स्फटिक भस्म60mg,
अभ्रक भस्म60mg,
गोदन्ती भस्म60mg मिलाकर
सिरप कुक्कर कास प्रहार रस 1-1चम्मच के साथ दें।
गर्म पानी में1-1चम्मच शहद दिन में दो बार दें।
शनिवार, 21 अप्रैल 2018
कुक्कर कास
सोमवार, 12 जून 2017
दद्रु कुष्ट/फंगल डिसीज
दद्रु दावानल
+
जिंक आँक्साइड
+
जात्यादितैल
स्थानिक लेप
रसमाणिक्य। 125mg
गंधक रसायन250mg
त्रिफलाचूर्ण 1gm
शुक्ति भष्म। 250mg
______________--____
1×2
स्थानिक अलाबू चिकित्सा आवश्यक ।
यदि दद्रु कुष्ट/फंगल डिसीज में शरीर से ढकी जगहो पर है तो वस्त्र को गर्म पनी मे धो कर धूप मे पुरा दिन सुखने दे ,उल्टे करके पुनः सुखावे । सम्भव हो तो गर्म प्रेस करावे । फंगस कपडो से भी निकालना आवश्यक है । वरना रोग की पुनरावृत्ति होगी।
बुधवार, 17 मई 2017
अतिस ---- औषधीय प्रयोग और स्वास्थ्य लाभ
बच्चो के पाचन संस्थान एवं श्वसन संस्थान की यह एक उत्तम औषधि है , जो हिमालय क्षेत्र में पायी जाती है | इसका क्षुप 1 से 3 फुट ऊँचा सीधा शाखाओ से युक्त होता है | इस वनौषधि का ज्ञान हमारे आयुर्वेदाचार्यो को प्राचीन समय से ही था , प्राय सभी रोगों को हरने वाली इस औषधि को शास्त्रों में विश्वा या अतिविश्वाके नाम से उल्लेखित किया गया है | इसकी विशेषता यह है की यह विष वर्ग वत्सनाभ के कुल की होने के बाद भी विषैली नहीं है एवं इसका सेवन मनुष्य को चारो तरफ से स्वास्थ्य लाभ देता है | अतिस के पत्र 2 से 4 इंच लम्बे होते है जो उपर से लट्वाकर होते है , इसके पुष्प हरिताभ नील वर्ण के एवं चमकीले होते है जो मंजरी के रूप में लगते है | अतिस के फल गोल होते है और 5 कोशो वाले होते है जिनमे बीज उपस्थित रहते है |
अतिस का मूल ही मुख्य रूप से औषध उपयोग में लिया जाता है , जो की दो कंदों के रूप में होता है | इसमें
से एक कंद पिछले वर्ष का और दूसरा कंद इसी वर्ष का होता है | अतिस का ताजा कंद 1 से 1.5 इंच लम्बा और .5 इंच मोटा होता है | इसकी कंद का वर्ण ऊपर से धूसर एवं तोड़ने पर सफ़ेद रंग का और अन्दर काली बिंदियो से युक्त होता है |
अतिस के पर्याय
संस्कृत - अतिविषा , विश्वा, घुन्बल्ल्भ, श्रंगी , शुक्लकंदा , भंगुरा, घुणप्रिय , काश्मीरा |
हिंदी - अतिस
मराठी - अतिविष
बंगला - आतिच
गुजराती - अतिवखनी, कली, वखमी, अतिवस, अतिविषा
पंजाबी - अतिस, सुखी हरी, चितिजड़ी, पत्रिश, बोंगा
लेटिन - Aconitum Heterophyllum
अतिस का रासायनिक संगठन
अतिस के मूल में अतिसिन ( Atisine ), हेटेरेतेसैन (Heteratisine) , एतिदीन (Atidine), हेतिदीन (Hetidine), हेतेरोफ्य्ल्लिसिने (Heterophyllisine) , आइसोएतिसिन (Isotisine) , स्टार्च और तिक्त क्षार आदि मौजूद होते है |
अतिस के गुणकर्म और रोगप्रभाव
अतिस दीपन , पाचन, ग्राही, ज्वरातिसरनाशक , क्रमिघ्न, कास नाशक, एवं अर्शोघ्न, बालको के छर्दी , कास आदि रोगों में विशेष लाभकारी है | अतिस की मूल वाजीकारक, पाचक, ज्वार्घन, कटु, बलकारक, कफशामक, अमाशयक्रिया वर्धक , अर्श, रक्तस्राव , शोथ और सामान्य दुर्बलता में लाभकारी है |
अतिस का औषधीय प्रयोग और स्वास्थ्य लाभ
1. श्वास - कास
⇒श्वास-कास में 5 ग्राम अतिस मूल के चूर्ण को 2 चम्मच शहद के साथ मिलाकर चाटने से खांसी में आराम मिलता है एवं कफ शरीर से निकलता है
⇒अतिस चूर्ण 2 ग्राम के साथ पुष्कर मूल चूर्ण 1 ग्राम मिला ले और इसे शहद के साथ सुबह शाम चाटें | श्वास - कास रोग में तुरंत आराम मिलेगा |
⇒अस्थमा आदि में अतिस चूर्ण , नागरमोथा, कर्कटश्रंगी तथा यवक्षार इन सभी को सामान मात्रा में लेकर इनको 2 से 3 ग्राम की मात्रा में शहद के साथ सेवन करे | अस्थमा या दमा रोग में यह बेहद कारगर है |
2. बालरोग
⇒अतिस की मूल को पिसकर चूर्ण बनाले और इसे शीशी में भरकर रखे | बालको के सभी रोग जैसे - उदरशूल,ज्वर, अतिसार आदि में 250 से 500 mg शहद के साथ दिन में दो या तीन बार चटाए |
⇒अतिसार ( दस्त ) और आमातिसार में 2 ग्राम अतिस चूर्ण देकर , 8 घंटे तक पानी में भिगोई हुई 2 ग्राम सोंठ को पीसकर पिलाने से लाभ होता है |इसका प्रयोग तब तक करे जब तक अतिसार बंद ना हो जावे |
⇒अगर बच्चो के पेट में कीड़े हो तो 2 ग्राम अतिस और 2 ग्राम वायविडंग का चूर्ण लेकर शहद के साथ बचो को चटाने से पेट के कीड़े नष्ट होजाते है |
3. उदर रोग में अतिस का प्रयोग
⇒वमन में 1 ग्राम अतिस चूर्ण और 2 ग्राम नागकेशर चूर्ण को मिलकर सेवन करने से वमन जल्दी ही रुक जाता है |
⇒पाचन शक्ति कमजोर हो तो 2 ग्राम अतिस चूर्ण के साथ 1 ग्राम सोंठ का चूर्ण या 1 ग्राम पिप्पली का चूर्ण मिलाकर शहद के साथ चाटने से पाचन शक्ति मजबूत बनती है एवं पाचन से सम्बंधित सभी रोगों में लाभ मिलता है |
⇒रक्तपित की समस्या में 3 ग्राम अतिस चूर्ण के साथ 3 ग्राम इन्द्र्जौ की छाल का चूर्ण मिळाले और इसे शहद के साथ सुबह- शाम चाटें | रक्तपित की समस्या के साथ साथ अतिसार में भी तुरंत लाभ मिलेगा |
⇒गृहणी रोग में अतिस, सोंठ और नागरमोथा को मिलकर इनका क्वाथ तैयार करले | इसका सेवन सुबह- शाम गुनगुने जल के साथ करे | इससे गृहणी रोग में आम दोष का पाचन होता है |
⇒मन्दाग्नि में अतिस, सोंठ, गिलोय और नागरमोथा को सामान मात्रा में लेकर इनका काढ़ा बनाले | इसके सेवन से भूख खुलकर लगती है एवं पाचन क्रिया में सुधर होता है |
⇒अतिस के 2 ग्राम चूर्ण को हरेड के मुरबे के साथ खाने से अमातिसर में लाभ मिलता है |
4. अन्य रोगों में अतिस का घरेलु उपयोग
⇒अर्श रोग में अतिस के साथ राल और कपूर मिलकर , धुंवा देने से रक्तार्श में फायदा मिलता है |
⇒शरीर या यौन दुर्बलता में अतिस के 2 ग्राम चूर्ण के साथ इलाइची और वंस्लोचन को मिलाकर , मिश्री युक्त दूध के साथ सेवन करने से शरीर में बल बढ़ता है एवं यौन कमजोरी भी जाती रहती है |
⇒ज्वर् रोग में अतिस के 1 ग्राम चूर्ण को गरम पानी के साथ दिन में 3 बार सेवन करने से जल्दी ही बुखार उतर जाता है |
⇒विषम ज्वर में अतिस के 1 ग्राम चूर्ण के साथ कुनैन मिलाकर दिन में तीन या चार बार सेवन करवाने से विषम ज्वर में जल्दी ही आराम आता है |
⇒यौन शक्ति की वर्द्धि के लिए अतिस चूर्ण 5 ग्राम को शक्कर या दूध के साथ सेवन करे | इससे जल्दी ही यौन शक्ति में इजाफा होता है |
शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017
कांकायन वटी
*मरिच,जीरक,छोटी पीपल,10-10 ग्राम, पीपलामूल 20ग्राम,हरड़ छिलका 50 ग्राम,चव्य 30 ग्राम चित्रक 40ग्राम ,शुण्ठी 05ग्राम,भिलावा शुद्ध80 ग्राम जिमीकन्द 160 ग्राम यव क्षार 20 ग्राम
गुड़ 500 ग्राम जमीकंद के रस सभी द्रव्यों की घुटाई कर गुड़ के साथ 500 मि ग्रा की गोली बनावें
*हरीतकी के फल का छिलका 2 भगकालि मिर्च 1 भाग जीरा श्वेत 1 भाग
पीपली पिप्पली मूल चव्य चित्रक शुंठी 1 -1 भाग
भि लावे। के फूल 8 भाग
एरंड के बीज की गिरी16 भाग
यवक्षार 2 भाग।
भिलावा छोड़कर कूट पीस ले
फिर भिलावा 2 गुना गुड़ मिलाए
ओर वटी बनाए
*अर्श को ठीक करती है।
जो अर्श क्षार अग्नि ओर शस्त्र के द्वारा काटने पर ठीक नही होते है।
योग रत्नाकर
*उपरोक्त गोली 2 2 तक्र के साथ लेने पर शुस्कार्ष में लाभप्रद
*योग रत्नाकर में कॉकायन वटी
अर्श रोगाधिकार में है वहीं
शार्गंधर में व चक्रदत्त में गुल्म रोग में है। इनके तीनो के घटको में भी बहुत
अन्तर है।
*Kankayanvati ka udarshul arsh gulm m achha use h anubhut
*Krichhartav m bhi use karaya h good result
*Kankayan gutika bhallatak ka yohg hone ke karan Arsh ke rogi ko poorn pathya me rahkar chikitsa lena aavshayk he jo aaj ke mahol me kam hi sambhv he
Rogi ko is gutika se arsh ki chikitsa ke daran Ghrit ka prayog avshya karana chahiye
* Fibroid uterus me bhi bahut achha result hai
*शार्गंधर वाले योग की कॉकायन वटी
उदर रोग में ज्यादा लाभ दायक
*Arshoghni vari. 250 mg Arshkuthar ras250 mg kankayan vati250mgx hingvasrak churn 3gm. Abhayaristh 20 ml. Tab.pilex 2 be. Arsh k liye
*रक्तार्श प्रारंभिक stage पर हो तो कांकायन वटी के साथ अलग
बोलबद्ध रस कहरवा pisti का प्रयोग कराना चाहिए
सोमवार, 9 जनवरी 2017
हरसिंगार ( पारिजात )
हरसिंगार जिसे पारिजात भी कहते हैं, एक सुन्दर वृक्ष होता है, जिस पर सुन्दर व सुगन्धित फूल लगते हैं। इसके फूल, पत्ते और छाल का उपयोग औषधि के रूप में किया जाता है। यह सारे भारत में पैदा होता है।
परिचय : यह 10 से 15 फीट ऊँचा और कहीं 25-30 फीट ऊँचा एक वृक्ष होता है और देशभर में खास तौर पर बाग-बगीचों में लगा हुआ मिलता है। विशेषकर मध्यभारत और हिमालय की नीची तराइयों में ज्यादातर पैदा होता है। इसके फूल बहुत सुगंधित और सुन्दर होते हैं जो रात को खिलते हैं और सुबह मुरझा जाते हैं।
विभिन्न भाषाओं में नाम : संस्कृत- पारिजात, शेफालिका। हिन्दी- हरसिंगार, परजा, पारिजात। मराठी- पारिजातक। गुजराती- हरशणगार। बंगाली- शेफालिका, शिउली। तेलुगू- पारिजातमु, पगडमल्लै। तमिल- पवलमल्लिकै, मज्जपु। मलयालम - पारिजातकोय, पविझमल्लि। कन्नड़- पारिजात। उर्दू- गुलजाफरी। इंग्लिश- नाइट जेस्मिन। लैटिन- निक्टेन्थिस आर्बोर्ट्रिस्टिस।
गुण : यह हलका, रूखा, तिक्त, कटु, गर्म, वात-कफनाशक, ज्वार नाशक, मृदु विरेचक, शामक, उष्णीय और रक्तशोधक होता है। सायटिका रोग को दूर करने का इसमें विशेष गुण है।
रासायनिक संघटन : इसके फूलों में सुगंधित तेल होता है। रंगीन पुष्प नलिका में निक्टैन्थीन नामक रंग द्रव्य ग्लूकोसाइड के रूप में 0.1% होता है जो केसर में स्थित ए-क्रोसेटिन के सदृश्य होता है। बीज मज्जा से 12-16% पीले भूरे रंग का स्थिर तेल निकलता है। पत्तों में टैनिक एसिड, मेथिलसेलिसिलेट, एक ग्लाइकोसाइड (1%), मैनिटाल (1.3%), एक राल (1.2%), कुछ उड़नशील तेल, विटामिन सी और ए पाया जाता है। छाल में एक ग्लाइकोसाइड और दो क्षाराभ होते हैं।
उपयोग : इस वृक्ष के पत्ते और छाल विशेष रूप से उपयोगी होते हैं। इसके पत्तों का सबसे अच्छा उपयोग गृध्रसी (सायटिका) रोग को दूर करने में किया जाता है।
गृध्रसी (सायटिका) : हरसिंगार के ढाई सौ ग्राम पत्ते साफ करके एक लीटर पानी में उबालें। जब पानी लगभग 700 मिली बचे तब उतारकर ठण्डा करके छान लें, पत्ते फेंक दें और 1-2 रत्ती केसर घोंटकर इस पानी में घोल दें। इस पानी को दो बड़ी बोतलों में भरकर रोज सुबह-शाम एक कप मात्रा में इसे पिएँ।
ऐसी चार बोतलें पीने तक सायटिका रोग जड़ से चला जाता है। किसी-किसी को जल्दी फायदा होता है फिर भी पूरी तरह चार बोतल पी लेना अच्छा होता है। इस प्रयोग में एक बात का खयाल रखें कि वसन्त ऋतु में ये पत्ते गुणहीन रहते हैं अतः यह प्रयोग वसन्त ऋतु में लाभ नहीं करता।
गुरुवार, 5 जनवरी 2017
जलनेति
जलनेति एक महत्वपूर्ण शरीर शुद्धि योग क्रिया है जिसमें पानी से नाक की सफाई की जाती और आपको साइनस, सर्दी, जुकाम , पोल्लुशन, इत्यादि से बचाता है। जलनेति में नमकीन गुनगुना पानी का इस्तेमाल किया जाता है। इसमें पानी को नेटिपोट से नाक के एक छिद्र से डाला जाता है और दूसरे से निकाला जाता है। फिर इसी क्रिया को दूसरी नॉस्ट्रिल से किया जाता है। अगर संक्षेप में कहा जाए तो जलनेति एक ऐसी योग है जिसमें पानी से नाक की सफाई की जाती है और नाक संबंधी बीमारीयों से आप निजात पाते हैं। जलनेति दिन में किसी भी समय की जा सकती है। यदि किसी को जुकाम हो तो इसे दिन में कई बार भी किया जा सकता है। इसके लगातार अभ्यास से यह नासिका क्षेत्र में कीटाणुओं को पनपने नहीं देती।
जलनेति की विधि
- सबसे पहले आप वैसा नेति लोटा या नेतिपॉट लें जो आसानी से आपके नाक के छिद्र में घुस सके।
- नेति लोटा में आधा लीटर गुनगुना नमकीन पानी और एक चम्मच नमक भर लें।
- अब आप कागासन में बैठें।
- पैरों के बीच डेढ़ से दो फुट की दूरी रखें।
- कमर से आगे की ओर झुकें। नाक का जो छिद्र उस समय अधिक सक्रिय हो, सिर को उसकी विपरीत दिशा में झुकाएं।
- अब आप नेति लोटा की टोंटी को नाक के सक्रिय छिद्र में डाल लें।
- मुंह को खोल कर रखें ताकि आप को सांस लेने में परेशानी न हो।
- पानी को नाक के एक छिद्र से भीतर जाने दे तथा यह दूसरे छिद्र से अपने आप बाहर आने लगेगा।
- जब आधा पानी खत्म हो जाने के बाद लोटा को नीचे रख दें तथा नाक साफ करें। दूसरे छिद्र में भी यही क्रिया दोहराएं। नाक साफ कर लें।
जलनेति के लाभ
- जलनेति सिरदर्द में : अगर आप बहुत ज़्यदा सिरदर्द से परेशान हैं तो यह क्रिया अत्यंत लाभकारी है।
- जलनेति अनिद्रामें: अनिद्रा से ग्रस्त व्यक्ति को इसका नियमित अभ्यास करनी चाहिए।
- जलनेति सुस्ती के लिए : सुस्ती में यह क्रिया अत्यंत लाभकारी होती है।
- जलनेति बालों का गिरना रोके: अगर आपको बालों का गिरना बंद करना हो तो इस क्रिया का अभ्यास जरूर करें।
- जलनेति बालों के सफेद में: यह बालो को सफेद होने से भी रोकता है।
- जलनेति मेमोरी में : आपके के मेमोरी को बढ़ाने में यह विशेषकर लाभकारी है।
- जलनेति नाक रोग में: नाक के रोग तथा खांसी का प्रभावी उपचार होता है।
- जलनेति नेत्र-विकार में: नेत्र अधिक तेजस्वी हो जाते हैं। नेत्र-विकार जैसे आंखें दुखना, रतौंधी तथा नेत्र ज्योति कम होना, इन सारी परीशानियों का इलाज इसमें है।
- जलनेति कान रोग में: कानों के रोगों, श्रवण शक्ति कम होने और कान बहने के उपचार में यह लाभकारी है।
- जलनेति आध्यात्मिक लाभ: वायु के मुक्त प्रवाह में आ रही बाधाएं दूर करने से शरीर की सभी कोशाओं पर व्यापक प्रभाव डालता है जिसके कारण मनो-आध्यात्मिक स्वास्थ्य पर गहरा प्रभाव पड़ता है।
- जलनेति का वैज्ञानिक पक्ष: जलनेति में कुछ अधिक नमकीन जल का प्रयोग करने से नाक के अंदर खुजली होती है जिसके कारण झिल्ली में रक्तप्रवाह बढ़ता है तथा ग्रंथीय कोशाओं का स्राव भी बढ़ता है, जिससे ग्रंथियों के द्वार साफ होते हैं। नेति के कारण मात्र नासा-गुहा को ही लाभ नहीं होता बल्कि नेत्रों एवं विभिन्न साइनसों को भी लाभ मिलता है।
जलनेति की सावधानियां
- जलनेति में सावधानियां लेना बहुत जरूरी है। पहले पहले यह क्रिया किसी एक्सपर्ट के मौजूदगी में करनी चाहिए।
- जलनेति के बाद नाक को सुखाने के लिए भस्त्रिका प्राणायाम किया जाना चाहिए। नाक का एक छिद्र बंद कर भस्त्रिका करें और दूसरे छिद्र से उसे दोहराएं और उसके बाद दोनों छिद्र खुले रखकर ऐसा करें।
- नाक को सूखने के लिए अग्निसार क्रिया भी की जा सकती है।
- नाक को बहुत जोर से नहीं पोछना चाहिए क्योंकि इससे पानी कानों में जा सकता है।
- पानी और नमक का अनुपात सही होना चाहिए क्योंकि बहुत अधिक अथवा बहुत कम नमक होने पर जलन एवं पीड़ा हो सकती है।
- इस योग क्रिया को करते समय मुंह से ही सांस लेनी चाहिए।
मंगलवार, 27 दिसंबर 2016
*Stone--पथरी
कितनी बड़ी निकल सकती हे ?
दवाओ से निकल सकती हे या नहीं ?
कितने दिन लगेंगे ?
आदि आदि
दरअसल होता क्या हे...
पथरी जो बड़े आकार की होगी वो हमेशा गलकर ही बाहर आएगी..
दूसरी बात जितनी बड़ी होगी उतना ही समय उसको बाहर आने में लगेगा
तीसरी बात पथरी का आकार mostly 7-8 mm से कम होगा तभी वो बाहर आएगी
क्यूंकि ureter का आकार 3-4 mm तक का होता हे..ureter की flexibility ज्यादा से ज्यादा 8 mm तक की size को निकलने में सहायता करेगी ...इसके बाद बड़ी size अटक कर रास्ता जाम कर देगी...
इसलिए जितने भी बड़ी पथरी निकालने के प्रयास हे वो सभी पथरी को गलाने के बाद ही शुरू होंगे
अब अगर मेने जितनी भी पथरी को निकाला हे ..
उनमे देखने में आया की किसी किसी की बड़ी पथरी भी गलकर जल्दी निकल गयी और किसी किसी की उतनी ही size की पथरी ने ज्यादा समय लिया..
तो इसके पीछे सीधा सा reason हे पथरी का chemical composition ...मतलब पथरी बनी किन पदार्थो से हे..अगर वो calcium oxalate हे तो धीरे गलेगी
calcium phosphate हे या uretes हे तो जल्दी गलेगी
मतलब आयुर्वेदानुसार हम oxalate पथरी को वातिक मान सकते हे
uretes को पेत्तिक
और बाकी calcium phosphate और cystine को कफज मान सकते हे( ये मेरा मानना हे..सभी के विचार स्वतंत्र हो सकते हे..जरूरी नहीं ये सही भी हो)
बस इससे इतना सा जवाब मिल जाता हे..की फला फला प्रकृति के व्यक्ति को एक ही आहार लेने के बावजूद एक ही स्थान पर पलने के बावजूद पथरियां भी सबको भिन्न भिन्न पनप सकती हे..और इससे उनके बाहर आने का कार्यकाल भी भिन्न भिन्न रहेगा
अब मुद्दे पर आते हे
क्या दे जिससे सफलता मिले ?
तो एक बात अवश्य ध्यान रहे
रोगी की प्रकृति को देखकर पथरी के दोषभेद की hypothesis बनाई जाए..की वातिक हे पेत्तिक हे या कफज हे
और उसी के according ओषध का चुनाव करे
वातिक का चुनाव होता हे तो पथरी में गुग्गुल जरूर दे(मतलब पुड़िया की दवा में महायोगराज गुग्गुल जरूर मिलाये)..
*** गुग्गुल कोशिश करे धूतपापेश्वर का ही लिया जाए
सहजन की छाल का चूर्ण दे या घिस घिस कर पिलाये..
महावातविधवंशक जरूर मिलाये
(मेरी बात हो सकता हे विद्वानों को अजीब लगे लेकिन इन द्रव्यों के गुण कमाल के आते हे)
अब इसी तरह पेत्तिक और कफज में द्रव्यों का selection कर पुड़िया की दवा में मिलाये
मै जो common formula काम में लेता हूँ वो भी बताये चलता हूँ
त्रिविक्रम रस 5gm
हजरल यहूद 5gm
क्षार पर्पटी 5gm
पाषाण वज्र रस 5gm
यवक्षार 5gm
तालमखाना पञ्चांग क्षार10gm
अमृता सत्व 10gm
गोक्षुरादी गुग्गुलु 10gm
total 30 dose with honey
tab चंद्रप्रभावटी(धूतपापेश्वर) 1bd
tab cystone 2bid
syp neeri 1 tid
syp गोक्षुरादी क्वाथ 15-15 ml with luke warm water (नागार्जुना pharmacy अहमदाबाद वाली का)
oil गन्धर्व हस्तादी एरंडम 2 tsf with luke warm water /HS
(ये पथरी का अनुलोमन करवाएगा)
घर पर तीन प्रयोग करने को कहे
1.एक चम्मच निम्बू का रस+ एक चम्मच ग्लिसरीन
2.इलायची के दाने 3gm(पिसे हुए)+ 20 gm मक्खन
3.तीन अंजीर रात सुबह शाम भिगोकर मसलकर छानकर पिने को दे
पथ्य में
कुलथी की दाल खाने को कहे
ये प्रयोग दस दिन का रहेगा...पांच दिन बाद ही treatment repeat करे..क्यूंकि क्षार एक साथ लम्बे समय तक नहीं दे सकते हे





