रविवार, 1 मार्च 2015

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मंगलवार, 24 फ़रवरी 2015

जानिए मलेरिया की रोकथाम तथा नियंत्रण

जानिए मलेरिया की रोकथाम तथा नियंत्रण---- मलेरिया की रोकथाम के लिये मच्छरों का नियंत्रण अत्यधिक प्रभावशाली उपाय है।
मलेरिया का प्रसार इन कारकों पर निर्भर करता है- मानव जनसंख्या का घनत्व, मच्छरों की जनसंख्या का घनत्व, मच्छरों से मनुष्यों तक प्रसार और मनुष्यों से मच्छरों तक प्रसार। इन कारकों में से किसी एक को भी बहुत कम कर दिया जाए तो उस क्षेत्र से मलेरिया को मिटाया जा सकता है। इसीलिये मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों मे रोग का प्रसार रोकने हेतु दवाओं के साथ-साथ मच्छरों का उन्मूलन या उनसे काटने से बचने के उपाय किये जाते हैं। अनेक अनुसंधान कर्ता दावा करते हैं कि मलेरिया के उपचार की तुलना मे उस से बचाव का व्यय दीर्घ काल मे कम रहेगा, हालांकि विश्व के कुछ सर्वाधिक निर्धन देशों में इसका तात्कालिक व्यय उठाने की क्षमता भी नहीं है। आर्थिक सलाहकार जैफ़री सैक्स के अनुसार प्रतिवर्ष 3 अरब अमेरिकी डालर की सहायता देकर मलेरिया का प्रसार रोका जा सकता है। साथ ही यह तर्क दिया जाता है कि सहस्राब्दी विकास लक्ष्य (अंग्रेजी: Millennium Development Goal, मिलेनियम डेवलपमेंट गोल) पूरा करने हेतु धन को एड्स उपचार से हटा कर मलेरिया रोकथाम में लगाया जाए तो अफ्रीकी देशों को अधिक लाभ होगा।

1956-1960 के दशक मे विश्व स्तर पर मलेरिया उन्मूलन के व्यापक प्रयास किये गये (वैसे ही जैसे चेचक उन्मूलन हेतु किये गये थे)। किंतु उनमे सफलता नहीं मिल सकी और मलेरिया आज भी अफ्रीका मे उसी स्तर पर मौजूद है। जबकि ब्राजील, इरीट्रिया, भारत और वियतनाम जैसे कुछ विकासशील देश है जिन्होंने इस रोग पर काफी हद तक काबू पा लिया है। इसके पीछे निम्न कारण माने गये हैं- प्रभावी उपकरणों का प्रयोग, सरकार का बेहतर नेतृत्व, सामुदायिक भागीदारी, विकेन्द्रीकृत क्रियान्वयन, कुशल तकनीकी-प्रबंधक कामगार मिलना, भागीदार संस्थाओं द्वारा सही तकनीकी सहयोग देना तथा पर्याप्त कोष मिलना।[1]

मच्छरों के प्रजनन पर नियंत्रण
मच्छरों के प्रजनन स्थलों को नष्ट करके मलेरिया पर बहुत नियंत्रण पाया जा सकता है। खड़े पानी में मच्छर अपना प्रजनन करते हैं, ऐसे खड़े पानी की जगहों को ढक कर रखना, सुखा देना या बहा देना चाहिये या पानी की सतह पर तेल डाल देना चाहिये, जिससे मच्छरों के लारवा सांस न ले पाएं। मलेरिया उन्मूलन के जो प्रयास पूर्णतः सफल रहे हैं उनमें मच्छरों के उन्मूलन का प्रमुख स्थान था। कभी यह रोग संयुक्त राज्य अमेरिका तथा दक्षिण यूरोप मे आम हुआ करता था, किंतु बेहतर जल निकास द्वारा मच्छरों के प्रजनन स्थल दलदली क्षेत्रों को सुखा कर, मरीजों पर कड़ी निगरानी रख कर और उनका तुरंत उपचार करके इसे इन क्षेत्रों से मिटा दिया गया। वर्ष 2002 में अमेरिका से सिर्फ 1059 मामले सामने आये जिनसे 8 लोग मरे।

इनके अतिरिक्त आनुवांशिक तकनीकों से परिवर्तित मच्छर बनाए जा रहे हैं जो मलेरिया परजीवी को पलने नहीं देंगे।[2] ऐसे मच्छरों को खुला छोड़ देने पर धीरे-धीरे इनकी प्रतिरक्षा की जीन मच्छरों की सारी आबादी में फैल जाएगी।

घरों मे दवा का छिडकाव
मलेरिया-प्रभावित क्षेत्रों में अकसर घरों की दीवारों पर कीटनाशक दवाओं का छिड़काव किया जाता है। अनेक प्रजातियों के मच्छर मनुष्य का खून चूसने के बाद दीवार पर बैठ कर इसे हजम करते हैं। ऐसे में अगर दीवारों पर कीटनाशकों का छिड़काव कर दिया जाए तो दीवार पर बैठते ही मच्छर मर जाएगा, किसी और मनुष्य को काटने के पहले ही।

डीडीटी पहला आधुनिक कीटनाशक था जो मलेरिया के विरूद्ध प्रयोग किया गया था, किंतु बाद में यानि 1950 के बाद इसे कृषि कीटनाशी रूप में प्रयोग करने लगे थे। खेतों में इसके भारी प्रयोग से अनेक क्षेत्रों में मच्छर इसके प्रति प्रतिरोधी हो गए। 1960 के दशक में इसके हानिकारक प्रभाव नजर आने लगे और 1970 के दशक मे अनेक देशों मे इसके प्रयोग पर रोक लगा दी गयी। इस दवा के प्रयोग पर रोक लगाने को काफी विवादास्पद माना गया है। वैसे इसे मलेरिया नियंत्रण हेतु कभी प्रतिबंधित नहीं किया गया, किंतु आलोचक कहते है कि अनावश्यक लगी रोक से लाखों लोगों के प्राण गए हैं। फिर समस्या डीडीटी के कृषि क्षेत्र में व्यापक प्रयोग से हुई थी ना कि इसका प्रयोग जन स्वास्थय क्षेत्र में करने से।[3]

विश्व स्वास्थ्य संगठन ने मलेरिया प्रभावित क्षेत्रों में छिडकाव के लिए लगभग 12 दवाओं को मान्यता दी है। इनमें डीडीटी के अलावा परमैथ्रिन और डेल्टामैथ्रिन जैसी दवाएँ शामिल हैं, खासकर उन क्षेत्रों मे जहाँ मच्छर डीडीटी के प्रति रोधक क्षमता विकसित कर चुके है।[4] स्टॉकहोम कन्वेंशन डीडीटी के स्वास्थ्य-संबंधी सीमित प्रयोग की छूट देता है किंतु इसें खुले मे कृषि कार्य हेतु प्रयोग लाना प्रतिबंधित है।[5]

हाल ही में एक कवक की खोज की गई है जो मच्छरों में एक जानलेवा बीमारी करती है और जिसके दीवारों पर छिड़काव से मच्छरों से छुटकारा मिल सकता है। अभी तक मच्छरों में इस फफूंद के प्रति प्रतिरोध क्षमता नहीं देखी गई है।[6]

मच्छरदानियाँ व अन्य उपाय
मच्छरदानियाँ मच्छरों को लोगों से दूर रखने मे सफल रहती हैं तथा मलेरिया संक्रमण को काफी हद तक रोकती हैं। एनोफिलीज़ मच्छर चूंकि रात को काटता है इसलिए बड़ी मच्छरदानी को चारपाई/बिस्तर पे लटका देने तथा इसके द्वारा बिस्तर को चारों तरफ से पूर्णतः घेर देने से सुरक्षा पूरी हो जाती है। मच्छरदानियाँ अपने आप में बहुत प्रभावी उपाय नहीं हैं किंतु यदि उन्हें रासायनिक रूप से उपचारित कर दें तो वे बहुत उपयोगी हो जाती हैं। इस रसायन के संपर्क मे आते ही मच्छर मर जाते है। उपचारित मच्छरदानियाँ अनोपचारित मच्छरदानियों से दोगुणी प्रभावी होती हैं और बिना मच्छरदानी के सोने के बजाय उनका प्रयोग करने से 70% ज्यादा सुरक्षा मिलती है।[7][8] कीटनाशी उपचारित मच्छरदानी के वितरण को मलेरिया नियंत्रण का बेहद सस्ता तथा प्रभावी उपाय माना जाता है इस प्रकार की एक सामान्य मच्छर दानी का मूल्य 2.50 डालर से 3.50 डालर रहता है। प्रभावित इलाकों मे प्रायः संयुक्त राष्ट्र एंजेसी या कोई अन्य संस्था उनका वितरण करती है। अधिकतम सुरक्षा हेतु आवश्यक है कि हर छह महीनों में इन पर फिर से रसायन का लेप किया जाये, किंतु ग्रामीण क्षेत्रों में ऐसा करना अकसर मुश्किल होता है। आजकल नवीन प्रौद्योगिकी से इस प्रकार की मच्छरदानी बन रही है जो पांच वर्ष तक कीटनाशी प्रभाव रखती है। इन मच्छरदानी के अन्दर सोने पर तो सुरक्षा मिलती ही है जो मच्छर इनके संपर्क मे आते है वे भी तुरंत मर जाते है जिससे आस-पास सोए अन्य लोगों को भी कुछ सुरक्षा मिल जाती है। हाल ही के प्रयोगों से पता लगा है कि बिस्तर पर बिछी और ओढ़ने वाली चादरों को दवाओं से उपचारित करने पर भी मच्छरदानी जितनी सुरक्षा मिल जाती है।[9]

निरोधी दवाएँ
अनेक दवाएँ आमतौर पर जिनका उपयोग उपचार में होता है उनका प्रयोग निरोधक प्रभाव हेतु भी किया जा सकता है। निरोधी प्रभाव के लिए दवाओं की मात्रा उपचार से कम ही होती है। किंतु इनके दीर्घ काल प्रयोग से हानि होती है, इसलिए महामारी क्षेत्रों में ये कम ही प्रयोग में लाई जाती हैं या मिलती ही नहीं हैं। हाँ यदि आप किसी ज्वर ग्रस्त क्षेत्र में अस्थाई रूप से जा रहे हैं तो इनका प्रयोग कर सकते हैं। कुनैन को बहुत पहले से इस कार्य के लिए प्रयोग किया जाता रहा है, हालांकि आजकल इसका प्रयोग उपचार हेतु ज्यादा होता है। 18वीं शताब्दी में सैमुएल हैनीमेन ने होम्योपैथी के सिद्धांत का आविष्कार कुनैन के प्रभाव को देख कर ही किया था। आज कल मेफ्लोक्वीन, डॉक्सीसाइक्लीन, एटोवाक्वोन और प्रोग्वानिल हाइड्रोक्लोराइड नामक औषधियाँ इस प्रयोग मे आ रही है। दवा चुनने से पूर्व क्षेत्र में सक्रिय परजीवी की दवा के प्रति प्रतिरोधक क्षमता का ज्ञान होना चाहिए। हर दवा के दुष्प्रभाव भिन्न भिन्न होते हैं। ये प्रयोग करते ही प्रभाव डालना शुरू नहीं कर देती है कम से कम 1 -2 सप्ताह का समय लेती हैं, तथा इन्हें मलेरिया-ग्रस्त क्षेत्र छोड़ देने कुछ समय बाद तक लेते रहना पड़ता है।

टीकाकरण
मलेरिया के विरूद्ध टीके विकसित किये जा रहे है यद्यपि अभी तक सफलता नहीं मिली है। पहली बार प्रयास 1967 में चूहे पे किया गया था जिसे जीवित किंतु विकिरण से उपचारित बीजाणुओं का टीका दिया गया। इसकी सफलता दर 60% थी।[10] उसके बाद से ही मानवों पर ऐसे प्रयोग करने के प्रयास चल रहे हैं। वैज्ञानिकों ने यह निर्धारण करने में सफलता प्राप्त की कि यदि किसी मनुष्य को 1000 विकिरण-उपचारित संक्रमित मच्छर काट लें तो वह सदैव के लिए मलेरिया के प्रति प्रतिरक्षा विकसित कर लेगा।[11] इस धारणा पर वर्तमान में काम चल रहा है और अनेक प्रकार के टीके परीक्षण के भिन्न दौर में हैं। एक अन्य सोच इस दिशा में है कि शरीर का प्रतिरोधी तंत्र किसी प्रकार मलेरिया परजीवी के बीजाणु पर मौजूद सीएसपी (सर्कमस्पोरोज़ॉइट प्रोटीन, circumsporozoite protein) के विरूद्ध एंटीबॉडी बनाने लगे।[12] इस सोच पर अब तक सबसे ज्यादा टीके बने तथा परीक्षित किये गये हैं। एसपीएफ66 (अंग्रेजी: SPf66) पहला टीका था जिसका क्षेत्र परीक्षण हुआ, यह शुरू में सफल रहा किंतु बाद मे सफलता दर 30% से नीचे जाने से असफल मान लिया गया। आज आरटीएस, एसएएस02ए (अंग्रेजी: RTS,S/AS02A) टीका परीक्षणों में सबसे आगे के स्तर पर है।[13] आशा की जाती है कि पी. फैल्सीपरम के जीनोम की पूरी कोडिंग मिल जाने से नयी दवाओं का तथा टीकों का विकास एवं परीक्षण करने में आसानी होगी।[14]

अन्य उपाय
मलेरिया-प्रभावित क्षेत्रों में मलेरिया के प्रति जागरूकता फैलाने से मलेरिया में 20 प्रतिशत तक की कमी देखी गई है। साथ ही मलेरिया का निदान और इलाज जल्द से जल्द करने से भी इसके प्रसार में कमी होती है। अन्य प्रयासों में शामिल है- मलेरिया संबंधी जानकारी इकट्ठी करके उसका बड़े पैमाने पर विश्लेषण करना और मलेरिया नियंत्रण के तरीके कितने प्रभावी हैं इसकी जांच करना। ऐसे एक विश्लेषण में पता लगा कि लक्षण-विहीन संक्रमण वाले लोगों का इलाज करना बहुत आवश्यक होता है, क्योंकि इनमें बहुत मात्रा में मलेरिया संचित रहता है।[15

Hand Wash






picture___स्वाईन फ्लू काढ़ा



















शनिवार, 17 जनवरी 2015

RBSK CHART









गुर्दे की पथरी की चिकित्सा"

गुर्दे की पथरी की चिकित्सा
"गुर्दे की पथरी की चिकित्सा"





आजकल पथरी का रोग लोगों में आम समस्या बनती जा रही है| जो अक्सर गलत खान पान की वजह से होता है।गुर्दे की पथरी (वृक्कीय कैल्कली, नेफरोलिथियासिस) (अंग्रेजी:Kidney stones) मूत्रतंत्र की एक ऐसी स्थिति है जिसमें, वृक्क (गुर्दे) के अन्दर छोटे-छोटे पत्थर सदृश कठोर वस्तुओं का निर्माण होता है। गुर्दें में एक समय में एक या अधिक पथरी हो सकती है। सामान्यत: ये पथरियाँ बिना किसी तकलीफ मूत्रमार्ग से शरीर से बाहर निकाल दी जाती हैं , किन्तु यदि ये पर्याप्त रूप से बड़ी हो जाएं ( २-३ मिमी आकार के) तो ये मूत्रवाहिनी में अवरोध उत्पन्न कर सकती हैं। इस स्थिति में मूत्रांगो के आसपास असहनीय पीड़ा होती है।
यह स्थिति आमतौर से 30 से 60 वर्ष के आयु के व्यक्तियों में पाई जाती है और स्त्रियों की अपेक्षा पुरूषों में चार गुना अधिक पाई जाती है। बच्चों और वृद्धों में मूत्राशय की पथरी ज्यादा बनती है, जबकि वयस्को में अधिकतर गुर्दो और मूत्रवाहक नली में पथरी बन जाती है। जिन मरीजों को मधुमेह की बीमारी है उन्हें गुर्दे की बीमारी होने की काफी संभावनाएं रहती हैं। अगर किसी मरीज को रक्तचाप की बीमारी है तो उसे नियमित दवा से रक्तचाप को नियंत्रण करने पर ध्यान देना चाहिए क्योंकि अगर रक्तचाप बढ़ता है, तो भी गुर्दे खराब हो सकते हैं।


गुर्दे की पथरी के कारण


किसी पदार्थ के कारण जब मूत्र सान्द्र (गाढ़ा) हो जाता है तो पथरी निर्मित होने लगती है। इस पदार्थ में छोटे छोटे दाने बनते हैं जो बाद में पथरी में तब्दील हो जाते है। इसके लक्षण जब तक दिखाई नहीं देते तब तक ये मूत्रमार्ग में बढ़ने लगते है और दर्द होने लगता है। इसमें काफी तेज दर्द होता है जो बाजू से शुरु होकर उरू मूल तक बढ़ता है।


तथा रोजाना भोजन करते समय उनमें जो कैल्शियम फॉस्फेट आदि तत्व रह जाते हैं, पाचन क्रिया की विकृति से इन तत्वों का पाचन नहीं हो पाता है। वे गुर्दे में एकत्र होते रहते हैं। कैल्शियम, फॉस्फेट के सूक्ष्म कण तो मूत्र द्वारा निकलते रहते हैं, जो कण नहीं निकल पाते वे एक दूसरे से मिलकर पथरी का निर्माण करने लगते हैं। पथरी बड़ी होकर मूत्र नली में पहुंचकर मूत्र अवरोध करने लगती है। तब तीव्र पीड़ा होती है। रोगी तड़पने लगता है। इलाज में देर होने से मूत्र के साथ रक्त भी आने लगता है जिससे काफी पीड़ा होती है। तथा लंबे समय तक पाचन शक्ति ठीक न रहने और मूत्र विकार भी बना रहे तो गुर्दों में कुछ तत्व इकट्ठे होकर पथरी का रूप धारण कर लेते हैं।




किसी प्रकार से पेशाब के साथ निकलने वाले क्षारीय तत्व किसी एक स्थान पर रुक जाते है,चाहे वह मूत्राशय हो,गुर्दा हो या मूत्रनालिका हो,इसके कई रूप होते है,कभी कभी यह बडा रूप लेकर बहुत परेशानी का कारक बन जाती है,पथरी की शंका होने पर किसी प्रकार से इसको जरूर चैक करवा लेना चाहिये.


गुर्दे की पथरी के लक्षण




पीठ के निचले हिस्से में अथवा पेट के निचले भाग में अचानक तेज दर्द, जो पेट व जांघ के संधि क्षेत्र तक जाता है। दर्द फैल सकता है या बाजू, श्रोणि, उरू मूल, गुप्तांगो तक बढ़ सकता है, यह दर्द कुछ मिनटो या घंटो तक बना रहता है तथा बीच-बीच में आराम मिलता है। दर्दो के साथ जी मिचलाने तथा उल्टी होने की शिकायत भीहो सकती है। यदि मूत्र संबंधी प्रणाली के किसी भाग में संक्रमण है तो इसके लक्षणों में बुखार, कंपकंपी, पसीना आना, पेशाब आने के साथ-साथ दर्द होना आदि भी शामिल हो सकते हैं ; बार बार और एकदम से पेशाब आना, रुक रुक कर पेशाब आना, रात में अधिक पेशाब आना, मूत्र में रक्त भी आ सकता है। अंडकोशों में दर्द, पेशाब का रंग असामान्य होना। गुर्दे की पथरी के ज्यादातर रोगी पीठ से पेट की तरफ आते भयंकर दर्द की शिकायत करते हैं। यह दर्द रह-रह कर उठता है और कुछ मिनटो से कई घंटो तक बना रहता है इसे ”रीलन क्रोनिन” कहते हैं। यह रोग का प्रमुख लक्षण है, इसमें मूत्रवाहक नली की पथरी में दर्दो पीठ के निचले हिस्से से उठकर जांघों की ओर जाता है।


गुर्दे की पथरी के प्रकार

सबसे आम पथरी कैल्शियम पथरी है। पुरुषों में, महिलाओं की तुलना में दो से तीन गुणा ज्यादा होती है। सामान्यतः 20 से 30 आयु वर्ग के पुरुष इससे प्रभावित होते है। कैल्शियम अन्य पदार्थों जैसे आक्सलेट(सबसे सामान्य पदार्थ) फास्फेट या कार्बोनेट से मिलकर पथरी का निर्माण करते है। आक्सलेट कुछ खाद्य पदार्थों में विद्यमान रहता है।
पुरुषों में यूरिक एसिड पथरी भी सामान्यतः पाई जाती है। किस्टिनूरिया वाले व्यक्तियों मेंकिस्टाइन पथरी निर्मित होती है। महिला और पुरुष दोनों में यह वंशानुगत हो सकता है।
मूत्रमार्ग में होने वाले संक्रमण की वजह से स्ट्रवाइट पथरी होती है जो आमतौर पर महिलाओं में पायी जाती है। स्ट्रवाइट पथरी बढ़कर गुर्दे, मूत्रवाहिनी या मूत्राशय को अवरुद्ध कर सकती है।


बचाव के कुछ उपाय1. पर्याप्त जल पीयें ताकि 2 से 2.5 लीटर मूत्र रोज बने।पथरी के मरीज को दिन में कम से कम 5-6 लीटर पानी पीना चाहिये। अधिक मात्रा में मुत्र बनने पर छोटी पथरी मुत्र के साथ निकल जाती है।


2. आहार में प्रोटीन, नाइट्रोजन तथा सोडियम की मात्रा कम हो।


3. ऐसे पदार्थ न लिये जांय जिनमें आक्जेलेट्‌ की मात्रा अधिक हो; जैसे चाकलेट, सोयाबीन, मूंगफली, पालक आदि


4. कोका कोला एवं इसी तरह के अन्य पेय से बचें।


5. विटामिन - सी की भारी मात्रा न ली जाय।


6. नारंगी आदि का रस (ज्यूस) लेने से पथरी का खतरा कम होता है।


पथरी में ये खाएं: 
कुल्थी के अलावा खीरा, तरबूज के बीज, खरबूजे के बीज, चौलाई का साग, मूली, आंवला, अनन्नास, बथुआ, जौ, मूंग की दाल, गोखरु आदि खाएं। कुल्थी के सेवन के साथ दिन में 6 से 8 गिलास सादा पानी पीना, खासकर गुर्दे की बीमारियों में बहुत हितकारी सिद्ध होता है।


ये न खाएं:
पालक, टमाटर, बैंगन, चावल, उड़द, लेसदार पदार्थ, सूखे मेवे, चॉकलेट, चाय, मद्यपान, मांसाहार आदि। मूत्र को रोकना नहीं चाहिए। लगातार एक घंटे से अधिक एक आसन पर न बैठें। जिसको भी शरीर मे पथरी है वो चुना कभी ना खाएं !काले अंगूरों के सेवन से परहेज करें।तिल, काजू अथवा खीरे, आँवला अथवा चीकू (सपोटा) में भी आक्सेलेट अधिक मात्रा में होता है।बैगन,फूलगोभी में यूरिक एसिड व प्यूरीन अधिक मात्रा में पाई जाती है।


पथरी का आयुर्वेद इलाज- आचार्य सुश्रुत ने अश्मरी चिकित्सा रोगाधिकार में कहा है कि पथरी में शल्य कर्म आवश्यक होता है . ऐसा बड़ी व उस पथरी के लिये कहा गया है जो मूत्र मार्ग में फंस जाती है. निम्न उपाय से पथरी के इलाज़ में काफी मदद मिलती है.


1. जिस व्यक्ति को पथरी की समस्या हो उसे खूब केला खाना चाहिए क्योंकि केला विटामिन बी-6 का प्रमुख स्रोत है, जो ऑक्जेलेट क्रिस्टल को बनने से रोकता है व ऑक्जेलिक अम्ल को विखंडित कर देता है। इसके आलावा नारियल पानी का सेवन करें क्योंकि यह प्राकृतिक पोटेशियम युक्त होता है, जो पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकता है और इसमें पथरी घुलती है।


2. कहने को करेला बहुत कड़वा होता है पर पथरी में यह भी रामबाण साबित होता है| करेले में पथरी न बनने वाले तत्व मैग्नीशियम तथा फॉस्फोरस होते हैं और वह गठिया तथा मधुमेह रोगनाशक है। जो खाए चना वह बने बना। पुरानी कहावत है। चना पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकता है।


3. गाजर में पायरोफॉस्फेट और पादप अम्ल पाए जाते हैं जो पथरी बनने की प्रक्रिया को रोकते हैं। गाजर में पाया जाने वाला केरोटिन पदार्थ मूत्र संस्थान की आंतरिक दीवारों को टूटने-फूटने से बचाता है।


4. इसके अलावा नींबू का रस एवं जैतून का तेल मिलकर तैयार किया गया मिश्रण गुर्दे की पथरी को दूर करने में बहुत हीं कारगर साबित होता है। 60 मिली लीटर नींबू के रस में उतनी हीं मात्रा में जैतून का तेल मिलाकर मिश्रण तैयार कर लें। इनके मिश्रण का सेवन करने के बाद भरपूर मात्रा में पानी पीते रहें।
इस प्राकृतिक उपचार से बहुत जल्द हीं आपको गुर्दे की पथरी से निजात मिल जायेगी साथ हीं पथरी से होने वाली पीड़ा से भी आपको मुक्ति मिल जाएगी।


5. पथरी को गलाने के लिये अध उबला चौलाई का साग दिन में थोडी थोडी मात्रा में खाना हितकर होता है, इसके साथ आधा किलो बथुए का साग तीन गिलास पानी में उबाल कर कपडे से छान लें, और बथुये को उसी पानी में अच्छी तरह से निचोड कर जरा सी काली मिर्च जीरा और हल्का सा सेंधा नमक मिलाकर इसे दिन में चार बार पीना चाहिये, इस प्रकार से गुर्दे के किसी भी प्रकार के दोष और पथरी दोनो के लिए साग बहुत उत्तम माने गये है।


6. जीरे को मिश्री की चासनी अथवा शहद के साथ लेने पर पथरी घुलकर पेशाब के साथ निकल जाती है। इसके अलावा तुलसी के बीज का हिमजीरा दानेदार शक्कर व दूध के साथ लेने से मूत्र पिंड में फ़ंसी पथरी निकल जाती है।


7. एक मूली को खोखला करने के बाद उसमे बीस बीस ग्राम गाजर शलगम के बीज भर दें, फ़िर मूली को गर्म करके भुर्ते की तरह भून लें, उसके बाद मूली से बीज निकाल कर सिल पर पीस लें,सुबह पांच या छ: ग्राम पानी के साथ एक माह तक पीते रहे, पथरी में लाभ होगा|


8. प्याज में पथरी नाशक तत्व होते हैं। करीब 70 ग्राम प्याज को अच्छी तरह पीसकर या मिक्सर में चलाकर पेस्ट बनालें। इसे कपडे से निचोडकर रस निकालें। सुबह खाली पेट पीते रहने से पथरी छोटे-छोटे टुकडे होकर निकल जाती है।


9. पहाडी कुल्थी और शिलाजीत दोनो एक एक ग्राम को दूध के साथ सेवन करने पथरी निकल जाती है


10. एक मूली को खोखला करने के बाद उसमे बीस बीस ग्राम गाजर शलगम के बीज भर दें,फ़िर मूली को गर्म करके भुर्ते की तरह भून लें,उसके बाद मूली से बीज निकाल कर सिल पर पीस लें,सुबह पांच या छ: ग्राम पानी के साथ एक माह तक पीते रहे,पथरी और पेशाब वाली बीमारियों में फ़ायदा मिलेगा।


11. सूखे आंवले को नमक की तरह से पीस लें,उसे मूली पर लगाकर चबा चबा कर खायें,सात दिन के अन्दर पथरी पेशाब के रास्ते निकल जायेगी,सुबह खाली पेट सेवन करने से और भी फ़ायदा होता है।


12. तुलसी के बीज का हिमजीरा दानेदार शक्कर व दूध के साथ लेने से मूत्र पिंड में फ़ंसी पथरी निकल जाती है।


13. पखानबेद नाम का एक पौधा होता है! उसे पथरचट भी कुछ लोग बोलते है! उसके पत्तों को पानी मे उबाल कर काढ़ा बना ले! मात्र 7 से 15 दिन मे पूरी पथरी खत्म!! और कई बार तो इससे भी जल्दी खत्म हो जाती


14. बथुआ को पानी में उबालकर इसके रस में नींबू, नमक व जीरा मिलाकर नियमित पीने से पेशाब में जलन, पेशाब के समय दर्द तथा पथरी दूर होती है।


16. पथरी से बचाव के लिये रातभर मक्के के बाल (सिल्क) को पानी में भिगाकर सुबह सिल्क हटाकर पानी पीने से लाभ होता है। पथरी के उपचार में सिल्क को पानी में उबालकर बनाये गये काढे का प्रयोग होता है।


17. आम के ताजा पत्ते छाया में सुखाकर, बारीक पीस कर आठ ग्राम मात्रा पानी मे मिलाकर प्रात: काल प्रतिदिन लेने से पथरी समाप्त हो सकती है।


18. दो अन्जीर एक गिलास पानी मे उबालकर सुबह के वक्त पीयें। एक माह तक लेना जरूरी है।





19. कुलथी की दाल का सूप पीने से पथरी निकलने के प्रमाण मिले है। २० ग्राम कुलथी दो कप पानी में उबालकर काढा बनालें। सुबह के वक्त और रात को सोने से पहिले पीयें।एक-दो सप्ताह में गुर्दे तथा मूत्राशय की पथरी गल कर बिना ऑपरेशन के बाहर आ जाती है, लगातार सेवन करते रहना राहत देता है।
कुल्थी का पानी विधिवत लेने से गुर्दे और मूत्रशय की पथरी निकल जाती है और नयी पथरी बनना भी रुक जाता है। किसी साफ सूखे, मुलायम कपड़े से कुल्थी के दानों को साफ कर लें। किसी पॉलीथिन की थैली में डाल कर किसी टिन में या कांच के मर्तबान में सुरक्षित रख लें।


कुल्थी का पानी बनाने की विधि: किसी कांच के गिलास में 250 ग्राम पानी में 20 ग्राम कुल्थी डाल कर ढक कर रात भर भीगने दें। प्रात: इस पानी को अच्छी तरह मिला कर खाली पेट पी लें। फिर उतना ही नया पानी उसी कुल्थी के गिलास में और डाल दें, जिसे दोपहर में पी लें। दोपहर में कुल्थी का पानी पीने के बाद पुन: उतना ही नया पानी शाम को पीने के लिए डाल दें।इस प्रकार रात में भिगोई गई कुल्थी का पानी अगले दिन तीन बार सुबह, दोपहर, शाम पीने के बाद उन कुल्थी के दानों को फेंक दें और अगले दिन यही प्रक्रिया अपनाएं। महीने भर इस तरह पानी पीने से गुर्दे और मूत्राशय की पथरी धीरे-धीरे गल कर निकल जाती है।


20. स्टूल पर चढकर १५-२० बार फ़र्श पर कूदें। पथरी नीचे खिसकेगी और पेशाब के रास्ते निकल जाएगी। निर्बल व्यक्ति यह प्रयोग न करें।


21. दूध व बादाम का नियमित सेवन से पथरी की संभावना कम होती है।


22. गोखरू 10 ग्राम, जल 150 ग्राम, दूध 250 ग्राम को पकाकर आधा रह जाने पर छानकर नित्य पिलाने से मूत्र मार्ग की सारी विकृतियाँ दूर होती हैं ।


23. गिलास अनन्नास का रस, १ चम्मच मिश्री डालकर भोजन से पूर्व लेने से पिशाब खुलकर आता है और पिशाब सम्बन्धी अन्य समस्याए दूर होती है


24. पथरी होने पर नारियल का पानी पीना चाहिए।इसमें जैविक परमाणु होते हैं जो खनिज पदार्थो को उत्पन्न होने से रोकते हैं .


25. 15 दाने बडी इलायची के एक चम्मच, खरबूजे के बीज की गिरी और दो चम्मच मिश्री, एक कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम दो बार पीने से पथरी निकल जाती है।


26. पका हुआ जामुन पथरी से निजात दिलाने में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। पथरी होने पर पका हुआ जामुन खाना चाहिए।

27. सहजन की सब्जी खाने से गुर्दे की पथरी टूटकर बाहर निकल जाती है।


28. मिश्री, सौंफ, सूखा धनिया लेकर 50-50 ग्राम मात्रा में लेकर डेढ लीटर पानी में रात को भिगोकर रख दीजिए। अगली शाम को इनको पानी से छानकर पीस लीजिए और पानी में मिलाकर एक घोल बना लीजिए, इस घोल को पी‍जिए। पथरी निकल जाएगी।


29.तीन हल्की कच्ची भिंड़ी को पतली-पतली लम्बी-लम्बी काट लें। कांच के बर्तन में दो लीटर पानी में कटी हुई भिंड़ी ड़ाल कर रात भर के लिए रख दें। सुबह भिंड़ी को उसी पानी में निचोड़ कर भिंड़ी को निकाल लें। ये सारा पानी दो घंटों के अन्दर-अन्दर पी लें। इससे किड़नी की पथरी से छुटकारा मिलता है।


30. महर्षि सुश्रुत के अनुसार सात दिन तक गौदुग्ध के साथ गोक्षुर पंचांग का सेवन कराने में पथरी टूट-टूट कर शरीर से बाहर चली जाती है । मूत्र के साथ यदि रक्त स्राव भी होतो गोक्षुर चूर्ण को दूध में उबाल कर मिश्री के साथ पिलाते हैं ।
तोड़ना । लिथोट्रिप्सी बिना शल्य क्रिया के पथरी को तोड़कर छोटे-छोटे टुकड़ो के रुप में शरीर से बाहर निकालने की आसान व सुरक्षित विधि है ।





सहायक उपचार- हिमालय ड्रग कंपनी की सिस्टोन की दो गोलियां दिन में 2-3 बार प्रतिदिन लेने से शीघ्र लाभ होता है। कुछ समय तक नियमित सेवन करने से पथरी टूट-टूट कर बाहर निकल जाती है। यह मूत्रमार्ग में पथरी, मूत्र में क्रिस्टल आना, मूत्र में जलन आदि में दी जाती है।स्टोनिल कैप्सूल( हकीम हाशमी )एक 100% हर्बल जड़ी बूटी युक्त उपाय अपने को पूरी मूत्र प्रणाली के लिए एक टॉनिक के रूप में दोनों स्वस्थ और रोगग्रस्त गुर्दे के कामकाज और कार्य में सुधार करने की क्षमता के लिए जाना जाता है. यह हर्बल कैप्सूल गुर्दे में पत्थर गठन के एक आम स्वास्थ्य विकार, जो दुनिया में लोगों की काफी संख्या को प्रभावित करता है. उसका उपचार में सहायता करता है यह मुख्य रूप से कैल्शियम का संचय, फॉस्फेट, और गुर्दे में oxalate जो क्रिस्टल या पत्थर को निश्चित रूप से निकल बहार करता है .


आपको गुर्दे की पथरी जिन्हें बार-बार हो रही है उन्हें खान-पान में परहेज बरतना चाहिए, ताकि समस्या से बचा जा सकता है। साथ ही एक स्वस्थ व्यक्ति को तो प्रतिदिन 3-5 लीटर पानी पीना चाहिए| यदि किसी को एक बार पथरी की समस्या हुई, तो उन्हें यह समस्या बार-बार हो सकती है। अतः खानपान पर ध्यान रखकर पथरी की समस्या से निजात पाई जा सजा सकती हे।

शनिवार, 17 मई 2014

बाल झडऩे को रोकना /खालित्य- पालित्य चिकित्सा



कम उम्र में सिर के बाल उडऩा बहुत टेंशन देने वाली प्रॉब्लम है वर्तमान समय ये समस्या युवाओं में बहुत तेजी से बढ़ रही है। इसका मुख्य कारण हेरीडिटी, हार्मोनल कारण या खानपान व दिनचर्या के साथ ही धूप में रहने से व पोषक तत्वों की कमी से भी बाल सफेद होते हैं लेकिन बालों की ठीक से देखभाल न करना भी बाल झडऩे का एक बड़ा कारण है। ये एक ऐसी समस्या है जिससे उम्र बहुत अधिक दिखने लगती है। इसे दूर करने के लिए अधिकतर लोग कई तरह के तैल व शैंपू का उपयोग करते हैं। लेकिन तेल व शैंपू बालों को स्वस्थ नहीं बना सकते हैं। अगर आप समय से पहले गंजे नहीं होना चाहते तो नीचे लिखे उपाय अपनाएं।

- अगर आपको बार-बार कंघी करने की आदत है तो संभल जाइए। अधिकतर लोग अपने बालों को सुलझा और संवरा दिखाने के लिए बालों को बार-बार कंघी करते हैं। लेकिन बहुत कम लोग ये जानते हैं कि बार-बार बालों को कंघी करने से बाल डेमेज होते हैं।कंघी करना भी एक बहुत कम अंतराल पर बालों में कंघी न करें इससे बाल ज्यादा तैलीय हो जाते हैं।

- बार-बार बालों को धोने से भी बालों को नुकसान पहुंचता है। अधिकांश लोग अपने बालों को सुंदर व सेहतमंद दिखाने के लिए बार-बार और ज्यादा केमिकल्स वाले शैम्पू का यूज करते हैं बल्कि बालों को धोने के लिए आंवला व अरीठा पाउडर का यूज सबसे अच्छा रहता है। इसके अलावा अगर बालों को धोने के लिए कम केमिकलस वाले शैम्पू का यूज करें।आपके बाल तैलीय हैं तो कंडीशनर का इस्तेमाल न करें।

- कम से कम सप्ताह में एक दिन शंखपुष्पी से बना हुआ असली और शुद्ध चूर्ण थोड़े से पानी में मिलाकर बालों की जड़ों में लगाएं। इसके अलावा भृंगराज के चूर्ण में थोड़ा तिल मिलाकर खाएं। इस आयुर्वेदिक ट्रिटमेंट से आपके बाल प्राकृतिक रूप से स्वस्थ एवं मजबूत बनेंगे। प्रोटीन से भरपूर चीजों का सेवन अधिक करें इससे हेयर फॉलिकल्स मजबूत होते हैं।

- शैम्पू करने से पहले बालों को ड्राय रखने से भी बाल झडऩे लगते हैं इसीलिए शैम्पू करने से पहले बालों में हल्के गर्म ऑलिव ऑयल या कोकोनट ऑयल से मसाज करें। बालों की जड़ों में तेल की अच्छे से मसाज रात को सोने पहले ही कर लेना चाहिए। इससे न सिर्फ बालों की जड़े मजबूत होती है बल्कि बालों शाइन भी करने लगती है।

- बालों का सीधा संबंध पेट से होता है। यदि पाचन तंत्र और हाजमा ठीक नहीं है तो बालों की जड़ें कमजोर होंगी लगातार कब्ज रहने से हेयर फालिकल्स कमजोर हो जाते है बाल टूटने व झडऩे लगते हैं। इसलिए अपने खान-पान और हाजमे को हमेशा ठीक रखें।चाय, कॉफी, पान-तंबाकू, मिर्च-मसाले आदि नशीले पदार्थों से दूर ही रहें।

चिकित्सा---
*Amalki rasayan-100g
Saptamrat loh-20g
Mukta shukti bhasm-10g
Giloy  sat-10g
100 mg smrtisagar ras
1month course fr hairfall


*Trifla1kg
Bhringraj500gm
kala til500gm
Pure honey500ml
Go grit300gm
sabhee mix kere
Dose10,10gm cow milk
Se de
Indralupt aclopasia me
Atyantlabhkari h


*Ganj p dhaniya svaras kalep karaye


*Shir m dandruff  ho to takr m amalki churn bhigo Kar lagae

*Methi churn Ko dahi me bhigo kr lagane se bhi Bal jharne km hote h.


*गुडहल के फूलो की मालिश --खालित्य पालित

*खालित्य- पालित्य-खोरा (Dandruff)--जूँऐं---आमतौर पर ये रोग बालों में होते हैं। ताजा एल्युवीरा (ग्वारपाठा) की गिरी का रस नहाने से 1घंटे पहले बालों में लगाया जाए और फिर त्रिफला,भृंगराज,शिकाकाई (रात भर भिगोने के बाद) से सिर धोकर ऐरण्ड तैल लगाया जाऐ (3-4 माह) या आवशायकतानुसार व हरी सब्जियाँ,सलाद, अधिक जल का सेवन,सुखद निद्रा,खुश दिमाग--तो इन रोगों से काफी हद तक छुटकारा पाया जा सकता है।
मिथ्याहार-विहार,चिंता,अनिद्रा,विबन्ध,क्रोध इन रोगों के मुख्य कारण हैं।

*Sarshap Tel v goghrit ka nasy  de


*Nariyal  oil-1spn
Dahi-4spn
Neebu-1spn
Tankan bhasm-1spn
1hr before  bath  Gud  fr  dandruff

*Hathee dant ka burada5gm
Rasont5gm
goat milk20ml
Ye1matra he
Trifla powder se shampoo
Ker dhove baad me
Sir per lep legave khalitya
Nashk he
One month tk lagave


*घृतकुमारी स्वरस 1-itr
भृंगराज स्वरस     1-ltr
आमलकी स्वरस  1-ltr
ऐरण्डतैल         1÷2 ltr
नारियलतैल        1÷2ltr
सरसों तैल           1÷2ltr
कल्क द्रव्य---''
अरीठा  100ग़ाम
मेहंदीपत्र 100ग्राम
काॅफी पाउडर 20ग्राम
अगर तगर जटामासी ब्राहमी प्रत्येक20--20 ग्राम
तक्र  1- ltr
सब कोने मिला लोहे की कढ़ाई में एक रात्री रख देवे।दूसरे दिन मंद आच पर पकाते हुए तैल सिद्ध करे।
यह तैल केश संबन्धित अनेक व्याधियो कोने दूर कर बालों कारणों पोषण करते हुए सुन्दर घना बनाता है।अकाल खालित्य को दूर करता है।
             
*श्वेत हेयर

भृन्गराज200gm

काले तिल250gm
 आंवला 250 gm
निलिनी 250gm
मेहंदी 1 kg

रिठा 200gm
शिकाकाई 250gm
मेथी  250gm
कत्था 100 gm

इन सभी को कूट पीसकर रखले

ओर कुछ मात्रा लोह पात्र मे   पानी मे भिगो दे

अगले दिन लगाए 
कुछ महीनो  मे पहले ब्राउन फिर हेयर ब्लैक होने लगेंगे
मेरा अनुभूत है।



*बालो की समस्या का सटिक ईलाज*
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🔵टकली पर भी बाल उगाने  वाला वह सफेद बालो को काला करने वाला पतले बेजान बाल मे नयी जान लाने वाला चमत्कारी तैल🔵
👉🏻आवला-15gm
👉🏻जटामासी-200 mg
👉🏻ईन्द्रायन बीज-6gm
👉🏻अन्नंतमूल-4gm
👉🏻सुगन्धंबाला-200 mg
👉🏻कपुर कचरी100 mg
👉🏻भागरा-6gm
👉🏻दारू हल्दी-6.gm
👉🏻शंख पुष्पी-800mg
👉🏻तिल ऑईल-200gm

सब सामग्री को मिक्स करके तैल मे उबाले।ठण्ड़ा होने पर बोतल मे भर दे
इस तैल से गंजेपन वाले भाग पर सुबह शाम नियमित रूप से 3 महीने तक मालिश करने से गंजेपन मे भी बाल आ जाएगे।ओर बालो की हर समस्या से मुक्ति मिलेगी101 %
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☘  अक्सर महिलाऐ ज्यादा बालो की समस़्या से परेशान रहती है.
उन सब समस्या के लिये कोई ना कोई कारन जिम्मेदार होता है.

⭕ *बाल गिरने के कारण* ⭕
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☘ विटामिन्स मिनरल्स की कमी, बालो मे केमिकल युक्त  तेल  डालने से ,पालॅर मे बालो को रगवाने से,स्टेट करवाने से, केमिकल युक्त. शेम्पु  के  कारन  कुपोषण , विटामिन-A, विटामिन -C, विटामिन -B की कमि , हिमोग्लोबिन की कमि , पित्त दोष , वात दोष , वात-पित्त दोष , किसी अन्य बिमारी के कारन , मानसिक टेन्शन के कारन , चिंता के कारन , अनियमित मासिक के कारन , थाईराईड , या अन्य बडे रोग के कारन भी बाल गिर सकते है.

⭕ *बालो की समस्या* ⭕
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👉 बालो का गीरनां ,टकला होना,बालो के बीच मे से चमड़ी दीखना,बालो का तूटनां , दो मूहै बाल , बेजान बाल , बालो का ग्रोथ ना होना , यह समस्या से काफी परेशान महिलाऐ होती है.

☘ *बालो के लिऐ हैर पैक* ☘
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👉 भुंगराज.     50  GMs
👉 ञिफला      100 GMs
👉 बाम्ही          50 GMs
👉 मुलेठी         50 GMs

☘ उपर बताई गई चिजो का चूरन बनाकर हर विक मे १ बार बालो मे छाश ( बटर मिल्क ) मे मिलाकर लेप करे

⭕ *बालो के लिऐ खाने की आैषधि*⭕
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👉 आंवला      100 GMs    
👉 मुलेठी          50 GMs
👉 शतावर जड  50 GMs
👉 शंख भस्म    10 GMs
👉 अश्वगंधा       50 GMs
👉 लौह भस्म    10 GMs

☘ उपर दि गई चिजो को मिक्स करके सुबह शाम आधा-आधा  चमच लिजिऐ