गुरुवार, 7 अप्रैल 2016
सोरायसीस
सिद्म कुष्ठ ( सोरायसीस )
आयुवैदमे कुल १८ प्रकार के कुष्ठ रोगो का वणँन किया गया है जीसमे ११ लधु कुष्ठ आैर ७ रोगो को महाकुष्ठ बताया है.
सिद्मकुष्ठ सोरायसीस महाकुष्ठ रोग है जो व्यकित शारिरिक हि मानसीक तोर पर भी कमजोर बना देता है.
ज्यादातर यह रोग हाथ -पैर आैर सर पर ही होते है
नाखून , कान के पीछे , गरदन के उपर या पीछे के भाग पर होता है.
उसका आकार निच्चीत नहि होता. लाल रंग के चकामे होते है.
सतत चमडी उखडती रहती है.
चमडी के अंदर से प्रवाहि नीकलना
खुजली बहोत आती है.
धीरे धीरे चमडी काली पडने लगती है आैर निस्तेज होने लगती है.
2. अगर सिर पर सोरायसीस हो तो
बाल जडते है.
सफेद होने लगते है.
रंग बदलना
कपाल तक फैलता है
3. अगर हाथ - पैर ,नाखुन मे हो तो?
नाखून तुटते है
रंग बदलता है चमडी का
नाखून मे चीरे पडते है.
पीले रंग के हो जाते है नाखून
सोरायसीस मे कंया ना खाये ?
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ईमली , निंबू , पोटेटो , बैगन , टमाटर , चाय , कोफि , घुम्र पान , भींडी , कांदा , लसुन , शराब , मेंदे से बनी चीजे , ईडली , मसाले दार खाना , दूध , दहि, ठोसा, बैकरि की चीजे , नमक , वगैरा बंद करे
कंया खाये ?
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हल्दि , आंवला , खरबूजा , ऐपल , लौकी , गायका दूध , सहजन , मोसंबी , हरि सब्जी , पपीता , चीकु , सैब , अमरूद , वगैरा काफि फायदेमंद है
रसाहार से ईलाज
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खरबुजा ऐवं ऐपल का रस बहोत फायदेमंद है सोरायसीस मे. दिनमे २०० मीली ऐपल अथवा तो खरबूजा का रस पूना चाहिये.
२ चमच तुलसी का रस पीये.
१ कप नीम के पत्तो का रस रोज सुबह लेना चाहिये.
आंवला रस २ कप मे १ चमच अदरक का रस + १ चमच हल्दि का रस मीलाकर पीना चाहिये.
गंधक से ईलाज
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पंसारि के वहा से गंधक + ४ पत्ते तुलसी के + नीम के थोडे पत्ते लाकर २ चमच गंधक १ बाल्टि पानी मे मीलाकर उबालकर जब पानी ठंडा हो जाये तब उनसे स्नान करे.
शुद्ध गंघक वटि सुबह शाम २-२ गोली गुनगुने पानी के साथ ले सकते है यह अेन्टि आेक्सीडेंट का काम करती है.
गौमुञ से ईलाज
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२० मीली गौमुञ रोज सुबह लेना चाहिये ऐवं लगाने के लीये भी ईस्तेमाल कर सकते है .
आैषध उपचार.
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तुलसी १ + १ आंवला चूरन चमच २ ग्लास पानी मे डालकर उबाले. जब आधा ग्लास पानी बचे तब छानकर पीये.
चिरायता काे पंसारि से लाकर २ चमच लेकर २ ग्लास पानी मे उबाले जब आधा ग्लास बचे तब छानकर पीऐ.
लगाने के लीये ?
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सोरायसीस वाले भाग पर दिवेल ( ऐरंडबीज का तैल ) लगाकर पांच मिनट हल्के हाथो से मालीश करनी चाहिये .
तुलसी के पत्ते को पीसकर लगाये.
नीम पत्ती को पीसी हुवी + ऐलोवेरा का गुदा को मीलाकर लगाये.
विटामीन्स ऐवं मीनरल्स ,ऐन्जाईम्स, सप्लीमेंट
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नोनी का ज्युस १०-ग्राम रोज सुबह ले सकते है.
अथवा नोनी केप्सुल १-१ गोली तीनो टाईम खाने से पहले ले.
गायके खीरा भी शरिर के वीटामीन्स ऐवं मीनरल्स की पुतीँ करता है.
स्पिरुलीना मे सभी धटक दव्य ऐवं विटामीन्स ऐवं मूनरल्य पाये जाते है. २-२ गोली सुबह शाम खाने से पहले ले सकते है.
आयुवैदिक ईलाज
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कैशोर गुगुल सुबह शाम २-२ गोली गुनगुने पानी के साथ खाने के बाद ले.
आरोग्यवधिँनी वटि सुबह शाम २-२ गोली गुनगुने पानी के साथ खाने से पहले ले.
पंचतिक्त ध्रूत गुगुल सुबह शाम २-२ गोली लो.
रोज रात को ४ ग्राम गौमुञ हरड का चूरन ले.
लगाने के लीये तैयार आैषधि
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. मरिच्यादि तैल को लगाये दिनमे २ बार.
हरड़ द्वारा विभिन्न रोगों में उपचार (Treatment of various diseases)
मुंह के छाले:
छोटी हरड़ को पानी में घिसकर छालों पर 3 बार प्रतिदिन लगाने से मुंह के छाले नष्ट हो जाते हैं।छोटी हरड़ को बारीक पीसकर छालों पर लगाने से मुंह व जीभ के छाले मिट जाते हैं।छोटी हरड़ को रात को भोजन करने के बाद चूसने से छाले खत्म होते हैं।पिसी हुई हरड़ 1 चम्मच रोज रात को सोते समय गर्म दूध या गर्म पानी के साथ फंकी लें। इससे छालों में आराम मिलता है।
गैस:
छोटी हरड़ एक-एक की मात्रा में दिन में 3 बार पूरी तरह से चूसने से पेट की गैस नष्ट हो जाती है।छोटी हरड़ को पानी में डालकर भिगो दें। रात का खाना खाने के बाद चबाकर खाने से पेट साफ हो जाता और गैस कम हो जाती है।हरड़, निशोथ, जवाखार और पीलू को बराबर मात्रा में पीसकर चूर्ण बना लें। इसमें से आधा चूर्ण सुबह और शाम खाना खाने के बाद खाने से लाभ मिलता है।
घाव:
हरड़ को जलाकर उसे पीसे और उसमें वैसलीन डालकर घाव पर लगायें। इससे लाभ पहुंचेगा।3-5 हरड़ को खाकर ऊपर से गिलोय का काढ़ा पीने से घाव का दर्द व जलन दूर हो जाती है।
एक्जिमा:
गौमूत्र में हरड़ को पीसकर तैयार लेप को रोजाना 2-3 बार लगाने से एक्जिमा का रोग ठीक हो जाता है।
बच्चों के पेट रोग (उदर):
हर हफ्ते हरड़ को घिसकर एक चौथाई चम्मच की मात्रा में शहद के साथ सेवन कराते रहने से बच्चों के पेट के सारे रोग दूर हो जाते हैं।
बुद्धि के लिए:
भोजन के दौरान सुबह-शाम आधा चम्मच की मात्रा में हरड़ का चूर्ण सेवन करते रहने से बुद्धि और शारीरिक बल में वृद्धि होती है।
भूख बढ़ाने के लिए:
हरड़ के टुकड़ों को चबाकर खाने से भूख बढ़ती है।
पतले दस्त:
कच्चे हरड़ के फलों को पीसकर बनाई चटनी एक चम्मच की मात्रा में 3 बार सेवन करने से पतले दस्त बंद हों जाएंगे।
गर्मी के फोड़े, व्रण:
त्रिफला को लोहे की कड़ाही में जलाकर उसकी राख शहद मिलाकर लगाना चाहिए।
शनैमेह पर:
त्रिफला और गिलोय का काढ़ा पिलाना चाहिए।
अण्डवृद्धि:
सुबह के समय छोटी हरड़ का चूर्ण गाय के मूत्र के साथ या एरण्ड के तेल में मिलाकर देना चाहिए या त्रिफला दूध के साथ देना चाहिए।त्रिफला के काढ़े में गोमूत्र मिलाकर पिलाना चाहिए।
खांसी:
हरड़ और बहेड़े का चूर्ण शहद के साथ लेना चाहिए।
दर्द:
हरड़ का चूर्ण घी और गुड़ के साथ देना चाहिए।
आंख के रोग:
त्रिफला का चूर्ण 7-8 ग्राम रात को पानी में डालकर रखें। सुबह उठकर थोड़ा मसलकर कपड़े से छान लें और छाने हुए पानी से आंखों को धोएं। इससे कुछ ही दिनों के बाद आंखों के सभी तरह के रोग ठीक हो जाएंगे।त्रिफला चूर्ण के साथ आधा चम्मच हरड़ का चूर्ण घी के साथ लें। इससे नेत्रों के रोगों में लाभ मिलता है।
पेशाब की जलन:
हरड़ के चूर्ण में शहद मिलाकर चाटकर खाने से, पेशाब करते समय होने वाला जलन और दर्द खत्म हो जाता है।हरड़ के चूर्ण को मट्ठे के साथ रोज खाने से पेशाब के रोग ठीक हो जाते हैं।
गैस के कारण पेट में दर्द:
हरड़ का चूर्ण 3 ग्राम गुड़ के साथ खाने से गैस के कारण पेट का दर्द दूर हो जाता है।
आन्त्रवृद्धि:
हरड़ों के बारीक चूर्ण में कालानमक, अजवायन और हींग मिलाकर 5 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम हल्के गर्म पानी के साथ खाने या इस चूर्ण का काढ़ा बनाकर पीने से आन्त्रवृद्धि की विकृति खत्म होती है।हरड़, मुलहठी, सोंठ 1-1 ग्राम पाउडर रात को पानी के साथ खाने से लाभ होता है।
आंख आना:
हरड़ को रात को पानी में डालकर रखें। सुबह उठकर उस पानी को कपड़े से छानकर आंखों को धोने से आंखों का लाल होना दूर होता है।
श्वास या दमा रोग:
सोंठ और हरड़ के काढ़े को 1 या 2 ग्राम की मात्रा तक गर्म पानी के साथ लेने से श्वास रोग ठीक हो जाता है।हरड़, बहेड़ा, आमला और छोटी पीपल चारों को बराबर मात्रा में लेकर उसका चूर्ण तैयार कर लेते हैं। इसे एक ग्राम तक की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर चाटने से श्वासयुक्त खांसी खत्म हो जाती है।हरड़ को कूटकर चिलम में भरकर पीने से श्वास का तीव्र रोग थम जाता है।
मलेरिया का बुखार:
हरड़ का चूर्ण 10 ग्राम को 100 मिलीलीटर पानी में पकाकर काढ़ा बना ले। यह काढ़ा दिन में 3 बार पीने से मलेरिया में फायदा होता है।
वात-पित्त का बुखार:
हरड़, बहेड़ा, आंवला, अडूसा, पटोल (परवल) के पत्ते, कुटकी, बच और गिलोय को मिलाकर पीसकर काढ़ा बना लें, जब काढ़ा ठण्डा हो जाये तब उसमें शहद डालकर रोगी को पिलाने से वात-पित्त का बुखार समाप्त होता है।