गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

नाडी परीक्षा


नाडी परीक्षा


नाडी परीक्षा के बारे में शारंगधर संहिता ,भावप्रकाश ,योगरत्नाकर आदि ग्रंथों में वर्णन है .महर्षि सुश्रुत अपनी योगिक शक्ति से समस्त शरीर की सभी नाड़ियाँ देख सकते थे .ऐलोपेथी में तो पल्स सिर्फ दिल की धड़कन का पता लगाती है ; पर ये इससे कहीं अधिक बताती है .आयुर्वेद में पारंगत वैद्य नाडी परीक्षा से रोगों का पता लगाते है . इससे ये पता चलता है की कौनसा दोष शरीर में विद्यमान है .ये बिना किसी महँगी और तकलीफदायक डायग्नोस्टिक तकनीक के बिलकुल सही निदान करती है . जैसे की शरीर में कहाँ कितने साइज़ का ट्यूमर है , किडनी खराब है या ऐसा ही कोई भी जटिल से जटिल रोग का पता चल जाता है .दक्ष वैद्य हफ्ते भर पहले क्या खाया था ये भी बता देतें है .भविष्य में क्या रोग होने की संभावना है ये भी पता चलता है .

- महिलाओं का बाया और पुरुषों का दाया हाथ देखा जाता है .

- कलाई के अन्दर अंगूठे के नीचे जहां पल्स महसूस होती है तीन उंगलियाँ रखी जाती है .

- अंगूठे के पास की ऊँगली में वात , मध्य वाली ऊँगली में पित्त और अंगूठे से दूर वाली ऊँगली में कफ महसूस किया जा सकता है .

- वात की पल्स अनियमित और मध्यम तेज लगेगी .

- पित्त की बहुत तेज पल्स महसूस होगी .

- कफ की बहुत कम और धीमी पल्स महसूस होगी .

- तीनो उंगलियाँ एक साथ रखने से हमें ये पता चलेगा की कौनसा दोष अधिक है .

- प्रारम्भिक अवस्था में ही उस दोष को कम कर देने से रोग होता ही नहीं .

- हर एक दोष की भी ८ प्रकार की पल्स होती है ; जिससे रोग का पता चलता है , इसके लिए अभ्यास की ज़रुरत होती है .

- कभी कभी २ या ३ दोष एक साथ हो सकते है .

- नाडी परीक्षा अधिकतर सुबह उठकर आधे एक घंटे बाद करते है जिससरे हमें अपनी प्रकृति के बारे में पता चलता है . ये भूख- प्यास , नींद , धुप में घुमने , रात्री में टहलने से ,मानसिक स्थिति से , भोजन से , दिन के अलग अलग समय और मौसम से बदलती है .

- चिकित्सक को थोड़ा आध्यात्मिक और योगी होने से मदद मिलती है . सही निदान करने वाले नाडी पकड़ते ही तीन सेकण्ड में दोष का पता लगा लेते है .वैसे ३० सेकण्ड तक देखना चाहिए .

- मृत्यु नाडी से कुशल वैद्य भावी मृत्यु के बारे में भी बता सकते है .

- आप किस प्रकृति के है ? --वात प्रधान , पित्त प्रधान या कफ प्रधान या फिर मिश्र ? खुद कर के देखे या किसी वैद्य से पता कर देखिये .

छाछ

रोज़ सुबह एक ग्लास ताज़ा छाछ पीना अमृत सेवन के सामान है. इससे चेहरा चमकने लगता है.
- खाने के साथ छाछ पीने से जोड़ों के दर्द से भी राहत मिलती है।छाछ कैल्शियम से भरी होती है।
- इसका रोजाना सेवन करने वाले को कभी भी पाचन सबंधी समस्याएं प्रभावित नहीं करती हैं। खाना खाने के बाद पेट भारी हो जाना अरूचि आदि दूर करने के लिए गर्मियों में छाछ जरुर पीना चाहिए। 
- एसिडिटी- गर्मी के कारण अगर दस्त हो रही हो तो बरगद की जटा को पीसकर और छानकर छाछ में मिलाकर पीएं। छाछ में मिश्री, काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर रोजाना पीने से एसिडिटी जड़ से साफ हो जाती है।
- रोग प्रतिरोधकता बढाए- इसमें हेल्‍दी बैक्‍टीरिया और कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं साथ ही लैक्‍टोस शरीर में आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है, जिससे आप तुरंत ऊर्जावान हो जाते हैं।
- कब्ज- अगर कब्ज की शिकायत बनी रहती हो तो अजवाइन मिलाकर छाछा पीएं। पेट की सफाई के लिए गर्मियों में पुदीना मिलाकर लस्सी बनाकर पीएं।
- खाना न पचने की शिकायत- जिन लोगों को खाना ठीक से न पचने की शिकायत होती है। उन्हें रोजाना छाछ में भुने जीरे का चूर्ण, काली मिर्च का चूर्ण और सेंधा नमक का चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर धीरे-धीरे पीना चाहिए। इससे पाचक अग्रि तेज हो जाएगी।
- विटामिन- बटर मिल्‍क में विटामिन सी, ए, ई, के और बी पाये जाते हैं जो कि शरीर के पोषण की जरुरत को पूरा करता है।
- मिनरल्‍स- यह स्वस्थ पोषक तत्वों जैसे लोहा, जस्ता, फास्फोरस और पोटेशियम से भरा होता है, जो कि शरीर के लिये बहुत ही जरुरी मिनरल माना जाता है।
- यदि आप डाइट पर हैं तो रोज़ एक गिलास मट्ठा पीना ना भूलें। यह लो कैलोरी और फैट में कम होता है। 
- हिचकी लगने पर मट्ठे में एक चम्मच सौंठ डालकर सेवन करें।
- उल्टी होने पर मट्ठे के साथ जायफल घिसकर चाटें।
- गर्मी में रोजाना दो समय पतला मट्ठा लेकर उसमें भूना जीरा मिलाकर पीने से गर्मी से राहत मिलती है।
- मट्ठे में आटा मिलाकर लेप करने से झुर्रियाँ कम पड़ती हैं। 
- पैर की एड़ियों के फटने पर मट्ठे का ताजा मक्खन लगाने से आराम मिलता है।
- सिर के बाल झड़ने पर बासी छाछ से सप्ताह में दो दिन बालों को धोना चाहिए।
- मोटापा अधिक होने पर छाछ को छौंककर सेंधा नमक डालकर पीना चाहिए।
- सुबह-शाम मट्ठा या दही की पतली लस्सी पीने से स्मरण शक्ति तेज होती है।
- उच्च रक्तचाप होने पर गिलोय का चूर्ण मट्ठे के साथ लेना चाहिए।
- अत्यधिक मानसिक तनाव होने पर छाछ का सेवन लाभकारी होता है।
- जले हुए स्थान पर तुरंत छाछ या मट्ठा मलना चाहिए।
- विषैले जीव-जंतु के काटने पर मट्ठे में तम्बाकू मिलाकर लगाना चाहिए।
- कहा जाता है किसी ने जहर खा लिया हो तो उसे बार-बार फीका मट्ठा पिलाना चाहिए। परंतु डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
- अमलतास के पत्ते छाछ में पीस लें और शरीर पर मलें। कुछ देर बाद स्नान करें। शरीर की खुजली नष्ट हो जाती है।

सर्दियों में बादाम से ज्यादा असरदार है चना, रोज खाएंगे तो होंगे ये ढेरों फायदे

सर्दियों में बादाम से ज्यादा असरदार है चना, रोज खाएंगे तो होंगे ये ढेरों फायदे
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सर्दियों में रोजाना 50 ग्राम चना खाना शरीर के लिए बहुत लाभकारी होता है। आयुर्वेद मे माना गया है कि चना और चने की दाल दोनों के सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है। चना खाने से अनेक रोगों की चिकित्सा हो जाती है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, नमी, चिकनाई, रेशे, कैल्शियम, आयरन व विटामिन्स पाए जाते हैं। चने का गरीबों का बादाम कहा जाता है, क्योंकि ये सस्ता होता है लेकिन इसी सस्ती चीज में बड़ी से बड़ी बीमारियों की लड़ने की क्षमता है। चने के सेवन से सुंदरता बढ़ती है साथ ही दिमाग भी तेज हो जाता है। मोटापा घटाने के लिए रोजाना नाश्ते में चना लें। अंकुरित चना 3 साल तक खाते रहने से कुष्ट रोग में लाभ होता है। गर्भवती को उल्टी हो तो भुने हुए चने का सत्तू पिलाएं। चना पाचन शक्ति को संतुलित और दिमागी शक्ति को भी बढ़ाता है। चने से खून साफ होता है जिससे त्वचा निखरती है।
सर्दियों में चने के आटे का हलवा कुछ दिनों तक नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। यह हलवा वात से होने वाले रोगों में व अस्थमा में फायदेमंद होता है।
रात को चने की दाल भिगों दें सुबह पीसकर चीनी व पानी मिलाकर पीएं। इससे मानसिक तनाव व उन्माद की स्थिति में राहत मिलती है। 50 ग्राम चने उबालकर मसल लें। यह जल गर्म-गर्म लगभग एक महीने तक सेवन करने से जलोदर रोग दूर हो जाता है।
चने के आटे की की नमक रहित रोटी 40 से 60 दिनों तक खाने से त्वचा संबंधित बीमारियां जैसे-दाद, खाज, खुजली आदि नहीं होती हैं। भुने हुए चने रात में सोते समय चबाकर गर्म दूध पीने से सांस नली के अनेक रोग व कफ दूर हो जाता हैं।
25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर सुबह खाली पेट सेवन करने से डायबिटीज दूर हो जाती है। यदि समान मात्रा में जौ चने की रोटी भी दोनों समय खाई जाए तो जल्दी फायदा होगा।
चने को पानी में भिगो दें उसके बाद चना निकालकर पानी को पी जाएं। शहद मिलाकर पीने से किन्हीं भी कारणों से उत्पन्न नपुंसकता समाप्त हो जाती है।
हिचकी की समस्या ज्यादा परेशान कर रही हो तो चने के पौधे के सूखे पत्तों का धुम्रपान करने से शीत के कारण आने वाली हिचकी तथा आमाशय की बीमारियों में लाभ होता है।
पीलिया में चने की दाल लगभग 100 ग्राम को दो गिलास जल में भिगोकर उसके बाद दाल पानी में से निकलाकर 100 ग्राम गुड़ मिलाकर 4-5 दिन तक खाएं राहत मिलेगी।
देसी काले चने 25-30 ग्राम लेकर उनमें 10 ग्राम त्रिफला चूर्ण मिला लें चने को कुछ घंटों के लिए भिगो दें। उसके बाद चने को किसी कपड़े में बांध कर अंकुरित कर लें। सुबह नाश्ते के रूप में इन्हे खूब चबा चबाकर खाएं।
बुखार में ज्यादा पसीना आए तो भूने को पीसकर अजवायन और वच का चूर्ण मिलाकर मालिश करनी चाहिए।
चीनी के बर्तन में रात को चने भिगोकर रख दे। सुबह उठकर खूब चबा-चबाकर खाएं इसके लगातार सेवन करने से वीर्य में बढ़ोतरी होती है व पुरुषों की कमजोरी से जुड़ी समस्याएं खत्म हो जाती हैं। भीगे हुए चने खाकर दूध पीते रहने से वीर्य का पतलापन दूर हो जाता है।
दस ग्राम चने की भीगी दाल और 10 ग्राम शक्कर दोनों मिलाकर 40 दिनों तक खाने से धातु पुष्ट हो जाती है।
गर्म चने रूमाल या किसी साफ कपड़े में बांधकर सूंघने से जुकाम ठीक हो जाता है। बार-बार पेशाब जाने की बीमारी में भुने हूए चनों का सेवन करना चाहिए। गुड़ व चना खाने से भी मूत्र से संबंधित समस्या में राहत मिलती है। रोजाना भुने चनों के सेवन से बवासीर ठीक हो जाता है।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

Ayurveda Medicine

आयुर्वेदिक दवा आयुर्वेद के मूल सिध्धन्तो पर आधारित है और उसी अनुसार उनका प्रयोग किया जाता है जिससे रोगी को अवश्य और शत प्रतिशत आराम मिलता है।
अर्शोघनी वटी.......
यह वटी वातज यानि की बिना खून वाली बवासीर और खूनी बवासीर को ठीक करने में बहुत कारगर है।
इसकी 2-2 गोली चार बार ठंडे पानी या ताज़ा पानी से लें।
आरोग्यवर्धिनी वटी.........
आरोग्यवर्धिनी वटी आयुर्वेद विज्ञान की श्रेष्ठ गुटिका है। जैसा इसका नाम वैसा ही इसका काम है।
ये गोली हैपेटाइटिस, लीवर से संबन्धित सभी तरह के रोग, त्वचा के रोग, एलर्जी, काले सफ़ेद धब्बे, खाज, खुजली, एसिडिटी, आमाश्य और आंत से संबन्धित रोग, ह्रदय रोग, गैस बनना, कोई भी शारीरिक तकलीफ हो उसमे इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे वैद्य समाज के लोग बहुत प्रयोग करते हैं।
इसकी एक गोली सुबह और एक गोली शाम को पानी, शहद या दूध से लेनी चाहिए। सुबह या दिन मे एक गोली खाने से भी काम चल जाता है। ऊपर बताए गए रोगों मे इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे सभी दवा बनाने वाली कंपनीयां बनाती हैं इसलिए सर्व सुलभ भी है। जिन्हे कोई बीमारी न हो वो भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे खाते रहने से व्यक्ति का आरोग्य बना रहता है।
अग्नितुन्डी वटी..........
गुण :- अग्नि के मन्द होने से पैदा सभी रोगों में देने से पूरा लाभ होता है। यह वटी अग्नि दीपक, वातानुलोमक,पाचक और मृदु रेचक है ।
मात्रा:- 1 से 2 गोली भोजन के बाद, हल्के गरम पानी के साथ खाना चाहिये ।
अज्मोदादि वटी........
गुण :- आमवात, गृध्रसी, तूनी, प्रतितूनी, विश्वाची, शोथ, सन्धि शोथ, सन्धि शूल, अस्थि शूल, कटि शूल, गुदा शूल, जन्घा शूल, पृष्ट शूल, वस्ति शूल, विशूचिका और ह्रुदय रोग दूर होते है ।
मात्रा :- 3 से 6 गॊली , गरम पानी से, दिन में दो तीन बार ।
अभयादि बटी.......
गुण :- जीर्ण ज्वर, प्लीहा, पांडु , काम्ला, कुम्भ कामला, रक्त पित्त, अम्ल पित्त, आठ प्रकार के उदर रोग, सब प्रकार के अजीर्ण, अषठीला, आध्यमान, विबन्ध, गुल्म आदि रोग नष्ट हो जाते है ।
मात्रा:- 2 गोली, हरड़ का चूर्ण मिला हुआ चावल का धोवन के साथ अथवा गरम जल के साथ लें।
अमृतादि गुग्गुल वटी.......
गुण :- वात रक्त, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, प्रमेह, आम्वात, एवम आढ्यवात में उपयोगी है ।
मात्रा:- 1 से 3 ग्राम, रास्नादि काढा या गरम जल के साथ, दिन में दो या तीन बार लें।
आमलक्यादि वटिका.......
गुण:- इस वटी को उस समय प्रयोग करते हैं जब बुखार के बीच में बहुत प्य़ास और मुख सूखने लगता है और बार बार अधिक पानी पीने के बाद भी प्यास नहीं बुझती है ।
आमवातारि वटिका.......
गुण :- यह वटी बहुत से रोगों की दशाओं में प्रयोग की जाती है । आमवात, गुल्म, शूल, उदर रोग, यक्रत रोग,प्लीहा रोग, अष्ठीला रोग, आनाह,आन्त्र बृध्धी, अर्श, भगन्दर, ग्रन्थि शूल, शिर:शूल, गृध्रसी, पान्डु, कामला,हलीमक, शोथ, अम्लपित्त, वात रोग, अरुचि, श्लीपद, अर्बुद, गलगन्ड, गन्डमाला, विद्रधी, पाषाण गर्धभ, कुष्ठ और कृमि रोग नष्ट होते हैं ।
मात्रा :- 1 गोली , त्रिफला के काढे के साथ दिन में दो बार। एक या दो गोली मुख में रखकर चूसना भी लाभप्रद है।
इन्दु वटी......
सभी प्रकार के कान के रोग यानी कान तथा कान से सम्बन्धित सभी रोगों के अलावा मधुमेह आदि आदि बीमारियों की अवस्थाओं में उपयोग की जाती है । इसकी एक गोली आवले के रस के साथ सुबह शाम खाना चाहिये
इन्दुकला वटी.......
गुण :- यह वटिका मसूरिका, रोमान्तिका, विस्फोट ज्वर, लोहित ज्वर, सर्व व्रण रोग और कासादि रोगों को दूर करती है ।
इसे एक गोली रोजाना तुलसी पत्र के रस के साथ दिन में दो समय सेवन करना चाहिये
ऊपर बतायी गयी आयुर्वेदिक दवाये एक वयस्क के लिये है। बच्चो को आधी दवा और बहुत छोटे बच्चो को चौथायी मात्रा देनी चाहिये।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

‪#‎Premature_Ejaculation‬

शीघ्रपतन के लिए ऐमरजैंसी आयुर्वेदिक उपचार 
★★★★★★★★★★★★★★★★
1) Jatifaladi vati 1 ya 2 goli
जातिफलादि वटी दूध से एक या दो गोली ।
2) Viryastamban vati 1 ya 2 goli
वीर्यस्तंभन वटी 1 या दो गोली
3 )Kaminividravan ras 1 ya 2 goli
कामिनीविद्रावण रस 1 या दो गोली 
आयुर्वेद की मशहूर दवा । बलैक में बिकती है ।
4) कामचूड़ामनी रस 
Kaam chudamani ras 
1 या दो गोली
यह आपको आसानी से मिल सकती है लेकिन बाजारू के रिज्लट खास नही अगर किसी वैद्य की बनी मिल जाए तो अच्छा ।
Before sex with hot milk.
सब दवाईया संभोग से दो घंटे पहले दूध से सेवन करें ।
5 ) मदनानंद मोदक लें । 
कुछ कंपनी बनाती है लेकिन कोई खास रिज्लट नही आता ।
सेवनकरता नींद की या बी.पी लो या नशा की शिकायत करता है । इसलिए सावधानी से लें । बार - बार लेने पर नुकसान हो सकता है ।
6 )Musli churan
एक चम्मच दूध से ।
रोज लेने पर कोई हानि नही करता ।
7 )Ashwgandha churan 
यह भी आप रोज ले सकते है । 
कोई हानि नही ।मोटे लोग न लें । मोटापा लाता है । 
जो मोटे हो वह इसका घनसत्व + असली शिलाजीत सत् लें सकते है ।
Anand churan 
आनंद चूर्ण 
यह चूरन कोई कंपनी नही बनाती खुग ही निर्माण करना होता है । किसी वैद्य से तैयार करवा लें । यह वीर्य को बहुत गाड़ा करता है और वीर्य के दोष ठीक करता है ।स्तंभनकारी है ।
Ye sab emergency dwayian h long performence k liye.

फटी एड़ियो का उपचार :-

फटी एड़ियो का उपचार :-
शरीर में उष्णता या खुश्की बढ़ जाने, नंगे पैर चलने फिरने, खून की कमी, तेज ठंड के प्रभाव से तथा धूल मिट्टी से पैर की एड़ियां फट जाती हैं। यदि इनकी देखभाल न की जाए तो ये ज्यादा फट जाती हैं और इनसे खून आने लगता है, ये बहुत दर्द करती हैं। एक कहावत शायद इसलिए प्रसिद्ध है........ जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। तो जानिए इससे कैसे छुटकारा पाया जाए।
घरेलू इलाज :-
पैरों में जाड़े में बिवाई खूब फटती है, ऐसे समय ये जायफल बड़ा काम आता है, इसे महीन पीसकर बिवाइयों में भर दीजिये। 12-15 दिन में ही पैर भर जायेंगे।
अमचूर का तेल 50 ग्राम, मोम 20 ग्राम, सत्यानाशी के बीजों का पावडर 10 ग्राम और शुद्ध घी 25 ग्राम। सबको मिलाकर एक जान कर लें और
शीशी में भर लें। सोते समय पैरों को धोकर साफ कर लें और पोंछकर यह दवा बिवाई में भर दें और ऊपर से मोजे पहनकर सो जाएं। कुछ दिनों में बिवाई दूर हो जाएगी, तलवों की त्वचा साफ, चिकनी व साफ हो जाएगी।
त्रिफला चूर्ण को खाने के तेल में तलकर मल्हम जैसा गाढ़ा कर लें। इसे सोते समय बिवाइयों में लगाने से थोड़े ही दिनों में बिवाइयां दूर हो जाती हैं।
चावल को पीसकर नारियल में छेद करके भर दें और छेद बन्द करके रख दें। 10-15 दिन में चावल सड़ जाएगा, तब निकालकर चावल को पीसकर बिवाइयों में रोज रात को भर दिया करें। इस प्रयोग से भी बिवाइयां ठीक हो जाती हैं।
गुड़, गुग्गल, राल, सेंधा नमक, शहद, सरसों, मुलहटी व घी सब 10-10 ग्राम लें। घी व शहद को छोड़ सब द्रव्यों को कूटकर महीन चूर्ण कर लें, घी व शहद मिलाकर मल्हम बना लें। इस मल्हम को रोज रात को बिवाइयों पर लगाने से ये कुछ ही दिन में ठीक हो जाती हैं।
रात को सोते समय चित्त लेट जाएं, हाथ की अंगुली लगभग डेढ़ इंच सरसों के तेल में भिगोकर नाभि में लगाकर 2-3 मिनट तक रगड़ते हुए मालिश करें और तेल को सुखा दें। जब तक तेल नाभि में जज्ब न हो जाए, रगड़ते रहें। यह प्रयोग सिर्फ एक सप्ताह करने पर बिवाइयां ठीक हो जाती हैं और एड़ियां साफ, चिकनी व मुलायम हो जाती हैं। एड़ी पर कुछ भी लगाने की जरूरत नहीं। और हाँ इससे आपके होठ भी नरम और चिकने रहेंगे।
गुनगुने पानी मे नमक डालकर पैरों को 10-15 मिनट तक भिगोकर रखें। इसके बाद थोड़ा सा सरसों का तेल पैरों की एड़ियों में लगाने से फटी एड़ियाँ ठीक हो जाती है । यह क्रिया रात को सोने से पहले रोजाना करे । या फिर इसी गर्म पानी से अपनी एड़ियों को धोकर बाजार से खरीदा हुआ शुद्ध देसी मोम और तिल का तेल इन दोनों को मिलाकर एक महलम तैयार करे फिर अपनी फटी एड़ियों अथवा गढ़े वाले स्थान पर इस तैयार मलहम को रात्री को सोने से पहले लगाये और लगाने के बाद एक सूती कपडा बांधकर आराम से सो जाये ऐसा करने से तीन दिन में ही आपको अपनी फटी में काफी आराम दिखाई देगा ।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

Thyroid हाइपर और हाइपो थाइरोइड का घरेलु और सफल उपचार

Thyroid हाइपर और हाइपो थाइरोइड का घरेलु और सफल उपचार

हाइपर थाइरोइड और हाइपो थाइरोइड का घरेलु और सफल उपचार।

आज कल की भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में ये समस्या आम सी हो गयी हैं, और अलोपथी में इसका कोई इलाज भी नहीं हैं, बस जीवन भर दवाई लेते रहो, और आराम कोई नहीं।

थायराइड मानव शरीर मे पाए जाने वाले एंडोक्राइन ग्लैंड में से एक है। थायरायड ग्रंथि गर्दन में श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यन्त्र के दोनों ओर दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली जैसा होता है। यह थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है जिससे शरीर के ऊर्जा क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता नियंत्रित होती है।
थॉयराइड ग्रंथि तितली के आकार की होती है जो गले में पाई जाती है। यह ग्रंथि उर्जा और पाचन की मुख्य ग्रंथि है। यह एक तरह के मास्टर लीवर की तरह है जो ऐसे जीन्स का स्राव करती है जिससे कोशिकाएं अपना कार्य ठीक प्रकार से करती हैं। इस ग्रंथि के सही तरीके से काम न कर पाने के कारण कई तरह की समस्‍यायें होती हैं। इस लेख में विस्‍तार से जानें थॉयराइड फंक्‍शन और इसके उपचार के बारे में।
थॉयराइड को साइलेंट किलर माना जाता है, क्‍योंकि इसके लक्षण व्‍यक्ति को धीरे-धीरे पता चलते हैं और जब इस बीमारी का निदान होता है तब तक देर हो चुकी होती है। इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी से इसकी शुरुआत होती है लेकिन ज्यादातर चिकित्‍सक एंटी बॉडी टेस्ट नहीं करते हैं जिससे ऑटो-इम्युनिटी दिखाई देती है।
* यह ग्रंथि शरीर के मेटाबॉल्जिम को नियंत्रण करती है यानि जो भोजन हम खाते हैं यह उसे उर्जा में बदलने का काम करती है।
* इसके अलावा यह हृदय, मांसपेशियों, हड्डियों व कोलेस्ट्रोल को भी प्रभावित करती है।
*आमतौर पर शुरुआती दौर में थायराइड के किसी भी लक्षण का पता आसानी से नहीं चल पाता, क्योंकि गर्दन में छोटी सी गांठ सामान्य ही मान ली जाती है। और जब तक इसे गंभीरता से लिया जाता है, तब तक यह भयानक रूप ले लेता है।

आखिर क्या कारण हो सकते है जिनसे थायराइड होता है।

* थायरायडिस- यह सिर्फ एक बढ़ा हुआ थायराइड ग्रंथि (घेंघा) है, जिसमें थायराइड हार्मोन बनाने की क्षमता कम हो जाती है।
* इसोफ्लावोन गहन सोया प्रोटीन, कैप्सूल, और पाउडर के रूप में सोया उत्पादों का जरूरत से ज्यादा प्रयोग भी थायराइड होने के कारण हो सकते है।
* कई बार कुछ दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव भी थायराइड की वजह होते हैं।
* थायराइट की समस्या पिट्यूटरी ग्रंथि के कारण भी होती है क्यों कि यह थायरायड ग्रंथि हार्मोन को उत्पादन करने के संकेत नहीं दे पाती।
* भोजन में आयोडीन की कमी या ज्यादा इस्तेमाल भी थायराइड की समस्या पैदा करता है।
* सिर, गर्दन और चेस्ट की विकिरण थैरेपी के कारण या टोंसिल्स, लिम्फ नोड्स, थाइमस ग्रंथि की समस्या या मुंहासे के लिए विकिरण उपचार के कारण।
* जब तनाव का स्तर बढ़ता है तो इसका सबसे ज्यादा असर हमारी थायरायड ग्रंथि पर पड़ता है। यह ग्रंथि हार्मोन के स्राव को बढ़ा देती है।
* यदि आप के परिवार में किसी को थायराइड की समस्या है तो आपको थायराइड होने की संभावना ज्यादा रहती है। यह थायराइड का सबसे अहम कारण है।
* ग्रेव्स रोग थायराइड का सबसे बड़ा कारण है। इसमें थायरायड ग्रंथि से थायरायड हार्मोन का स्राव बहुत अधिक बढ़ जाता है। ग्रेव्स रोग ज्यादातर 20 और 40 की उम्र के बीच की महिलाओं को प्रभावित करता है, क्योंकि ग्रेव्स रोग आनुवंशिक कारकों से संबंधित वंशानुगत विकार है, इसलिए थाइराइड रोग एक ही परिवार में कई लोगों को प्रभावित कर सकता है।
* थायराइड का अगला कारण है गर्भावस्था, जिसमें प्रसवोत्तर अवधि भी शामिल है। गर्भावस्था एक स्त्री के जीवन में ऐसा समय होता है जब उसके पूरे शरीर में बड़े पैमाने पर परिवर्तन होता है, और वह तनाव ग्रस्त रहती है।
* रजोनिवृत्ति भी थायराइड का कारण है क्योंकि रजोनिवृत्ति के समय एक महिला में कई प्रकार के हार्मोनल परिवर्तन होते है। जो कई बार थायराइड की वजह बनती है।
थायराइड के लक्षण:-

कब्ज-

थाइराइड होने पर कब्ज की समस्या शुरू हो जाती है। खाना पचाने में दिक्कत होती है। साथ ही खाना आसानी से गले से नीचे नहीं उतरता। शरीर के वजन पर भी असर पड़ता है।

हाथ-पैर ठंडे रहना-

थाइराइड होने पर आदमी के हाथ पैर हमेशा ठंडे रहते है। मानव शरीर का तापमान सामान्य यानी 98.4 डिग्री फॉरनहाइट (37 डिग्री सेल्सियस) होता है, लेकिन फिर भी उसका शरीर और हाथ-पैर ठंडे रहते हैं।
प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना- थाइराइड होने पर शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम़जोर हो जाती है। इम्यून सिस्टम कमजोर होने के चलते उसे कई बीमारियां लगी रहती हैं।

थकान

थाइराइड की समस्या से ग्रस्त आदमी को जल्द थकान होने लगती है। उसका शरीर सुस्त रहता है। वह आलसी हो जाता है और शरीर की ऊर्जा समाप्त होने लगती है।

त्वचा का सूखना या ड्राई होना

थाइराइड से ग्रस्त व्यक्ति की त्वचा सूखने लगती है। त्वचा में रूखापन आ जाता है। त्वचा के ऊपरी हिस्से के सेल्स की क्षति होने लगती है जिसकी वजह से त्वचा रूखी-रूखी हो जाती है।

जुकाम होना

थाइराइड होने पर आदमी को जुकाम होने लगता है। यह नार्मल जुकाम से अलग होता है और ठीक नहीं होता है।

डिप्रेशन

थाइराइड की समस्या होने पर आदमी हमेशा डिप्रेशन में रहने लगता है। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता है, दिमाग की सोचने और समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है। याद्दाश्त भी कमजोर हो जाती है।

बाल झड़ना

थाइराइड होने पर आदमी के बाल झड़ने लगते हैं तथा गंजापन होने लगता है। साथ ही साथ उसके भौहों के बाल भी झड़ने लगते है।

मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द

मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द और साथ ही साथ कमजोरी का होना भी थायराइड की समस्या के लक्षण हो सकते है।

शारीरिक व मानसिक विकास

थाइराइड की समस्या होने पर शारीरिक व मानसिक विकास धीमा हो जाता है।

अगर आपको ऐसे कोई भी लक्षण दिखाई दे तो अपने डाक्टर से संपर्क करें आपको थाइराइड समस्या हो सकती है।

अति असरकारक घरेलु उपाय__सुबह खाली पेट लौकी का जूस पिए, घर में ही गेंहू के जवारों का जूस निकाल कर पिए, इसके बाद एक गिलास पानी में हर रोज़ ३० मिली एलो वेरा जूस और २ बूँद तुलसी की डाल कर पिए, एलो वेरा जूस आपको किसी बढ़िया कंपनी का यूज़ करना होगा, जिसमे फाइबर ज़्यादा हो, सिर्फ कोरा पानी ना हो। बाजार से आज कल पांच तुलसी बहुत आ रही हैं, किसी बढ़िया कंपनी की आर्गेनिक पांच तुलसी ले। ये सब करने के आधे घंटे तक कुछ भी न खाए पिए, इस समय में आप प्राणायाम करे।अखरोट और बादाम है फायदेमंद :-अखरोट और बादाम में सेलेनियम नामक तत्‍व पाया जाता है जो थॉयराइड की समस्‍या के उपचार में फायदेमंद है। 1 आंउस अखरोट में 5 माइक्रोग्राम सेलेनियम होता है। अखरोट और बादाम के सेवन से थॉयराइड के कारण गले में होने वाली सूजन को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। अखरोट और बादाम सबसे अधिक फायदा हाइपोथॉयराइडिज्‍म (थॉयराइड ग्रंथि का कम एक्टिव होना) में करता है।
इसके साथ में रात को सोते समय गाय के गर्म दूध के साथ 1 चम्मच अश्वगंधा चूर्ण का सेवन करे।
इसके साथ प्राणायाम करना हैं, जिसे उज्जायी प्राणायाम बोलते हैं। इस प्राणायाम में गले को संकुचित करते हुए पुरे ज़ोर से ऊपर से श्वांस खींचनी हैं।