शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

संग्रहणी

संग्रहणी :-
मंदाग्नि के कारण भोजन न पचने पर अजीर्ण होकर दस्त लगते लगते हैं तो यही दस्त संग्रहणी कहलाती है। अर्थात् खाना खाने के बाद तुरंत ही शौच होना या खाने के बाद थोड़ी देर में अधपचा या अपरिपक्व मल निकलना संग्रहणी कही जाती है। इस रोग के कारण अन्न कभी पचकर, कभी बिना पचे, कभी पतला, कभी गाढ़ा कष्ट या दुर्गंध के साथ शौच के रूप में निकलता है। शरीर में दुर्बलता आ जाती है।
वातज संग्रहणी :- जो मनुष्य वातज पदार्थों का भक्षण करे, मिथ्या आहार-विहार करे और अति मैथुन करे तो बादी कुपित होकर जठराग्नि को बिगाड़ देती है। तब वातज संग्रहणी उत्पन्न होती है।
पित्तज संग्रहणी :- जो पुरुष गरम वस्तु का सेवन अधिक करे, मिर्च आदि तीक्ष्ण, खट्टे और खारे पदार्थ खाए तो उसका पित्त दूषित होकर जठराग्नि को बुझा देता है। उसका कच्चा मल निकलने लगता है तब पित्तज संग्रहणी होती है।
कफज संग्रहणी :- जो पुरुष भारी, चिकनी व शीतल वस्तु खाते हैं तथा भोजन करके सो जाते हैं, उस पुरुष का कफ कुपित होकर जठराग्नि को नष्ट कर देता है।
लक्षण :-
वातज :- खाया हुआ आहार कष्ट से पचे, कंठ सूखे, भूख न लगे, प्यास अधिक लगे, कानों में भन-भन होना, जाँघों व नाभि में पीड़ा होना आदि।
पित्तज :- कच्चा मल निकले, पीले वर्ण का पानी मल सहित गुदाद्वार से निकलना और खट्टी डकारें आना।
कफज :- अन्न कष्ट से पचे, हृदय में पीड़ा, वमन और अरुचि हो, मुँह मीठा रहे, खाँसी, पीनस, गरिष्ठता और मीठी डकारें आना।
घरेलू उपचार :-
1........ सोंठ, पीपल, पीपलामूल, चव्य एवं चित्रक का 8 ग्राम चूर्ण नित्य गाय के दूध से बनी छाछ के साथ पिएँ, ऊपर से दो-चार बार और भी छाछ पिएँ तो वात संग्रहणी दूर होगी।
2.......... 8 ग्राम शुद्ध गंधक, 4 ग्राम शुद्ध पारद की कजली, 10 ग्राम सोंठ, 8 ग्राम काली मिर्च, 10 ग्राम पीपली, 10 ग्राम पांचों नमक, 20 ग्राम सेंकी हुई अजवायन, 20 ग्राम भूनी हुई हींग, 24 ग्राम सेंका सुहागा और एक पैसे भर भुनी हुई भाँग-इन सबको पीसकर-छानकर कजली मिला दें। उसके बाद इसे दो दिन बाद भी पीसें तो चूर्ण बन जाए। यह 2 या 4 ग्राम चूर्ण गाय के दूध से बनी छाछ के साथ पीने से वात संग्रहणी मिटती है।
3........... जायफल, चित्रक, श्वेत चंदन, वायविडंग, इलायची, भीमसेनी कपूर, वंशलोचन, जीरा, सोंठ, काली मिर्च, पीपली, तगर, पत्रज और लवंग बराबर-बराबर लेकर चूर्ण बनाकर इन सबके चूर्ण से दुगुनी मिश्री और थोड़ी बिना सेंकी भाँग-ये सब मिलाकर इसमें से 4 या 6 ग्राम चूर्ण गाय के दूध की छाछ के साथ पंद्रह दिनों तक सेवन करें तो पित्त संग्रहणी दूर होगी।
4......... रसोत, अतीस, इंद्रयव, तज, धावड़े के फूल सबका 8 ग्राम चूर्ण गाय के दूध की छाछ के साथ या चावल के पानी के साथ पंद्रह दिनों तक लें तो पित्त संग्रहणी नष्ट होगी।
5......... हरड़ की छाल, पिप्पली, सोंठ, चित्रक, सेंधा नमक और काली मिर्च का 8 ग्राम चूर्ण नित्य गाय के दूध की छाछ के साथ पंद्रह दिन तक सेवन करें तो कफ संग्रहणी दूर होगी।
6.......प्रातः एवं साँय रामबाण रस सादे पानी के साथ। दोपहर मे 250 मिलीग्राम सिद्ध्प्राणेश्वर चावल के पानी से लेने से संग्रहणी रोग से मुक्ति मिलती है।
सभी प्रकार के उदर रोग के लिए शंख भस्म 125 मिलीग्राम, सिद्धप्राणेश्वर 125 मिलीग्राम, रामबाण रस 125 मिलीग्राम, स्वर्ण पर्पटी 60 मिलीग्राम, मकरध्वज 60 मिलीग्राम इन सबको मिलाकर दो पुड़िया बनाकर सुबह शाम भुने हुए जीरे और शहद के साथ लें।
प्रातःकाल मूंग-चावल की खिचड़ी खाएं। शाम को शुद्ध घी का हलवा खाने से इस रोग का निदान हो जाता है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

गोंद के औषधीय गुण -

गोंद के औषधीय गुण -
किसी पेड़ के तने को चीरा लगाने पर उसमे से जो स्त्राव निकलता है वह सूखने पर भूरा और कडा हो जाता है उसे गोंद कहते है .यह शीतल और पौष्टिक होता है . उसमे उस पेड़ के ही औषधीय गुण भी होते है . आयुर्वेदिक दवाइयों में गोली या वटी बनाने के लिए भी पावडर की बाइंडिंग के लिए गोंद का इस्तेमाल होता है .
- कीकर या बबूल का गोंद पौष्टिक होता है .
- नीम का गोंद रक्त की गति बढ़ाने वाला, स्फूर्तिदायक पदार्थ है।इसे ईस्ट इंडिया गम भी कहते है . इसमें भी नीम के औषधीय गुण होते है - पलाश के गोंद से हड्डियां मज़बूत होती है .पलाश का 1 से 3 ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध अथवा आँवले के रस के साथ लेने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है तथा अस्थियाँ मजबूत बनती हैं और शरीर पुष्ट होता है।यह गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है।
- आम की गोंद स्तंभक एवं रक्त प्रसादक है। इस गोंद को गरम करके फोड़ों पर लगाने से पीब पककर बह जाती है और आसानी से भर जाता है। आम की गोंद को नीबू के रस में मिलाकर चर्म रोग पर लेप किया जाता है।
- सेमल का गोंद मोचरस कहलाता है, यह पित्त का शमन करता है।अतिसार में मोचरस चूर्ण एक से तीन ग्राम को दही के साथ प्रयोग करते हैं। श्वेतप्रदर में इसका चूर्ण समान भाग चीनी मिलाकर प्रयोग करना लाभकारी होता है। दंत मंजन में मोचरस का प्रयोग किया जाता है।
- बारिश के मौसम के बाद कबीट के पेड़ से गोंद निकलती है जो गुणवत्ता में बबूल की गोंद के समकक्ष होती है।
- हिंग भी एक गोंद है जो फेरूला कुल (अम्बेलीफेरी, दूसरा नाम एपिएसी) के तीन पौधों की जड़ों से निकलने वाला यह सुगंधित गोंद रेज़िननुमा होता है । फेरूला कुल में ही गाजर भी आती है । हींग दो किस्म की होती है - एक पानी में घुलनशील होती है जबकि दूसरी तेल में । किसान पौधे के आसपास की मिट्टी हटाकर उसकी मोटी गाजरनुमा जड़ के ऊपरी हिस्से में एक चीरा लगा देते हैं । इस चीरे लगे स्थान से अगले करीब तीन महीनों तक एक दूधिया रेज़िन निकलता रहता है । इस अवधि में लगभग एक किलोग्राम रेज़िन निकलता है । हवा के संपर्क में आकर यह सख्त हो जाता है कत्थई पड़ने लगता है ।यदि सिंचाई की नाली में हींग की एक थैली रख दें, तो खेतों में सब्ज़ियों की वृद्धि अच्छी होती है और वे संक्रमण मुक्त रहती है । पानी में हींग मिलाने से इल्लियों का सफाया हो जाता है और इससे पौधों की वृद्धि बढ़िया होती
- गुग्गुल एक बहुवर्षी झाड़ीनुमा वृक्ष है जिसके तने व शाखाओं से गोंद निकलता है, जो सगंध, गाढ़ा तथा अनेक वर्ण वाला होता है. यह जोड़ों के दर्द के निवारण और धुप अगरबत्ती आदि में इस्तेमाल होता है .
- प्रपोलीश- यह पौधों द्धारा श्रावित गोंद है जो मधुमक्खियॉं पौधों से इकट्ठा करती है इसका उपयोग डेन्डानसैम्बू बनाने में तथा पराबैंगनी किरणों से बचने के रूप में किया जाता है।
- ग्वार फली के बीज में ग्लैक्टोमेनन नामक गोंद होता है .ग्वार से प्राप्त गम का उपयोग दूध से बने पदार्थों जैसे आइसक्रीम , पनीर आदि में किया जाता है। इसके साथ ही अन्य कई व्यंजनों में भी इसका प्रयोग किया जाता है.ग्वार के बीजों से बनाया जाने वाला पेस्ट भोजन, औषधीय उपयोग के साथ ही अनेक उद्योगों में भी काम आता है।
- इसके अलावा सहजन , बेर , पीपल , अर्जुन आदि पेड़ों के गोंद में उसके औषधीय गुण मौजूद होते है

नाडी परीक्षा


नाडी परीक्षा


नाडी परीक्षा के बारे में शारंगधर संहिता ,भावप्रकाश ,योगरत्नाकर आदि ग्रंथों में वर्णन है .महर्षि सुश्रुत अपनी योगिक शक्ति से समस्त शरीर की सभी नाड़ियाँ देख सकते थे .ऐलोपेथी में तो पल्स सिर्फ दिल की धड़कन का पता लगाती है ; पर ये इससे कहीं अधिक बताती है .आयुर्वेद में पारंगत वैद्य नाडी परीक्षा से रोगों का पता लगाते है . इससे ये पता चलता है की कौनसा दोष शरीर में विद्यमान है .ये बिना किसी महँगी और तकलीफदायक डायग्नोस्टिक तकनीक के बिलकुल सही निदान करती है . जैसे की शरीर में कहाँ कितने साइज़ का ट्यूमर है , किडनी खराब है या ऐसा ही कोई भी जटिल से जटिल रोग का पता चल जाता है .दक्ष वैद्य हफ्ते भर पहले क्या खाया था ये भी बता देतें है .भविष्य में क्या रोग होने की संभावना है ये भी पता चलता है .

- महिलाओं का बाया और पुरुषों का दाया हाथ देखा जाता है .

- कलाई के अन्दर अंगूठे के नीचे जहां पल्स महसूस होती है तीन उंगलियाँ रखी जाती है .

- अंगूठे के पास की ऊँगली में वात , मध्य वाली ऊँगली में पित्त और अंगूठे से दूर वाली ऊँगली में कफ महसूस किया जा सकता है .

- वात की पल्स अनियमित और मध्यम तेज लगेगी .

- पित्त की बहुत तेज पल्स महसूस होगी .

- कफ की बहुत कम और धीमी पल्स महसूस होगी .

- तीनो उंगलियाँ एक साथ रखने से हमें ये पता चलेगा की कौनसा दोष अधिक है .

- प्रारम्भिक अवस्था में ही उस दोष को कम कर देने से रोग होता ही नहीं .

- हर एक दोष की भी ८ प्रकार की पल्स होती है ; जिससे रोग का पता चलता है , इसके लिए अभ्यास की ज़रुरत होती है .

- कभी कभी २ या ३ दोष एक साथ हो सकते है .

- नाडी परीक्षा अधिकतर सुबह उठकर आधे एक घंटे बाद करते है जिससरे हमें अपनी प्रकृति के बारे में पता चलता है . ये भूख- प्यास , नींद , धुप में घुमने , रात्री में टहलने से ,मानसिक स्थिति से , भोजन से , दिन के अलग अलग समय और मौसम से बदलती है .

- चिकित्सक को थोड़ा आध्यात्मिक और योगी होने से मदद मिलती है . सही निदान करने वाले नाडी पकड़ते ही तीन सेकण्ड में दोष का पता लगा लेते है .वैसे ३० सेकण्ड तक देखना चाहिए .

- मृत्यु नाडी से कुशल वैद्य भावी मृत्यु के बारे में भी बता सकते है .

- आप किस प्रकृति के है ? --वात प्रधान , पित्त प्रधान या कफ प्रधान या फिर मिश्र ? खुद कर के देखे या किसी वैद्य से पता कर देखिये .

छाछ

रोज़ सुबह एक ग्लास ताज़ा छाछ पीना अमृत सेवन के सामान है. इससे चेहरा चमकने लगता है.
- खाने के साथ छाछ पीने से जोड़ों के दर्द से भी राहत मिलती है।छाछ कैल्शियम से भरी होती है।
- इसका रोजाना सेवन करने वाले को कभी भी पाचन सबंधी समस्याएं प्रभावित नहीं करती हैं। खाना खाने के बाद पेट भारी हो जाना अरूचि आदि दूर करने के लिए गर्मियों में छाछ जरुर पीना चाहिए। 
- एसिडिटी- गर्मी के कारण अगर दस्त हो रही हो तो बरगद की जटा को पीसकर और छानकर छाछ में मिलाकर पीएं। छाछ में मिश्री, काली मिर्च और सेंधा नमक मिलाकर रोजाना पीने से एसिडिटी जड़ से साफ हो जाती है।
- रोग प्रतिरोधकता बढाए- इसमें हेल्‍दी बैक्‍टीरिया और कार्बोहाइड्रेट्स होते हैं साथ ही लैक्‍टोस शरीर में आपकी रोग प्रतिरोधक क्षमता को बढाता है, जिससे आप तुरंत ऊर्जावान हो जाते हैं।
- कब्ज- अगर कब्ज की शिकायत बनी रहती हो तो अजवाइन मिलाकर छाछा पीएं। पेट की सफाई के लिए गर्मियों में पुदीना मिलाकर लस्सी बनाकर पीएं।
- खाना न पचने की शिकायत- जिन लोगों को खाना ठीक से न पचने की शिकायत होती है। उन्हें रोजाना छाछ में भुने जीरे का चूर्ण, काली मिर्च का चूर्ण और सेंधा नमक का चूर्ण समान मात्रा में मिलाकर धीरे-धीरे पीना चाहिए। इससे पाचक अग्रि तेज हो जाएगी।
- विटामिन- बटर मिल्‍क में विटामिन सी, ए, ई, के और बी पाये जाते हैं जो कि शरीर के पोषण की जरुरत को पूरा करता है।
- मिनरल्‍स- यह स्वस्थ पोषक तत्वों जैसे लोहा, जस्ता, फास्फोरस और पोटेशियम से भरा होता है, जो कि शरीर के लिये बहुत ही जरुरी मिनरल माना जाता है।
- यदि आप डाइट पर हैं तो रोज़ एक गिलास मट्ठा पीना ना भूलें। यह लो कैलोरी और फैट में कम होता है। 
- हिचकी लगने पर मट्ठे में एक चम्मच सौंठ डालकर सेवन करें।
- उल्टी होने पर मट्ठे के साथ जायफल घिसकर चाटें।
- गर्मी में रोजाना दो समय पतला मट्ठा लेकर उसमें भूना जीरा मिलाकर पीने से गर्मी से राहत मिलती है।
- मट्ठे में आटा मिलाकर लेप करने से झुर्रियाँ कम पड़ती हैं। 
- पैर की एड़ियों के फटने पर मट्ठे का ताजा मक्खन लगाने से आराम मिलता है।
- सिर के बाल झड़ने पर बासी छाछ से सप्ताह में दो दिन बालों को धोना चाहिए।
- मोटापा अधिक होने पर छाछ को छौंककर सेंधा नमक डालकर पीना चाहिए।
- सुबह-शाम मट्ठा या दही की पतली लस्सी पीने से स्मरण शक्ति तेज होती है।
- उच्च रक्तचाप होने पर गिलोय का चूर्ण मट्ठे के साथ लेना चाहिए।
- अत्यधिक मानसिक तनाव होने पर छाछ का सेवन लाभकारी होता है।
- जले हुए स्थान पर तुरंत छाछ या मट्ठा मलना चाहिए।
- विषैले जीव-जंतु के काटने पर मट्ठे में तम्बाकू मिलाकर लगाना चाहिए।
- कहा जाता है किसी ने जहर खा लिया हो तो उसे बार-बार फीका मट्ठा पिलाना चाहिए। परंतु डॉक्टर की सलाह अवश्य लें।
- अमलतास के पत्ते छाछ में पीस लें और शरीर पर मलें। कुछ देर बाद स्नान करें। शरीर की खुजली नष्ट हो जाती है।

सर्दियों में बादाम से ज्यादा असरदार है चना, रोज खाएंगे तो होंगे ये ढेरों फायदे

सर्दियों में बादाम से ज्यादा असरदार है चना, रोज खाएंगे तो होंगे ये ढेरों फायदे
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सर्दियों में रोजाना 50 ग्राम चना खाना शरीर के लिए बहुत लाभकारी होता है। आयुर्वेद मे माना गया है कि चना और चने की दाल दोनों के सेवन से शरीर स्वस्थ रहता है। चना खाने से अनेक रोगों की चिकित्सा हो जाती है। इसमें कार्बोहाइड्रेट, प्रोटीन, नमी, चिकनाई, रेशे, कैल्शियम, आयरन व विटामिन्स पाए जाते हैं। चने का गरीबों का बादाम कहा जाता है, क्योंकि ये सस्ता होता है लेकिन इसी सस्ती चीज में बड़ी से बड़ी बीमारियों की लड़ने की क्षमता है। चने के सेवन से सुंदरता बढ़ती है साथ ही दिमाग भी तेज हो जाता है। मोटापा घटाने के लिए रोजाना नाश्ते में चना लें। अंकुरित चना 3 साल तक खाते रहने से कुष्ट रोग में लाभ होता है। गर्भवती को उल्टी हो तो भुने हुए चने का सत्तू पिलाएं। चना पाचन शक्ति को संतुलित और दिमागी शक्ति को भी बढ़ाता है। चने से खून साफ होता है जिससे त्वचा निखरती है।
सर्दियों में चने के आटे का हलवा कुछ दिनों तक नियमित रूप से सेवन करना चाहिए। यह हलवा वात से होने वाले रोगों में व अस्थमा में फायदेमंद होता है।
रात को चने की दाल भिगों दें सुबह पीसकर चीनी व पानी मिलाकर पीएं। इससे मानसिक तनाव व उन्माद की स्थिति में राहत मिलती है। 50 ग्राम चने उबालकर मसल लें। यह जल गर्म-गर्म लगभग एक महीने तक सेवन करने से जलोदर रोग दूर हो जाता है।
चने के आटे की की नमक रहित रोटी 40 से 60 दिनों तक खाने से त्वचा संबंधित बीमारियां जैसे-दाद, खाज, खुजली आदि नहीं होती हैं। भुने हुए चने रात में सोते समय चबाकर गर्म दूध पीने से सांस नली के अनेक रोग व कफ दूर हो जाता हैं।
25 ग्राम काले चने रात में भिगोकर सुबह खाली पेट सेवन करने से डायबिटीज दूर हो जाती है। यदि समान मात्रा में जौ चने की रोटी भी दोनों समय खाई जाए तो जल्दी फायदा होगा।
चने को पानी में भिगो दें उसके बाद चना निकालकर पानी को पी जाएं। शहद मिलाकर पीने से किन्हीं भी कारणों से उत्पन्न नपुंसकता समाप्त हो जाती है।
हिचकी की समस्या ज्यादा परेशान कर रही हो तो चने के पौधे के सूखे पत्तों का धुम्रपान करने से शीत के कारण आने वाली हिचकी तथा आमाशय की बीमारियों में लाभ होता है।
पीलिया में चने की दाल लगभग 100 ग्राम को दो गिलास जल में भिगोकर उसके बाद दाल पानी में से निकलाकर 100 ग्राम गुड़ मिलाकर 4-5 दिन तक खाएं राहत मिलेगी।
देसी काले चने 25-30 ग्राम लेकर उनमें 10 ग्राम त्रिफला चूर्ण मिला लें चने को कुछ घंटों के लिए भिगो दें। उसके बाद चने को किसी कपड़े में बांध कर अंकुरित कर लें। सुबह नाश्ते के रूप में इन्हे खूब चबा चबाकर खाएं।
बुखार में ज्यादा पसीना आए तो भूने को पीसकर अजवायन और वच का चूर्ण मिलाकर मालिश करनी चाहिए।
चीनी के बर्तन में रात को चने भिगोकर रख दे। सुबह उठकर खूब चबा-चबाकर खाएं इसके लगातार सेवन करने से वीर्य में बढ़ोतरी होती है व पुरुषों की कमजोरी से जुड़ी समस्याएं खत्म हो जाती हैं। भीगे हुए चने खाकर दूध पीते रहने से वीर्य का पतलापन दूर हो जाता है।
दस ग्राम चने की भीगी दाल और 10 ग्राम शक्कर दोनों मिलाकर 40 दिनों तक खाने से धातु पुष्ट हो जाती है।
गर्म चने रूमाल या किसी साफ कपड़े में बांधकर सूंघने से जुकाम ठीक हो जाता है। बार-बार पेशाब जाने की बीमारी में भुने हूए चनों का सेवन करना चाहिए। गुड़ व चना खाने से भी मूत्र से संबंधित समस्या में राहत मिलती है। रोजाना भुने चनों के सेवन से बवासीर ठीक हो जाता है।

बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

Ayurveda Medicine

आयुर्वेदिक दवा आयुर्वेद के मूल सिध्धन्तो पर आधारित है और उसी अनुसार उनका प्रयोग किया जाता है जिससे रोगी को अवश्य और शत प्रतिशत आराम मिलता है।
अर्शोघनी वटी.......
यह वटी वातज यानि की बिना खून वाली बवासीर और खूनी बवासीर को ठीक करने में बहुत कारगर है।
इसकी 2-2 गोली चार बार ठंडे पानी या ताज़ा पानी से लें।
आरोग्यवर्धिनी वटी.........
आरोग्यवर्धिनी वटी आयुर्वेद विज्ञान की श्रेष्ठ गुटिका है। जैसा इसका नाम वैसा ही इसका काम है।
ये गोली हैपेटाइटिस, लीवर से संबन्धित सभी तरह के रोग, त्वचा के रोग, एलर्जी, काले सफ़ेद धब्बे, खाज, खुजली, एसिडिटी, आमाश्य और आंत से संबन्धित रोग, ह्रदय रोग, गैस बनना, कोई भी शारीरिक तकलीफ हो उसमे इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे वैद्य समाज के लोग बहुत प्रयोग करते हैं।
इसकी एक गोली सुबह और एक गोली शाम को पानी, शहद या दूध से लेनी चाहिए। सुबह या दिन मे एक गोली खाने से भी काम चल जाता है। ऊपर बताए गए रोगों मे इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे सभी दवा बनाने वाली कंपनीयां बनाती हैं इसलिए सर्व सुलभ भी है। जिन्हे कोई बीमारी न हो वो भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे खाते रहने से व्यक्ति का आरोग्य बना रहता है।
अग्नितुन्डी वटी..........
गुण :- अग्नि के मन्द होने से पैदा सभी रोगों में देने से पूरा लाभ होता है। यह वटी अग्नि दीपक, वातानुलोमक,पाचक और मृदु रेचक है ।
मात्रा:- 1 से 2 गोली भोजन के बाद, हल्के गरम पानी के साथ खाना चाहिये ।
अज्मोदादि वटी........
गुण :- आमवात, गृध्रसी, तूनी, प्रतितूनी, विश्वाची, शोथ, सन्धि शोथ, सन्धि शूल, अस्थि शूल, कटि शूल, गुदा शूल, जन्घा शूल, पृष्ट शूल, वस्ति शूल, विशूचिका और ह्रुदय रोग दूर होते है ।
मात्रा :- 3 से 6 गॊली , गरम पानी से, दिन में दो तीन बार ।
अभयादि बटी.......
गुण :- जीर्ण ज्वर, प्लीहा, पांडु , काम्ला, कुम्भ कामला, रक्त पित्त, अम्ल पित्त, आठ प्रकार के उदर रोग, सब प्रकार के अजीर्ण, अषठीला, आध्यमान, विबन्ध, गुल्म आदि रोग नष्ट हो जाते है ।
मात्रा:- 2 गोली, हरड़ का चूर्ण मिला हुआ चावल का धोवन के साथ अथवा गरम जल के साथ लें।
अमृतादि गुग्गुल वटी.......
गुण :- वात रक्त, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, प्रमेह, आम्वात, एवम आढ्यवात में उपयोगी है ।
मात्रा:- 1 से 3 ग्राम, रास्नादि काढा या गरम जल के साथ, दिन में दो या तीन बार लें।
आमलक्यादि वटिका.......
गुण:- इस वटी को उस समय प्रयोग करते हैं जब बुखार के बीच में बहुत प्य़ास और मुख सूखने लगता है और बार बार अधिक पानी पीने के बाद भी प्यास नहीं बुझती है ।
आमवातारि वटिका.......
गुण :- यह वटी बहुत से रोगों की दशाओं में प्रयोग की जाती है । आमवात, गुल्म, शूल, उदर रोग, यक्रत रोग,प्लीहा रोग, अष्ठीला रोग, आनाह,आन्त्र बृध्धी, अर्श, भगन्दर, ग्रन्थि शूल, शिर:शूल, गृध्रसी, पान्डु, कामला,हलीमक, शोथ, अम्लपित्त, वात रोग, अरुचि, श्लीपद, अर्बुद, गलगन्ड, गन्डमाला, विद्रधी, पाषाण गर्धभ, कुष्ठ और कृमि रोग नष्ट होते हैं ।
मात्रा :- 1 गोली , त्रिफला के काढे के साथ दिन में दो बार। एक या दो गोली मुख में रखकर चूसना भी लाभप्रद है।
इन्दु वटी......
सभी प्रकार के कान के रोग यानी कान तथा कान से सम्बन्धित सभी रोगों के अलावा मधुमेह आदि आदि बीमारियों की अवस्थाओं में उपयोग की जाती है । इसकी एक गोली आवले के रस के साथ सुबह शाम खाना चाहिये
इन्दुकला वटी.......
गुण :- यह वटिका मसूरिका, रोमान्तिका, विस्फोट ज्वर, लोहित ज्वर, सर्व व्रण रोग और कासादि रोगों को दूर करती है ।
इसे एक गोली रोजाना तुलसी पत्र के रस के साथ दिन में दो समय सेवन करना चाहिये
ऊपर बतायी गयी आयुर्वेदिक दवाये एक वयस्क के लिये है। बच्चो को आधी दवा और बहुत छोटे बच्चो को चौथायी मात्रा देनी चाहिये।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

‪#‎Premature_Ejaculation‬

शीघ्रपतन के लिए ऐमरजैंसी आयुर्वेदिक उपचार 
★★★★★★★★★★★★★★★★
1) Jatifaladi vati 1 ya 2 goli
जातिफलादि वटी दूध से एक या दो गोली ।
2) Viryastamban vati 1 ya 2 goli
वीर्यस्तंभन वटी 1 या दो गोली
3 )Kaminividravan ras 1 ya 2 goli
कामिनीविद्रावण रस 1 या दो गोली 
आयुर्वेद की मशहूर दवा । बलैक में बिकती है ।
4) कामचूड़ामनी रस 
Kaam chudamani ras 
1 या दो गोली
यह आपको आसानी से मिल सकती है लेकिन बाजारू के रिज्लट खास नही अगर किसी वैद्य की बनी मिल जाए तो अच्छा ।
Before sex with hot milk.
सब दवाईया संभोग से दो घंटे पहले दूध से सेवन करें ।
5 ) मदनानंद मोदक लें । 
कुछ कंपनी बनाती है लेकिन कोई खास रिज्लट नही आता ।
सेवनकरता नींद की या बी.पी लो या नशा की शिकायत करता है । इसलिए सावधानी से लें । बार - बार लेने पर नुकसान हो सकता है ।
6 )Musli churan
एक चम्मच दूध से ।
रोज लेने पर कोई हानि नही करता ।
7 )Ashwgandha churan 
यह भी आप रोज ले सकते है । 
कोई हानि नही ।मोटे लोग न लें । मोटापा लाता है । 
जो मोटे हो वह इसका घनसत्व + असली शिलाजीत सत् लें सकते है ।
Anand churan 
आनंद चूर्ण 
यह चूरन कोई कंपनी नही बनाती खुग ही निर्माण करना होता है । किसी वैद्य से तैयार करवा लें । यह वीर्य को बहुत गाड़ा करता है और वीर्य के दोष ठीक करता है ।स्तंभनकारी है ।
Ye sab emergency dwayian h long performence k liye.