🐚♦नकसीर♦🐚
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🔹तत्काल नकसीर बन्द करने के लिए तीन ग्राम सुहागे को थोड़े पानी में घोलकर दोनों नथुनों पर लेप कर दें। नकसीर तत्काल बन्द हो जाएगी
🔹सिर पर ठंडे पानी की धार डालने से नाक से रक्त गिरना शीध्र बंद हो जाता है। यदि नकसीर बंद न हो तो उपरोक्त सुहागे के घोल के लेप से अवश्य बंद हो जाएगी।
🔹पुरानी नकसीर की बिमारी में संजीवनी — बीस ग्राम मुल्तानी मिट्टी को जरा सा कूटकर रात्रि के समय मिट्टी के वर्तन में पाव किलो पानी में डालकर भिगो दें। प्रातः पानी को निथार कर छान लें। इस साफ पानी को पिलाने से (बच्चों को आधी मात्रा) दो-तीन दिन पिलाने से वर्षों पुराना रोग सदा के लिए समूल नाश गो जाता है। बच्चों को इस पानी में बताशा या मिश्री मिलाकर पिलाएँ।
विशेष — नदी के समान बहती हुई नकसीर इससे तत्काल बंद हो जाती है। जिनको दिन में कई बार नकसीर फूटती हो उनके लिए भी संजीवनी के समान उत्तम है। मुल्तानी मिट्टी का पानी पिलाने के साथ नीचे बैठी हुई मुल्तानी मिट्टी का रोगी के मस्तिष्क तथा नाक पर पाँच मिनट के करने से और भी अधिक लाभ होगा।
रविवार, 15 मई 2016
नकसीर
कमर दर्द से बचने के उपाय
1. रोज सुबह सरसों या नारियल के तेल में लहसुन की तीन-चार कलियॉ डालकर (जब तक लहसुन की कलियां काली न हो जायें) गर्म कर लें। ठंडा होने पर इस तेल से कमर की मालिश करें।
2. नमक मिले गरम पानी में एक तौलिया डालकर निचोड़ लें। इसके बाद पेट के बल लेट जाएं। दर्द के स्थान पर तौलिये से भाप लें। कमर दर्द से राहत पहुंचाने का यह एक अचूक उपाय है।
3. कढ़ाई में दो-तीन चम्मच नमक डालकर इसे अच्छे से सेक लें। इस नमक को थोड़े मोटे सूती कपड़े में बांधकर पोटली बना लें। कमर पर इस पोटली से सेक करने से भी दर्द से आराम मिलता है।
4. अजवाइन को तवे के पर थोड़ी धीमी आंच पर सेंक लें। ठंडा होने पर धीरे-धीरे चबाते हुए निगल जाएं। इसके नियमित सेवन से कमर दर्द में लाभ मिलता है।
5. अधिक देर तक एक ही पोजीशन में बैठकर काम न करें। हर चालीस मिनट में अपनी कुर्सी से उठकर थोड़ी देर टहल लें।
6. नर्म गद्देदार सीटों से परहेज करना चाहिए। कमर दर्द के रोगियों को थोड़ा सख्ते बिस्तर बिछाकर सोना चाहिए।
. कैल्शियम की कम मात्रा से भी हड्डियां कमजोर हो जाती हैं, इसलिए कैल्शियमयुक्त चीजों का सेवन करें।
9. कमर दर्द के लिए व्यायाम भी करना चाहिए। सैर करना, तैरना या साइकिल चलाना सुरक्षित व्यायाम हैं। तैराकी जहां वजन तो कम करती है, वहीं यह कमर के लिए भी लाभकारी है। साइकिल चलाते समय कमर सीधी रखनी चाहिए। व्यायाम करने से मांसपेशियों को ताकत मिलेगी तथा वजन भी नहीं बढ़ेगा।
10. कमर दर्द में भारी वजन उठाते समय या जमीन से किसी भी चीज को उठाते समय कमर के बल ना झुकें बल्कि पहले घुटने मोड़कर नीचे झुकें और जब हाथ नीचे वस्तु तक पहुंच जाए तो उसे उठाकर घुटने को सीधा करते हुए खड़े हो जाएं।
11. कार चलाते वक्त सीट सख्त होनी चाहिए, बैठने का पोश्चर भी सही रखें और कार ड्राइव करते समय सीट बेल्ट टाइट कर लें।
12. ऑफिस में काम करते समय कभी भी पीठ के सहारे न बैठें। अपनी पीठ को कुर्सी पर इस तरह टिकाएं कि यह हमेशा सीधी रहे। गर्दन को सीधा रखने के लिए कुर्सी में पीछे की ओर मोटा तौलिया मोड़ कर लगाया जा सकता है।
इन सब उपायों को अपना कर आप भी कमर दर्द से कुछ निजात पा सकते है।
पेट कम करने के लिए एक्सरसाइज--
हर कोई अपना पेट फ्लैट और सपाट चाहता है, लेकिन उसे लगता है कि इसके लिए जिम जाकर कड़ी मेहनत करनी होगी। लेकिन यहां पेट कम करने के लिए आपको न तो जिम जाने की जरूरत है और न ही कड़ी मेहनत करने की। अगर आपके पास रोजाना सिर्फ 15 मिनट का समय है तो आप अपने घर पर ही थोड़ी-सी मेहनत करके अपना पेट कम कर सकते हैं।
(Note : एक्सपर्ट के अनुसार अगर आप ये सभी एक्सरसाइज कर सकें तो बेहतर रिजल्ट मिलेंगे। लेकिन सभी न कर सकें तो इनमें से एक या दो भी चुन सकते हैं। पॉजिटिव रिजल्ट जरूर मिलेंगे)
Benefits and Methods of Leg stretching...
Benefits and Methods of Leg stretching...
It is therefore important to include leg stretches into your daily exercise routine.
The best leg stretches work all the major muscle groups in the lower extremities helping reduce stress and improving flexibility.
Stretches such as static stretches, dynamic stretches and yoga leg stretches target all the major leg muscles such as the hip flexors, quadriceps, hamstrings, calves, and shins.
Yoga poses such as Down Dog pose, Mountain pose, Tree pose, Triangle pose, the Warrior poses, the Half Moon pose, and the Wheel pose all require strong legs.
Practicing these postures will redefine your leg muscles over time and improve their strength.
This will make it easier for you to hold these poses for longer as well.
These stretches also lessen the risk of soreness and muscle fatigue.
This is especially necessary if you work out or play any type of sport.
From aerobics to weight training, soccer to running, strong legs are always an asset and leg stretches can help improve your performance both in the field and off.
Benefits Of Leg Stretching
Leg stretches when done properly can reduce the risk of injury, strengthen the muscles and improve stamina and flexibility.
Leg stretches can also increase your range of motion - an important advantage for runners and sportsmen who can improve their performance on field as a result.
Prolonged yoga leg stretches can
even reduce cholesterol and prevent the hardening of arteries.
तुलसी
तुलसी के अनजाने फायदे जानिए
तुलसी में कई औषधीय गुण होते हैं। हृदय रोग हो या सर्दी जुकाम, भारत में सदियों से तुलसी का इस्तेमाल होता चला आ रहा है।
गले की खराश
चाय की पत्तियों को उबालकर पीने से गले की खराश दूर हो जाती है। इस पानी को आप गरारा करने के लिए भी इस्तेमाल कर सकते हैं। बच्चों में बुखार, खांसी और उल्टी जैसी सामान्य समस्याओं में तुलसी बहुत फायदेमंद है।
श्वास की समस्या
श्वास संबंधी समस्याओं का उपचार करने में तुलसी खासी उपयोगी साबित होती है। शहद, अदरक और तुलसी को मिलाकर बनाया गया काढ़ा पीने से ब्रोंकाइटिस, दमा, कफ और सर्दी में राहत मिलती है। नमक, लौंग और तुलसी के पत्तों से बनाया गया काढ़ा इंफ्लुएंजा (एक तरह का बुखार) में फौरन राहत देता है।
गुर्दे की पथरी
तुलसी गुर्दे को मजबूत बनाती है। यदि किसी के गुर्दे में पथरी हो गई हो तो उसे शहद में मिलाकर तुलसी के अर्क का नियमित सेवन करना चाहिए। छह महीने में फर्क दिखेगा।
हृदय रोग
तुलसी खून में कोलेस्ट्राल के स्तर को घटाती है। ऐसे में हृदय रोगियों के लिए यह खासी कारगर साबित होती है।
त्वचा रोग
अल्सर और मुंह के अन्य संक्रमण में तुलसी की पत्तियां फायदेमंद साबित होती हैं। रोजाना तुलसी की कुछ पत्तियों को चबाने से मुंह का संक्रमण दूर हो जाता है। दाद, खुजली और त्वचा की अन्य समस्याओं में तुलसी के अर्क को प्रभावित जगह पर लगाने से कुछ ही दिनों में रोग दूर हो जाता है। नैचुरोपैथों द्वारा ल्यूकोडर्मा का इलाज करने में तुलसी के पत्तों को सफलता पूर्वक इस्तेमाल किया गया है।
सांसों की दुर्गध
तुलसी की सूखी पत्तियों को सरसों के तेल में मिलाकर दांत साफ करने से सांसों की दुर्गध चली जाती है। पायरिया जैसी समस्या में भी यह खासा कारगर साबित होती है। सिर के दर्द में तुलसी एक बढि़या दवा के तौर पर काम करती है। तुलसी का काढ़ा पीने से सिर के दर्द में आराम मिलता है। आंखों की जलन में तुलसी का अर्क बहुत कारगर साबित होता है। रात में रोजाना श्यामा तुलसी के अर्क को दो बूंद आंखों में डालना चाहिए।
शनिवार, 14 मई 2016
छाछ (मट्ठा, तक्र)---
छाछ (मट्ठा, तक्र)
छाछ या मट्ठा शरीर में उपस्थित विजातीय तत्वों को बाहर निकालकर नया जीवन प्रदान करता है। यह शरीर में प्रतिरोधात्मक (रोगों से लड़ने की शक्ति) शक्ति पैदा करता है। छाछ में घी नहीं होना चाहिए। गाय के दूध से बनी छाछ सर्वोत्तम होती है। छाछ का सेवन करने से जो रोग नष्ट होते हैं। वे जीवन में फिर दुबारा कभी नहीं होते हैं। छाछ खट्टी नहीं होनी चाहिए। पेट के रोगों में छाछ को दिन में कई बार पीना चाहिए। गर्मी में छाछ पीने से शरीर तरोताजा रहता है। रोजाना नाश्ते और भोजन के बाद छाछ पीने से शारीरिक शक्ति बढ़ती है। छाछ को पीने से सिर के बाल असमय में सफेद नहीं होते हैं। भोजन के अन्त में छाछ, रात के मध्य दूध और रात के अन्त में पानी पीने से स्वास्थ्य अच्छा रहता है।
विभिन्न रोगों में सहायक :
1. बवासीर:
1 गिलास छाछ में नमक और 1 चम्मच पिसी हुई अजवायन मिलाकर पीने से बवासीर रोग में लाभ मिलता है। छाछ के उपयोग से बवासीर दुबारा नहीं होती है। छाछ में कालानमक मिलाना लाभकारी होता है। छाछ में भुना हुआ जीरा मिलाकर पीना बवासीर के रोग में लाभकारी होता है।
भोजन करने के बाद छाछ में सेंधानमक मिलाकर पीयें अथवा छाछ में सौंठ या पीपल या प्याज का साग मिलाकर रोज पीने से बवासीर का रोग दूर होता है।
ताजी छाछ में चित्रक की जड़ का चूर्ण मिलाकर रोजाना पीने से लम्बे समय का बवासीर ठीक हो जाता है। छाछ के प्रयोग से दूर होने वाली बवासीर दुबारा नहीं होती है।
गाय की छाछ में कालीमिर्च सोंठ, पीपर और बीड़ लवण का चूर्ण मिलाकर पीने से बवासीर में लाभ होता है।
2. अजीर्ण: घी, तेल और मूंगफली अधिक खाने से अजीर्ण का कष्ट होने पर छाछ पीने से लाभ मिलता है।
3. भांग का नशा: खट्टी छाछ पीने से भांग का नशा उतर जाता है।
4. मोटापा:
छाछ पीने से मोटापा कम हो जाता है।
छाछ में काला नमक और अजवाइन मिलाकर पीने से मोटापा कम होता है।
5. अपच: अपच (भोजन का न पचना) के रोग में छाछ एक सर्वोत्तम औषधि है। तली, भुनी, गरिष्ठ चीजों को पचाने में छाछ बहुत ही लाभकारी होती है। छाछ आंतों में स्वास्थ्यवर्द्धक कीटाणुओं की वृद्धि करता है। यह आंतों में सड़ान्ध को रोकती है। छाछ में सेंधानमक, भुना हुआ जीरा तथा कालीमिर्च पीसकर मिलाकर सेवन करने से अजीर्ण (भूख न लगना) दूर हो जाता है।
6. शक्तिवर्द्धक: छाछ पीने से पाचन संस्थान की शुद्धि होकर रस का भलीप्रकार संचार होने लगता है तथा आंतों से संबन्धित कोई रोग नहीं होता है। रोजाना छाछ पीने से शरीर की पुष्टि, बल, प्रसन्नता, चेहरे की चमक बढ़ती है। पिसी हुई अजवायन, कालानमक और छाछ तीनों को मिलाकर भोजन के अन्त में रोजाना कुछ दिन तक पीने से लाभ होता है। छाछ में कालीमिर्च और नमक मिलाकर भी पी सकते हैं।
7. सौंदर्यवर्द्धक: छाछ से चेहरा धोने से चेहरे की कालिमा, मुंहासे के दाग और चिकनाहट दूर होती है और चेहरा सौंदर्यवान (चमकदार) बनता है।
8. संग्रहणी: संग्रहणी सदृश्य (दस्त) रोगों में रोगियों को गाय के दूध की छाछ में सोंठ और पीपर का चूर्ण डालकर पिलाने से लाभ होता है। इस प्रयोग काल में आहार में केवल छाछ और चावल का ही प्रयोग करें।
9. रक्तविकार: गाय की ताजा, फीकी छाछ पीने से रक्तवाहनियों (खून की नलियों) का खून साफ हो जाता है और रस बल तथा पुष्टि बढ़ती है तथा शरीर की चमक बढ़ जाती है। इससे मन प्रसन्न होता है तथा यह वात, कफ संबन्धी रोगों को नष्ट करती है।
10. पेट का भारीपन: सोंठ, कालीमिर्च, पीपल और कालानमक को बराबर मात्रा में लेकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को छाछ में मिलाकर पीने से पेट का भारीपन और अजीर्ण रोग (भूख न लगना) समाप्त हो जाता है।
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बिल्व (इगल मार्मेलोज)--
बिल्व (इगल मार्मेलोज)
कहा गया है- 'रोगान बिलत्ति-भिनत्ति इति बिल्व ।' अर्थात् रोगों को नष्ट करने की क्षमता के कारण बेल को बिल्व कहा गया है । इसके अन्य नाम हैं-शाण्डिल्रू (पीड़ा निवारक), श्री फल, सदाफल इत्यादि । मज्जा 'बल्वकर्कटी' कहलाती है तथा सूखा गूदा बेलगिरी ।
वानस्पतिक परिचय-
सारे भारत में विशेषतः हिमालय की तराई में, सूखे पहाड़ी क्षेत्रों में 4 हजार फीट की ऊँचाई तक पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है । मध्य व दक्षिण भारत में बेल जंगल के रूप में फैला पाया जाता है । आध्यात्मिक दृष्टि से महत्त्वपूर्ण होने के कारण इसे मंदिरों के पास लगाया जाता है । 15 से 30 फीट ऊँचे कँटीले वृक्ष फलों से लदे अलग ही पहचान में आ जाते हैं । पत्ते संयुक्त विपत्रक व गंध युक्त होते हैं । स्वाद में वे तीखे होते हैं । गर्मियों में पत्ते गिर जाते हैं तथा मई में नए पुष्प आ जाते हैं । फल अलगे वर्ष मार्च से मई के बीच आ जाते हैं । फूल हरी आभा लिए सफेद रंग के होते हैं । सुगंध इनकी मन को भाने वाली होती है । फल 5 से 17 सेण्टीमीटर व्यास के होते हैं । खोल (शेल) कड़ा व चिकना होता है । पकने पर हरे से सुनहरे पीले रंग का हो जाता है । खोल को तोड़ने पर मीठा रेशेदार सुगंधित गूदा निकलता है । बीज छोटे, बड़े व कई होते हैं । बाजार में दो प्रकार के बेल मिलते हैं- छोटे जंगली और बड़े उगाए हुए । दोनों के गुण समान हैं । जंगलों में फल छोटा व काँटे अधिक तथा उगाए गए फलों में फल बड़ा व काँटे कम होते हैं ।
शुद्धाशुद्ध परीक्षा पहचान-
बेल का फल अलग से पहचान में आ जाता है । इसकी अनुप्रस्थ काट करने पर यह 10-15 खण्डों में विभक्त सा मालूम होता है, जिनमें प्रत्येक में 6 से 10 बीज होते हैं । ये सभी बीज सफेद लुआव से परस्पर जुड़े होते हैं । प्रायः सर्वसुलभ होने से इसमें मिलावट कम होती है । कभी-कभी इसमें गार्मीनिया मेंगोस्टना तथा कैथ के फल मिला दिए जाते हैं, परन्तु इसे काट कर इसकी परीक्षा की जा सकती है ।
संग्रह-संरक्षण एवं कालावधि-
छोटे कच्चे बेल के फलों का संग्रह कर, उन्हें अच्छी तरह छीलकर गोल-गोल कतरे नुमा टुकड़े काटकर सुखाकर मुख बंद डिब्बों में नमी रहती शीतल स्थान में रखना चाहिए । औषधि प्रयोग हेतु जंगली बेल ही प्रयुक्त होते हैं । खाने, शर्बत आदि के लिए ग्राम्य या लाए हुए फल ही प्रयुक्त होते हैं । इनकी वीर्य कालावधि लगभग एक वर्ष है ।
गुण-कर्म संबंधी विभिन्न मत-
आचार्य चरक और सुश्रुत दोनों ने ही बेल को उत्तम संग्राही बताया है । फल-वात शामक मानते हुए इसे ग्राही गुण के कारण पाचन संस्थान के लिए समर्थ औषधि माना गया है । आर्युवेद के अनेक औषधीय गुणों एवं योगों में बेल का महत्त्व बताया गया है, परन्तु एकाकी बिल्व, चूर्ण, मूलत्वक्, पत्र स्वरस भी बहुत अधिक लाभदायक है ।
चक्रदत्त बेल को पुरानी पेचिश, दस्तों और बवासीर में बहुत अधिक लाभकारी मानते हैं । बंगसेन एवं भाव प्रकाश ने भी इसे आँतों के रोगों में लाभकारी पाया है । डॉ. खोटी लिखते हैं कि बेल का फल बवासीर रोकता व कब्ज की आदत को तोड़ता है । आँतों की कार्य क्षमता बढ़ती है, भूख सुधरती है एवं इन्द्रियों को बल मिलता है ।
डॉ. नादकर्णी ने इसे गेस्ट्रोएण्टेटाइटिस एवं हैजे के ऐपीडेमिक प्रकोपो (महामारी) में अत्यंत उपयोगी अचूक औषधि माना है । विषाणु के प्रभाव को निरस्त करने तक की इसमें क्षमता है । डॉ. डिमक के अनुसार बेल का फल कच्ची व पकी दोनों ही अवस्थाओं में आँतों को लाभ करता है । कच्चा या अधपका फल गुण में कषाय (एस्ट्रोन्जेण्ट) होता है तथा अपने टैनिन एवं श्लेष्म (म्यूसीलेज) के कारण दस्त में लाभ करता है । पुरानी पेचिस, अल्सरेटिव कोलाइटिस जैसे जीर्ण असाध्य रोग में भी यह लाभ करता है । पका फल, हलका रेचक होता है । रोग निवारक ही नहीं यह स्वास्थ्य संवर्धक भी है ।
अन्य उपयोग-
आँखों के रोगों में पत्र स्वरस, उन्माद-अनिद्रा में मूल का चूर्ण, हृदय की अनियमितता में फल, शोथ रोगों में पत्र स्वरस का प्रयोग होता है । श्वांस रोगों में एवं मधुमेह निवारण हेतु भी पत्र का स्वरस सफलतापूर्वक प्रयुक्त होता है । विषम ज्वरों के लिए मूल का चूर्ण व पत्र स्वरस उपयोगी है । सामान्य दुर्बलता के लिए टॉनिक के समान प्रयोग करने के लिए बेल का उपयोग पुराने समय से ही होता आ रहा है । समस्त नाड़ी संस्थान को यह शक्ति देता है तथा कफ-वात के प्रकोपों को शांत करता है ।
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