोरोन की वजह से ऑस्‍टियोप्रोसिस से बडी़ राहत मिलती है साथ ही किशमिश खाने से घुटनों की भी समस्‍या नहीं पैदा होती।
9. आंखों के लिये- इसमें एंटी ऑक्‍सीडेंट प्रोपर्टी पाई जाती है, जो कि आंखों की फ्री रैडिकल्‍स से लड़ने में मदद करता है। किशमिश खाने से कैटरैक, उम्र बढने की वजह से आंखों की कमजोरी, मसल्‍स डैमेज आदि नहीं होता। इसमें विटामिन ए, ए-बीटा कैरोटीन और ए-कैरोटीनॉइड आदि होता है, जो कि आंखों के लिये अच्‍छा होता है।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

दुबलापन : कारण व उपचार

सहज कृशता :माता-पिता यदि कृश हों तो बीजदोष के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाला शिशु भी सहज रूप से कृश ही उत्पन्न होता है। गर्भावस्था में पोषण का पूर्णतः अभाव होने से अथवा गर्भवती स्त्री के किसी संक्रामक या कृशता उत्पन्न करने वाली विकृति के चलते गर्भस्थ शिशु के शारीरिक अवयवों का समुचित विकास नहीं हो पाता, जन्म के समय ऐसे शिशु कृश स्वरूप में ही जन्म लेते हैं। ऐसे कृशकाय शिशु की उचित देखभाल एवं समय पर चिकित्सा करने के बाद भी इसकी कृशता का पूर्ण रूप से निवारण नहीं होने पर अंततोगत्वा ये सहज कृशता के स्वरूप को प्राप्त कर जीवन पर्यंत उससे ग्रसित रहते हैं। निरंतर चिकित्सा लाभ लेते रहने पर ही इनका जीवित रहना संभव होता है।जन्मोत्तर कृशता :अग्निमांद्य के फलस्वरूप रस धातु की उत्पत्ति अल्प मात्रा में होने से जो धातुक्षय होता है, उसे अनुमोल क्षय तथा कुप्रवृत्ति तथा अतिमैथुन से होने वाले शुक्रक्षय के फलस्वरूप अन्य धातुओं के होने वाले क्षय को प्रतिलोम क्षय कहते हैं। दुर्घटना, आघात, वमन, अतिसार, रक्तपित्त आदि के अकस्मात होने वाला धातुक्षय तथा पंचकर्म के अत्याधिक प्रयोग से होने वाले धातुक्षय से भी अंत में कृशता उत्पन्न होती है। निष्कर्ष यह है कि किसी भी कारण से होने वाला धातुक्षय ही कृशता का जनक है। जन्मोत्तर कृशता के दो प्रकार संभव हैं-लगातार उत्पन्न कृशता :अग्निमांद्य,ज्वर, पांडु, उन्माद, श्वांस आदि व्याधियों से दीर्घ अवधि तक ग्रस्त रहने पर शरीर में लगातार कृशता उत्पन्न होती है, जो धीरे-धीरे बढ़कर अंत में अतिकृशता का रूप धारण कर लेती है। शरीर की स्वाभाविक क्रिया के फलस्वरूप वृद्धावस्था में होने वाली कृशता का भी इसमें समावेश हो जाता है।अकस्मात उत्पन्न कृशता :मधुमेह, रजक्षमा, रक्तपित्त, वमन, ग्रहणी, कैंसर आदि व्याधियों के कारण शरीर में अकस्मात कृशता उत्पन्न होती है। अवटुका ग्रंथि के अंतःस्राव की अभिवृद्धि से भी अकस्मात कृशता उत्पन्न होती है, जिसे आधुनिक चिकित्सा के अनुसार हाइपरथायरायडिज्म या थायरोढाक्सिकोसित कहते हैं।वैज्ञानिकों का यह भेद चरकोक्त जठराग्निवर्धन से समानता रखता है, क्योंकि जठराग्निवर्धन के संपूर्ण लक्षण इसमें घटित होते हैं। थायराइड नामक ग्रंथि के अंतःस्राव में वृद्धि होने पर इंसुलिन के द्वारा शरीर में दहन क्रिया अत्यंत तीव्र वेग से होने के कारण प्रथमतः रस, रक्तगत शर्करा का दहन होने से शर्करा की मात्रा न्यून होने पर शरीर में संचित स्नेहों तथा प्रोटीनों का दहन होने लगता है।इसी के परिणामस्वरूप शरीर में धातुक्षय होकर कृशता उत्पन्न होती है, इसी को भस्मक रोग की संज्ञा आयुर्वेदाचार्यों ने दी है। महर्षि चरक ने इन लक्षणों को अत्यग्नि संभव नाम दिया है।दुबलेपन से होने वाली हानियाँ :पूर्व मे जो लक्षण बताए गए हैं, वे कृश व्यक्ति में बाहर से दिखाई देने वाले हैं। इसके अतिरिक्त शरीर की आंतरिक विकृति के फलस्वरूप जो लक्षण मिलते हैं, उनमें अग्निमांद्य, चिड़चिड़ापन, मल-मूत्र का अल्प मात्रा में विसर्जन, त्वचा में रूक्षता, शीत, गर्मी तथा वर्षा को सहन करने की शक्ति नहीं होना, कार्य में अक्षमता आदि लक्षण होते हैं। कृश व्यक्ति श्वास, कास, प्लीहा, अर्श, ग्रहणी, उदर रोग, रक्तपित्त आदि में से किसी न किसी से पीड़ित होकर काल कवलित हो जाता है।चिकित्ससंतर्पण :सर्वप्रथम उसके अग्निमांद्य को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। लघु एवं शीघ्र पचने वाला संतर्पण आहार, मंथ आदि अन्य पौष्टिक पेय पदार्थ, रोगी के अनुकूल ऋतु के अनुसार फलों को देना चाहिए, जो शीघ्र पचकर शरीर का तर्पण तथा पोषण करे। रोगी की जठराग्नि का ध्यान रखते हुए दूध, घी आदि प्रयोग किया जा सकता है। कृश व्यक्ति को भरपूर नींद लेनी चाहिए, इस हेतु सुखद शय्या का प्रयोग अपेक्षित है। कृशता से पीड़ित व्यक्ति को चिंता, मैथुन एवं व्यायाम का पूर्णतः त्याग करना अनिवार्य है।पंचकर्म :कृश व्यक्ति के लिए मालिश अत्यंत उपयोगी है। पंचकर्म के अंतर्गत केवल अनुवासन वस्ति का प्रयोग करना चाहिए तथा ऋतु अनुसार वमन कर्म का प्रयोग किया जा सकता है। कृश व्यक्ति के लिए स्वदन व धूम्रपान वर्जित है। स्नेहन का प्रयोग अल्प मात्रा में किया जा सकता है।रसायन एवं वाजीकरण :कृश व्यक्ति को बल प्रदान करने तथा आयु की वृद्धि करने हेतु रसायन औषधियों का प्रयोग परम हितकारी है, क्योंकि अतिकृश व्यक्ति के समस्त धातु क्षीण हो जाती हैं तथा रसायन औषधियों के सेवन से सभी धातुओं की पुष्टि होती है, इसलिए कृश व्यक्ति के स्वरूप, प्रकृति, दोषों की स्थिति, उसके शरीर में उत्पन्न अन्य रोग या रोग के लक्षणों एवं ऋतु को ध्यान में रखकर किसी भी रसायन के योग अथवा कल्प का प्रयोग किया जा सकता है। वाजीकरण औषधियों का प्रयोग भी परिस्थिति के अनुसार किया जा सकता है।औषधि चिकित्सा क्रम :सर्वप्रथम रोग की मंद हुई अग्नि को दूर करने का प्रयोग आवश्यक है, इसके लिए दीपन, पाचन औषधियों का प्रयोग अपेक्षित है। अग्निमांद्य दूर होने पर अथवा रोगी की पाचन शक्ति सामान्य होने पर जिन रोगों के कारण कृशता उत्पन्न हुई हो तथा कृशता होने के पश्चात जो अन्य रोग हुए हों, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही औषधियों की व्यवस्था करना अपेक्षित है।
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कृशता में उपयोगी औषधियाँ :लवणभास्कर चूर्ण, हिंग्वाष्टक चूर्ण, अग्निकुमार रस, आनंदभैरव रस, लोकनाथ रस( यकृत प्लीहा विकार रोगाधिकार), संजीवनी वटी, कुमारी आसव, द्राक्षासव, लोहासव, भृंगराजासन, द्राक्षारिष्ट, अश्वगंधारिष्ट, सप्तामृत लौह, नवायस मंडूर, आरोग्यवर्धिनी वटी, च्यवनप्राश, मसूली पाक, बादाम पाक, अश्वगंधा पाक, शतावरी पाक, लौहभस्म, शंखभस्म, स्वर्णभस्म, अभ्रकभस्म तथा मालिश के लिए बला तेल, महामाष तेल (निरामिष) आदि का प्रयोग आवश्यकतानुसार करना चाहिए।भोजन में जरूरी :गेहूँ, जौ की चपाती, मूंग या अरहर की दाल, पालक, पपीता, लौकी, मेथी, बथुआ, परवल, पत्तागोभी, फूलगोभी, दूध, घी, सेव, अनार, मौसम्बी आदि फल अथवा फलों के रस, सूखे मेवों में अंजीर, अखरोट, बादाम, पिश्ता, काजू, किशमिश आदि। सोते समय एक गिलास कुनकुने दूध में एक चम्मच शुद्ध घी डालकर पिएँ, इसी के साथ एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण लें, लाभ न होने तक सेवन करें।

सिर दर्द की आयुर्वेदिक चिकित्सा

शिर शूलादि वज्र रस, सूतशेखर रस, गोदन्ती भस्म, लक्ष्मीविलास रस अभ्रकयुक्त, चारों 10-10 ग्राम, स्वर्ण माक्षिक भस्म और प्रवाल पिष्टी 5-5 ग्राम लेकर सबको भली-भाँति घोंट-पीसकर मिला लें। इसकी 30 पुड़िया बाँध लें। सुबह-शाम 1-1 पुड़िया शहद में मिलाकर चाट लें। इसके बाद शंखपुष्पी टेबलेट की 2-2 गोली ठंडे किए हुए दूध के साथ ले लें। भोजन के बाद आधा कप पानी में पथ्यादि काढ़ा और अमृतारिष्ट 4-4 चम्मच डालकर दोनों वक्त पी लिया करें।

शनिवार, 10 अक्टूबर 2015

पिगमेंटेशन SunTan झुर्रियो दाग धब्बे आदि के लिए एक नायाब फेस पैक :

पिगमेंटेशन SunTan झुर्रियो दाग धब्बे आदि के लिए एक नायाब फेस पैक :
बादाम (भिगो कर छिलका उतारा हुआ) 2 , गुलाब के 2 ताजे फूलों की पंखुरियां, चिरौंजी भीगी हुई एक चम्मच और पिसा जायफल आधा चम्मच हल्दी पाउडर एक चुटकी और शहद कुछ बूँदें. ये सब चीजें लेकर बारीक पीस लें और इतना कच्चा दूध मिलाएं की एक पेस्ट बन जाये. इस फेस पैक को चेहरे, गर्दन आदि पर 20 से 30 मिनट के लिए लगा कर रखें फिर हलके हाथों से उबटन की तरह................

अस्थमा का घरेलू उपचार

अस्थमा का घरेलू उपचार :
अस्थमा होने पर निम्न घरेलू उपचार अपनाकरआप इसका इलाज कर सकतें हैं और स्वस्थ रह सकते हैं
-*.लहसुन दमा के इलाज में काफी कारगर साबितहोता है। 30 मिली दूध में लहसुन की पांच कलियां उबालें और इस मिश्रण का हर रोज सेवन करने से दमे में शुरुआती अवस्था में काफी फायदा मिलता है।
*.अदरक की गरम चाय में लहसुन की दो पिसी कलियां मिलाकर पीने से भी अस्थमा नियंत्रित रहता है। सबेरे और शाम इस चायका सेवन करने से मरीज को फायदा होता है।
*.दमा रोगी पानी में अजवाइन मिलाकर इसे उबालें और पानी से उठती भाप लें, यह घरेलू उपाय काफी फायदेमंद होता है। 4-5 लौंग लें और 125 मिली पानी में 5 मिनट तक उबालें। इस मिश्रण को छानकर इसमें एक चम्मच शुद्ध शहद मिलाएँ
और गरम-गरम पी लें। हर रोज दो से तीन बार यह काढ़ा बनाकर पीने से मरीज को निश्चित रूप से लाभ होता है।
*.180 मिमी पानी में मुट्ठीभर सहजन की पत्तियां मिलाकर करीब 5 मिनट तक उबालें। मिश्रण को ठंडा होने दें, उसमेंचुटकीभर नमक, कालीमिर्च और नीबू रस भी मिलाया जा सकता है। इस सूप का नियमित रूप से इस्तेमाल दमा उपचार में कारगर माना गया है।
*.अदरक का एक चम्मच ताजा रस, एक कप मैथी के काढ़े और स्वादानुसार शहद इस मिश्रण में मिलाएं। दमे के मरीजों के लिए यह मिश्रण लाजवाब साबित होता है।
मैथी का काढ़ा तैयार करने के लिए एक चम्मच मैथीदाना और एक .............

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