बुधवार, 21 अक्टूबर 2015

Ayurveda Medicine

आयुर्वेदिक दवा आयुर्वेद के मूल सिध्धन्तो पर आधारित है और उसी अनुसार उनका प्रयोग किया जाता है जिससे रोगी को अवश्य और शत प्रतिशत आराम मिलता है।
अर्शोघनी वटी.......
यह वटी वातज यानि की बिना खून वाली बवासीर और खूनी बवासीर को ठीक करने में बहुत कारगर है।
इसकी 2-2 गोली चार बार ठंडे पानी या ताज़ा पानी से लें।
आरोग्यवर्धिनी वटी.........
आरोग्यवर्धिनी वटी आयुर्वेद विज्ञान की श्रेष्ठ गुटिका है। जैसा इसका नाम वैसा ही इसका काम है।
ये गोली हैपेटाइटिस, लीवर से संबन्धित सभी तरह के रोग, त्वचा के रोग, एलर्जी, काले सफ़ेद धब्बे, खाज, खुजली, एसिडिटी, आमाश्य और आंत से संबन्धित रोग, ह्रदय रोग, गैस बनना, कोई भी शारीरिक तकलीफ हो उसमे इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे वैद्य समाज के लोग बहुत प्रयोग करते हैं।
इसकी एक गोली सुबह और एक गोली शाम को पानी, शहद या दूध से लेनी चाहिए। सुबह या दिन मे एक गोली खाने से भी काम चल जाता है। ऊपर बताए गए रोगों मे इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे सभी दवा बनाने वाली कंपनीयां बनाती हैं इसलिए सर्व सुलभ भी है। जिन्हे कोई बीमारी न हो वो भी इसका प्रयोग कर सकते हैं। इसे खाते रहने से व्यक्ति का आरोग्य बना रहता है।
अग्नितुन्डी वटी..........
गुण :- अग्नि के मन्द होने से पैदा सभी रोगों में देने से पूरा लाभ होता है। यह वटी अग्नि दीपक, वातानुलोमक,पाचक और मृदु रेचक है ।
मात्रा:- 1 से 2 गोली भोजन के बाद, हल्के गरम पानी के साथ खाना चाहिये ।
अज्मोदादि वटी........
गुण :- आमवात, गृध्रसी, तूनी, प्रतितूनी, विश्वाची, शोथ, सन्धि शोथ, सन्धि शूल, अस्थि शूल, कटि शूल, गुदा शूल, जन्घा शूल, पृष्ट शूल, वस्ति शूल, विशूचिका और ह्रुदय रोग दूर होते है ।
मात्रा :- 3 से 6 गॊली , गरम पानी से, दिन में दो तीन बार ।
अभयादि बटी.......
गुण :- जीर्ण ज्वर, प्लीहा, पांडु , काम्ला, कुम्भ कामला, रक्त पित्त, अम्ल पित्त, आठ प्रकार के उदर रोग, सब प्रकार के अजीर्ण, अषठीला, आध्यमान, विबन्ध, गुल्म आदि रोग नष्ट हो जाते है ।
मात्रा:- 2 गोली, हरड़ का चूर्ण मिला हुआ चावल का धोवन के साथ अथवा गरम जल के साथ लें।
अमृतादि गुग्गुल वटी.......
गुण :- वात रक्त, कुष्ठ, अर्श, भगन्दर, प्रमेह, आम्वात, एवम आढ्यवात में उपयोगी है ।
मात्रा:- 1 से 3 ग्राम, रास्नादि काढा या गरम जल के साथ, दिन में दो या तीन बार लें।
आमलक्यादि वटिका.......
गुण:- इस वटी को उस समय प्रयोग करते हैं जब बुखार के बीच में बहुत प्य़ास और मुख सूखने लगता है और बार बार अधिक पानी पीने के बाद भी प्यास नहीं बुझती है ।
आमवातारि वटिका.......
गुण :- यह वटी बहुत से रोगों की दशाओं में प्रयोग की जाती है । आमवात, गुल्म, शूल, उदर रोग, यक्रत रोग,प्लीहा रोग, अष्ठीला रोग, आनाह,आन्त्र बृध्धी, अर्श, भगन्दर, ग्रन्थि शूल, शिर:शूल, गृध्रसी, पान्डु, कामला,हलीमक, शोथ, अम्लपित्त, वात रोग, अरुचि, श्लीपद, अर्बुद, गलगन्ड, गन्डमाला, विद्रधी, पाषाण गर्धभ, कुष्ठ और कृमि रोग नष्ट होते हैं ।
मात्रा :- 1 गोली , त्रिफला के काढे के साथ दिन में दो बार। एक या दो गोली मुख में रखकर चूसना भी लाभप्रद है।
इन्दु वटी......
सभी प्रकार के कान के रोग यानी कान तथा कान से सम्बन्धित सभी रोगों के अलावा मधुमेह आदि आदि बीमारियों की अवस्थाओं में उपयोग की जाती है । इसकी एक गोली आवले के रस के साथ सुबह शाम खाना चाहिये
इन्दुकला वटी.......
गुण :- यह वटिका मसूरिका, रोमान्तिका, विस्फोट ज्वर, लोहित ज्वर, सर्व व्रण रोग और कासादि रोगों को दूर करती है ।
इसे एक गोली रोजाना तुलसी पत्र के रस के साथ दिन में दो समय सेवन करना चाहिये
ऊपर बतायी गयी आयुर्वेदिक दवाये एक वयस्क के लिये है। बच्चो को आधी दवा और बहुत छोटे बच्चो को चौथायी मात्रा देनी चाहिये।

रविवार, 18 अक्टूबर 2015

‪#‎Premature_Ejaculation‬

शीघ्रपतन के लिए ऐमरजैंसी आयुर्वेदिक उपचार 
★★★★★★★★★★★★★★★★
1) Jatifaladi vati 1 ya 2 goli
जातिफलादि वटी दूध से एक या दो गोली ।
2) Viryastamban vati 1 ya 2 goli
वीर्यस्तंभन वटी 1 या दो गोली
3 )Kaminividravan ras 1 ya 2 goli
कामिनीविद्रावण रस 1 या दो गोली 
आयुर्वेद की मशहूर दवा । बलैक में बिकती है ।
4) कामचूड़ामनी रस 
Kaam chudamani ras 
1 या दो गोली
यह आपको आसानी से मिल सकती है लेकिन बाजारू के रिज्लट खास नही अगर किसी वैद्य की बनी मिल जाए तो अच्छा ।
Before sex with hot milk.
सब दवाईया संभोग से दो घंटे पहले दूध से सेवन करें ।
5 ) मदनानंद मोदक लें । 
कुछ कंपनी बनाती है लेकिन कोई खास रिज्लट नही आता ।
सेवनकरता नींद की या बी.पी लो या नशा की शिकायत करता है । इसलिए सावधानी से लें । बार - बार लेने पर नुकसान हो सकता है ।
6 )Musli churan
एक चम्मच दूध से ।
रोज लेने पर कोई हानि नही करता ।
7 )Ashwgandha churan 
यह भी आप रोज ले सकते है । 
कोई हानि नही ।मोटे लोग न लें । मोटापा लाता है । 
जो मोटे हो वह इसका घनसत्व + असली शिलाजीत सत् लें सकते है ।
Anand churan 
आनंद चूर्ण 
यह चूरन कोई कंपनी नही बनाती खुग ही निर्माण करना होता है । किसी वैद्य से तैयार करवा लें । यह वीर्य को बहुत गाड़ा करता है और वीर्य के दोष ठीक करता है ।स्तंभनकारी है ।
Ye sab emergency dwayian h long performence k liye.

फटी एड़ियो का उपचार :-

फटी एड़ियो का उपचार :-
शरीर में उष्णता या खुश्की बढ़ जाने, नंगे पैर चलने फिरने, खून की कमी, तेज ठंड के प्रभाव से तथा धूल मिट्टी से पैर की एड़ियां फट जाती हैं। यदि इनकी देखभाल न की जाए तो ये ज्यादा फट जाती हैं और इनसे खून आने लगता है, ये बहुत दर्द करती हैं। एक कहावत शायद इसलिए प्रसिद्ध है........ जाके पैर न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई। तो जानिए इससे कैसे छुटकारा पाया जाए।
घरेलू इलाज :-
पैरों में जाड़े में बिवाई खूब फटती है, ऐसे समय ये जायफल बड़ा काम आता है, इसे महीन पीसकर बिवाइयों में भर दीजिये। 12-15 दिन में ही पैर भर जायेंगे।
अमचूर का तेल 50 ग्राम, मोम 20 ग्राम, सत्यानाशी के बीजों का पावडर 10 ग्राम और शुद्ध घी 25 ग्राम। सबको मिलाकर एक जान कर लें और
शीशी में भर लें। सोते समय पैरों को धोकर साफ कर लें और पोंछकर यह दवा बिवाई में भर दें और ऊपर से मोजे पहनकर सो जाएं। कुछ दिनों में बिवाई दूर हो जाएगी, तलवों की त्वचा साफ, चिकनी व साफ हो जाएगी।
त्रिफला चूर्ण को खाने के तेल में तलकर मल्हम जैसा गाढ़ा कर लें। इसे सोते समय बिवाइयों में लगाने से थोड़े ही दिनों में बिवाइयां दूर हो जाती हैं।
चावल को पीसकर नारियल में छेद करके भर दें और छेद बन्द करके रख दें। 10-15 दिन में चावल सड़ जाएगा, तब निकालकर चावल को पीसकर बिवाइयों में रोज रात को भर दिया करें। इस प्रयोग से भी बिवाइयां ठीक हो जाती हैं।
गुड़, गुग्गल, राल, सेंधा नमक, शहद, सरसों, मुलहटी व घी सब 10-10 ग्राम लें। घी व शहद को छोड़ सब द्रव्यों को कूटकर महीन चूर्ण कर लें, घी व शहद मिलाकर मल्हम बना लें। इस मल्हम को रोज रात को बिवाइयों पर लगाने से ये कुछ ही दिन में ठीक हो जाती हैं।
रात को सोते समय चित्त लेट जाएं, हाथ की अंगुली लगभग डेढ़ इंच सरसों के तेल में भिगोकर नाभि में लगाकर 2-3 मिनट तक रगड़ते हुए मालिश करें और तेल को सुखा दें। जब तक तेल नाभि में जज्ब न हो जाए, रगड़ते रहें। यह प्रयोग सिर्फ एक सप्ताह करने पर बिवाइयां ठीक हो जाती हैं और एड़ियां साफ, चिकनी व मुलायम हो जाती हैं। एड़ी पर कुछ भी लगाने की जरूरत नहीं। और हाँ इससे आपके होठ भी नरम और चिकने रहेंगे।
गुनगुने पानी मे नमक डालकर पैरों को 10-15 मिनट तक भिगोकर रखें। इसके बाद थोड़ा सा सरसों का तेल पैरों की एड़ियों में लगाने से फटी एड़ियाँ ठीक हो जाती है । यह क्रिया रात को सोने से पहले रोजाना करे । या फिर इसी गर्म पानी से अपनी एड़ियों को धोकर बाजार से खरीदा हुआ शुद्ध देसी मोम और तिल का तेल इन दोनों को मिलाकर एक महलम तैयार करे फिर अपनी फटी एड़ियों अथवा गढ़े वाले स्थान पर इस तैयार मलहम को रात्री को सोने से पहले लगाये और लगाने के बाद एक सूती कपडा बांधकर आराम से सो जाये ऐसा करने से तीन दिन में ही आपको अपनी फटी में काफी आराम दिखाई देगा ।

शनिवार, 17 अक्टूबर 2015

Thyroid हाइपर और हाइपो थाइरोइड का घरेलु और सफल उपचार

Thyroid हाइपर और हाइपो थाइरोइड का घरेलु और सफल उपचार

हाइपर थाइरोइड और हाइपो थाइरोइड का घरेलु और सफल उपचार।

आज कल की भाग दौड़ भरी ज़िन्दगी में ये समस्या आम सी हो गयी हैं, और अलोपथी में इसका कोई इलाज भी नहीं हैं, बस जीवन भर दवाई लेते रहो, और आराम कोई नहीं।

थायराइड मानव शरीर मे पाए जाने वाले एंडोक्राइन ग्लैंड में से एक है। थायरायड ग्रंथि गर्दन में श्वास नली के ऊपर एवं स्वर यन्त्र के दोनों ओर दो भागों में बनी होती है। इसका आकार तितली जैसा होता है। यह थाइराक्सिन नामक हार्मोन बनाती है जिससे शरीर के ऊर्जा क्षय, प्रोटीन उत्पादन एवं अन्य हार्मोन के प्रति होने वाली संवेदनशीलता नियंत्रित होती है।
थॉयराइड ग्रंथि तितली के आकार की होती है जो गले में पाई जाती है। यह ग्रंथि उर्जा और पाचन की मुख्य ग्रंथि है। यह एक तरह के मास्टर लीवर की तरह है जो ऐसे जीन्स का स्राव करती है जिससे कोशिकाएं अपना कार्य ठीक प्रकार से करती हैं। इस ग्रंथि के सही तरीके से काम न कर पाने के कारण कई तरह की समस्‍यायें होती हैं। इस लेख में विस्‍तार से जानें थॉयराइड फंक्‍शन और इसके उपचार के बारे में।
थॉयराइड को साइलेंट किलर माना जाता है, क्‍योंकि इसके लक्षण व्‍यक्ति को धीरे-धीरे पता चलते हैं और जब इस बीमारी का निदान होता है तब तक देर हो चुकी होती है। इम्यून सिस्टम में गड़बड़ी से इसकी शुरुआत होती है लेकिन ज्यादातर चिकित्‍सक एंटी बॉडी टेस्ट नहीं करते हैं जिससे ऑटो-इम्युनिटी दिखाई देती है।
* यह ग्रंथि शरीर के मेटाबॉल्जिम को नियंत्रण करती है यानि जो भोजन हम खाते हैं यह उसे उर्जा में बदलने का काम करती है।
* इसके अलावा यह हृदय, मांसपेशियों, हड्डियों व कोलेस्ट्रोल को भी प्रभावित करती है।
*आमतौर पर शुरुआती दौर में थायराइड के किसी भी लक्षण का पता आसानी से नहीं चल पाता, क्योंकि गर्दन में छोटी सी गांठ सामान्य ही मान ली जाती है। और जब तक इसे गंभीरता से लिया जाता है, तब तक यह भयानक रूप ले लेता है।

आखिर क्या कारण हो सकते है जिनसे थायराइड होता है।

* थायरायडिस- यह सिर्फ एक बढ़ा हुआ थायराइड ग्रंथि (घेंघा) है, जिसमें थायराइड हार्मोन बनाने की क्षमता कम हो जाती है।
* इसोफ्लावोन गहन सोया प्रोटीन, कैप्सूल, और पाउडर के रूप में सोया उत्पादों का जरूरत से ज्यादा प्रयोग भी थायराइड होने के कारण हो सकते है।
* कई बार कुछ दवाओं के प्रतिकूल प्रभाव भी थायराइड की वजह होते हैं।
* थायराइट की समस्या पिट्यूटरी ग्रंथि के कारण भी होती है क्यों कि यह थायरायड ग्रंथि हार्मोन को उत्पादन करने के संकेत नहीं दे पाती।
* भोजन में आयोडीन की कमी या ज्यादा इस्तेमाल भी थायराइड की समस्या पैदा करता है।
* सिर, गर्दन और चेस्ट की विकिरण थैरेपी के कारण या टोंसिल्स, लिम्फ नोड्स, थाइमस ग्रंथि की समस्या या मुंहासे के लिए विकिरण उपचार के कारण।
* जब तनाव का स्तर बढ़ता है तो इसका सबसे ज्यादा असर हमारी थायरायड ग्रंथि पर पड़ता है। यह ग्रंथि हार्मोन के स्राव को बढ़ा देती है।
* यदि आप के परिवार में किसी को थायराइड की समस्या है तो आपको थायराइड होने की संभावना ज्यादा रहती है। यह थायराइड का सबसे अहम कारण है।
* ग्रेव्स रोग थायराइड का सबसे बड़ा कारण है। इसमें थायरायड ग्रंथि से थायरायड हार्मोन का स्राव बहुत अधिक बढ़ जाता है। ग्रेव्स रोग ज्यादातर 20 और 40 की उम्र के बीच की महिलाओं को प्रभावित करता है, क्योंकि ग्रेव्स रोग आनुवंशिक कारकों से संबंधित वंशानुगत विकार है, इसलिए थाइराइड रोग एक ही परिवार में कई लोगों को प्रभावित कर सकता है।
* थायराइड का अगला कारण है गर्भावस्था, जिसमें प्रसवोत्तर अवधि भी शामिल है। गर्भावस्था एक स्त्री के जीवन में ऐसा समय होता है जब उसके पूरे शरीर में बड़े पैमाने पर परिवर्तन होता है, और वह तनाव ग्रस्त रहती है।
* रजोनिवृत्ति भी थायराइड का कारण है क्योंकि रजोनिवृत्ति के समय एक महिला में कई प्रकार के हार्मोनल परिवर्तन होते है। जो कई बार थायराइड की वजह बनती है।
थायराइड के लक्षण:-

कब्ज-

थाइराइड होने पर कब्ज की समस्या शुरू हो जाती है। खाना पचाने में दिक्कत होती है। साथ ही खाना आसानी से गले से नीचे नहीं उतरता। शरीर के वजन पर भी असर पड़ता है।

हाथ-पैर ठंडे रहना-

थाइराइड होने पर आदमी के हाथ पैर हमेशा ठंडे रहते है। मानव शरीर का तापमान सामान्य यानी 98.4 डिग्री फॉरनहाइट (37 डिग्री सेल्सियस) होता है, लेकिन फिर भी उसका शरीर और हाथ-पैर ठंडे रहते हैं।
प्रतिरोधक क्षमता कमजोर होना- थाइराइड होने पर शरीर की रोग-प्रतिरोधक क्षमता कम़जोर हो जाती है। इम्यून सिस्टम कमजोर होने के चलते उसे कई बीमारियां लगी रहती हैं।

थकान

थाइराइड की समस्या से ग्रस्त आदमी को जल्द थकान होने लगती है। उसका शरीर सुस्त रहता है। वह आलसी हो जाता है और शरीर की ऊर्जा समाप्त होने लगती है।

त्वचा का सूखना या ड्राई होना

थाइराइड से ग्रस्त व्यक्ति की त्वचा सूखने लगती है। त्वचा में रूखापन आ जाता है। त्वचा के ऊपरी हिस्से के सेल्स की क्षति होने लगती है जिसकी वजह से त्वचा रूखी-रूखी हो जाती है।

जुकाम होना

थाइराइड होने पर आदमी को जुकाम होने लगता है। यह नार्मल जुकाम से अलग होता है और ठीक नहीं होता है।

डिप्रेशन

थाइराइड की समस्या होने पर आदमी हमेशा डिप्रेशन में रहने लगता है। उसका किसी भी काम में मन नहीं लगता है, दिमाग की सोचने और समझने की शक्ति कमजोर हो जाती है। याद्दाश्त भी कमजोर हो जाती है।

बाल झड़ना

थाइराइड होने पर आदमी के बाल झड़ने लगते हैं तथा गंजापन होने लगता है। साथ ही साथ उसके भौहों के बाल भी झड़ने लगते है।

मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द

मांसपेशियों और जोड़ों में दर्द और साथ ही साथ कमजोरी का होना भी थायराइड की समस्या के लक्षण हो सकते है।

शारीरिक व मानसिक विकास

थाइराइड की समस्या होने पर शारीरिक व मानसिक विकास धीमा हो जाता है।

अगर आपको ऐसे कोई भी लक्षण दिखाई दे तो अपने डाक्टर से संपर्क करें आपको थाइराइड समस्या हो सकती है।

अति असरकारक घरेलु उपाय__सुबह खाली पेट लौकी का जूस पिए, घर में ही गेंहू के जवारों का जूस निकाल कर पिए, इसके बाद एक गिलास पानी में हर रोज़ ३० मिली एलो वेरा जूस और २ बूँद तुलसी की डाल कर पिए, एलो वेरा जूस आपको किसी बढ़िया कंपनी का यूज़ करना होगा, जिसमे फाइबर ज़्यादा हो, सिर्फ कोरा पानी ना हो। बाजार से आज कल पांच तुलसी बहुत आ रही हैं, किसी बढ़िया कंपनी की आर्गेनिक पांच तुलसी ले। ये सब करने के आधे घंटे तक कुछ भी न खाए पिए, इस समय में आप प्राणायाम करे।अखरोट और बादाम है फायदेमंद :-अखरोट और बादाम में सेलेनियम नामक तत्‍व पाया जाता है जो थॉयराइड की समस्‍या के उपचार में फायदेमंद है। 1 आंउस अखरोट में 5 माइक्रोग्राम सेलेनियम होता है। अखरोट और बादाम के सेवन से थॉयराइड के कारण गले में होने वाली सूजन को भी काफी हद तक कम किया जा सकता है। अखरोट और बादाम सबसे अधिक फायदा हाइपोथॉयराइडिज्‍म (थॉयराइड ग्रंथि का कम एक्टिव होना) में करता है।
इसके साथ में रात को सोते समय गाय के गर्म दूध के साथ 1 चम्मच अश्वगंधा चूर्ण का सेवन करे।
इसके साथ प्राणायाम करना हैं, जिसे उज्जायी प्राणायाम बोलते हैं। इस प्राणायाम में गले को संकुचित करते हुए पुरे ज़ोर से ऊपर से श्वांस खींचनी हैं।

आयुर्वेदिक औषद्धियों

जानिए अपनी कुछ आयुर्वेदिक औषद्धियों के बारे में जो शरीर की विभिन्न व्यवस्थाओ को शक्ति प्रदान करती है :-
1........चंद्रप्रभा वटी :-
आयुर्वेद में इसके उपयोग बहुत विस्तार से दिये गयें हैं। यह मूत्र रोगों पर और यौन रोगों पर विशेष असर दिखाती है। बार बार पेशाब आना, पेशाब में शक्कर का जाना, स्त्री को सफ़ेद पानी का जाना, मासिक धर्म की अनियमितताए, पुरुषों को पेशाब में धातु जाने की समस्या, पेशाब में जलन होना ऐसे अनेक विकारो पर यह दवा काम करती है।
यह स्नायु और हड्डी को भी मजबूती प्रदान करती है। इसलिए इसका प्रयोग कमजोरी में भी करते है।
इसकी 1-1 गोली सुबह शाम नाश्ते या भोजन के बाद पानी से ले। इसे शहद या दूध से भी ले सकते है।
2.......... योगराज गुग्गुल :-
इस दवा का प्रयोग स्नायुओ को मजबूती प्रदान करता है। बुढ़ापे की व्याधियो जैसे पैर की पिंडलियों में दर्द होना, घुटनों में दर्द होना वगैरह के लिए यह दवा अच्छा असर दिखाती है।
इसकी 1-1 गोली सुबह शाम नाश्ते या भोजन के बाद पानी से ले. इसे शहद से या दूध से भी ले सकते है।
3....... त्रयोदशांग गुग्गुल :-
यह वात विकारो की एक जबरदस्त दवा है। इसके प्रयोग से लकवे (पक्षाघात) में अद्भुत लाभ होता है। लकवा होने के बाद जितने जल्दी इसे प्रयोग में लाया जायेगा लाभ उतना ही जल्द होंगा। यदि लकवा होने के बाद ज्यादा समय बीत गया है तो एक लम्बे काल के लिए इस दवा का नियमित सेवन करना होगा।
सर्वाइकल स्पोंडीलायटिस में भी यह अच्छा काम करती है।
इसकी 1-1 गोली सुबह शाम नाश्ते या भोजन के बाद पानीसे ले। इसे शहद से या दूध से भी ले सकते है।
4.......... सितोपलादी चूर्ण :-
यह खांसी की एक जबरदस्त दवा है। सूखी खांसी पर इसे जादू की तरह काम करते हुए देखा गया है। एक चौथाई चम्मच चूर्ण शहद के साथ एक दिन में 3-4 बार ले सकते है।
5....... हरिद्रा खंड :-
यह खुजली की एक जबरदस्त दवा है। शीत पित्त में भी ये दवा जादू की तरह काम करती है। इसे आधा चम्मच रोजाना पानी से तीन बार ले सकते है।
6........सितोपलादि चूर्ण :-
सभी प्रकार के कास (खांसी), श्वास रोग, क्षय, राजयक्ष्मा, मुँह से खून गिरना,
साथ-साथ थोडा ज्वर रहना, जुकाम आदि मे इस चूर्ण से बहुत लाभ होता है।
एक से तीन ग्राम की मात्रा शहद या शुद्ध घी के साथ लें।

गुरुवार, 15 अक्टूबर 2015

किशमिश

किशमिश ---
1. कब्‍ज - जब किशमिश को खाई जाती है तो यह पेट में जा कर पानी को सोख लेती हैं। जिस वजह से यह फूल जाती है और कब्‍ज में राहत दिलाती है।
2. वजन बढाए- हर मेवे की तरह किशमिश भी वजन बढाने में मददगार साबित होती है क्‍योंकि इसमें फ्रकटोज़ और ग्‍लूकोज़ पाया जाता है जिससे एनर्जी मिलती है। अगर आपको भी अपना वजन बढाना है और वो भी कोलेस्‍ट्रॉल बढाए बिना तो आज से ही किशमिश खाना शुरु कर दें।
3. अम्लरक्तता- जब खून में एसिड बढ जाता है तो यह परेशानी पैदा हो जाती है। इसकी वजह से स्‍किन डिज़ीज, फोडे़, गठिया, गाउट, गुर्दे की पथरी, बाल झड़ने, हृदय रोग, ट्यूमर और यहां तक कि कैंसर होने की संभावना पैदा हो जाती है। किशमिश में अच्‍छी मात्रा में पोटैशियम और मैगनीशियम पाया जाता है जिसको खाने से अम्लरक्तता की परेशानी दूर हो जाती है।
4. एनीमिया- किशमिश में भारी मात्रा में आयरन होता है जो कि सीधे एनीमिया से लड़ने की शक्‍ति रखता है। खून को बनाने के लिये विटामिन बी कॉमप्‍लेक्‍स की जरुरत को भी यही किशमिश पूरी करती है। कॉपर भी खून में लाल रक्‍त कोशिका को बनाने का काम करता है।
5. बुखार- किशमिश में मौजूद फिनॉलिक पायथोन्‍यूट्रियंट जो कि जर्मीसाइडल, एंटी बॉयटिक और एंटी ऑक्‍सीडेंट तत्‍वों की वजह से जाने जाते हैं, बैक्‍टीरियल इंफेक्‍शन तथा वाइरल से लड़ कर बुखार को जल्‍द ठीक कर देते हैं।
6. शराब के नशे से छुटकारा- शराब पीने की इच्छा हो तब शराब की जगह 10 से 12 ग्राम किशमिश चबा-चबाकर खाते रहें या किशमिश का शरबत पियें। शराब पीने से ज्ञानतंतु सुस्त हो जाते हैं परंतु किशमिश के सेवन से शीघ्र ही पोषण मिलने से मनुष्य उत्साह, शक्ति और प्रसन्नता का अनुभव करने लगता है। यह प्रयोग प्रयत्नपूर्वक करते रहने से कुछ ही दिनों में शराब छूट जायेगी।
7. यौन दुर्बलता- इस समस्‍या के लिये रोजाना किशमिश खाएं क्‍योंकि यह कामेच्छा को प्रोत्साहित करती है। इसमें मौजूद अमीनो एसिड, यौन दुर्बलता को दूर करता है। इसीलिये तो शादी-शुदा जोडों को पहली रात दूध का गिलास दिया जाता है जिसमें किशमिश और केसर होता है।
8. हड्डी की मजबूती- किशमिश में बोरोन नामक माइक्रो न्‍यूट्रियंट पाया जाता है जो कि हड्डी को कैल्‍शियम सोखने में मदद करता है। बोरोन की वजह से ऑस्‍टियोप्रोसिस से बडी़ राहत मिलती है साथ ही किशमिश खाने से घुटनों की भी समस्‍या नहीं पैदा होती।
9. आंखों के लिये- इसमें एंटी ऑक्‍सीडेंट प्रोपर्टी पाई जाती है, जो कि आंखों की फ्री रैडिकल्‍स से लड़ने में मदद करता है। किशमिश खाने से कैटरैक, उम्र बढने की वजह से आंखों की कमजोरी, मसल्‍स डैमेज आदि नहीं होता। इसमें विटामिन ए, ए-बीटा कैरोटीन और ए-कैरोटीनॉइड आदि होता है, जो कि आंखों के लिये अच्‍छा होता है।

सोमवार, 12 अक्टूबर 2015

दुबलापन : कारण व उपचार

सहज कृशता :माता-पिता यदि कृश हों तो बीजदोष के फलस्वरूप उत्पन्न होने वाला शिशु भी सहज रूप से कृश ही उत्पन्न होता है। गर्भावस्था में पोषण का पूर्णतः अभाव होने से अथवा गर्भवती स्त्री के किसी संक्रामक या कृशता उत्पन्न करने वाली विकृति के चलते गर्भस्थ शिशु के शारीरिक अवयवों का समुचित विकास नहीं हो पाता, जन्म के समय ऐसे शिशु कृश स्वरूप में ही जन्म लेते हैं। ऐसे कृशकाय शिशु की उचित देखभाल एवं समय पर चिकित्सा करने के बाद भी इसकी कृशता का पूर्ण रूप से निवारण नहीं होने पर अंततोगत्वा ये सहज कृशता के स्वरूप को प्राप्त कर जीवन पर्यंत उससे ग्रसित रहते हैं। निरंतर चिकित्सा लाभ लेते रहने पर ही इनका जीवित रहना संभव होता है।जन्मोत्तर कृशता :अग्निमांद्य के फलस्वरूप रस धातु की उत्पत्ति अल्प मात्रा में होने से जो धातुक्षय होता है, उसे अनुमोल क्षय तथा कुप्रवृत्ति तथा अतिमैथुन से होने वाले शुक्रक्षय के फलस्वरूप अन्य धातुओं के होने वाले क्षय को प्रतिलोम क्षय कहते हैं। दुर्घटना, आघात, वमन, अतिसार, रक्तपित्त आदि के अकस्मात होने वाला धातुक्षय तथा पंचकर्म के अत्याधिक प्रयोग से होने वाले धातुक्षय से भी अंत में कृशता उत्पन्न होती है। निष्कर्ष यह है कि किसी भी कारण से होने वाला धातुक्षय ही कृशता का जनक है। जन्मोत्तर कृशता के दो प्रकार संभव हैं-लगातार उत्पन्न कृशता :अग्निमांद्य,ज्वर, पांडु, उन्माद, श्वांस आदि व्याधियों से दीर्घ अवधि तक ग्रस्त रहने पर शरीर में लगातार कृशता उत्पन्न होती है, जो धीरे-धीरे बढ़कर अंत में अतिकृशता का रूप धारण कर लेती है। शरीर की स्वाभाविक क्रिया के फलस्वरूप वृद्धावस्था में होने वाली कृशता का भी इसमें समावेश हो जाता है।अकस्मात उत्पन्न कृशता :मधुमेह, रजक्षमा, रक्तपित्त, वमन, ग्रहणी, कैंसर आदि व्याधियों के कारण शरीर में अकस्मात कृशता उत्पन्न होती है। अवटुका ग्रंथि के अंतःस्राव की अभिवृद्धि से भी अकस्मात कृशता उत्पन्न होती है, जिसे आधुनिक चिकित्सा के अनुसार हाइपरथायरायडिज्म या थायरोढाक्सिकोसित कहते हैं।वैज्ञानिकों का यह भेद चरकोक्त जठराग्निवर्धन से समानता रखता है, क्योंकि जठराग्निवर्धन के संपूर्ण लक्षण इसमें घटित होते हैं। थायराइड नामक ग्रंथि के अंतःस्राव में वृद्धि होने पर इंसुलिन के द्वारा शरीर में दहन क्रिया अत्यंत तीव्र वेग से होने के कारण प्रथमतः रस, रक्तगत शर्करा का दहन होने से शर्करा की मात्रा न्यून होने पर शरीर में संचित स्नेहों तथा प्रोटीनों का दहन होने लगता है।इसी के परिणामस्वरूप शरीर में धातुक्षय होकर कृशता उत्पन्न होती है, इसी को भस्मक रोग की संज्ञा आयुर्वेदाचार्यों ने दी है। महर्षि चरक ने इन लक्षणों को अत्यग्नि संभव नाम दिया है।दुबलेपन से होने वाली हानियाँ :पूर्व मे जो लक्षण बताए गए हैं, वे कृश व्यक्ति में बाहर से दिखाई देने वाले हैं। इसके अतिरिक्त शरीर की आंतरिक विकृति के फलस्वरूप जो लक्षण मिलते हैं, उनमें अग्निमांद्य, चिड़चिड़ापन, मल-मूत्र का अल्प मात्रा में विसर्जन, त्वचा में रूक्षता, शीत, गर्मी तथा वर्षा को सहन करने की शक्ति नहीं होना, कार्य में अक्षमता आदि लक्षण होते हैं। कृश व्यक्ति श्वास, कास, प्लीहा, अर्श, ग्रहणी, उदर रोग, रक्तपित्त आदि में से किसी न किसी से पीड़ित होकर काल कवलित हो जाता है।चिकित्ससंतर्पण :सर्वप्रथम उसके अग्निमांद्य को दूर करने का प्रयत्न करना चाहिए। लघु एवं शीघ्र पचने वाला संतर्पण आहार, मंथ आदि अन्य पौष्टिक पेय पदार्थ, रोगी के अनुकूल ऋतु के अनुसार फलों को देना चाहिए, जो शीघ्र पचकर शरीर का तर्पण तथा पोषण करे। रोगी की जठराग्नि का ध्यान रखते हुए दूध, घी आदि प्रयोग किया जा सकता है। कृश व्यक्ति को भरपूर नींद लेनी चाहिए, इस हेतु सुखद शय्या का प्रयोग अपेक्षित है। कृशता से पीड़ित व्यक्ति को चिंता, मैथुन एवं व्यायाम का पूर्णतः त्याग करना अनिवार्य है।पंचकर्म :कृश व्यक्ति के लिए मालिश अत्यंत उपयोगी है। पंचकर्म के अंतर्गत केवल अनुवासन वस्ति का प्रयोग करना चाहिए तथा ऋतु अनुसार वमन कर्म का प्रयोग किया जा सकता है। कृश व्यक्ति के लिए स्वदन व धूम्रपान वर्जित है। स्नेहन का प्रयोग अल्प मात्रा में किया जा सकता है।रसायन एवं वाजीकरण :कृश व्यक्ति को बल प्रदान करने तथा आयु की वृद्धि करने हेतु रसायन औषधियों का प्रयोग परम हितकारी है, क्योंकि अतिकृश व्यक्ति के समस्त धातु क्षीण हो जाती हैं तथा रसायन औषधियों के सेवन से सभी धातुओं की पुष्टि होती है, इसलिए कृश व्यक्ति के स्वरूप, प्रकृति, दोषों की स्थिति, उसके शरीर में उत्पन्न अन्य रोग या रोग के लक्षणों एवं ऋतु को ध्यान में रखकर किसी भी रसायन के योग अथवा कल्प का प्रयोग किया जा सकता है। वाजीकरण औषधियों का प्रयोग भी परिस्थिति के अनुसार किया जा सकता है।औषधि चिकित्सा क्रम :सर्वप्रथम रोग की मंद हुई अग्नि को दूर करने का प्रयोग आवश्यक है, इसके लिए दीपन, पाचन औषधियों का प्रयोग अपेक्षित है। अग्निमांद्य दूर होने पर अथवा रोगी की पाचन शक्ति सामान्य होने पर जिन रोगों के कारण कृशता उत्पन्न हुई हो तथा कृशता होने के पश्चात जो अन्य रोग हुए हों, इस तथ्य को ध्यान में रखते हुए ही औषधियों की व्यवस्था करना अपेक्षित है।
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कृशता में उपयोगी औषधियाँ :लवणभास्कर चूर्ण, हिंग्वाष्टक चूर्ण, अग्निकुमार रस, आनंदभैरव रस, लोकनाथ रस( यकृत प्लीहा विकार रोगाधिकार), संजीवनी वटी, कुमारी आसव, द्राक्षासव, लोहासव, भृंगराजासन, द्राक्षारिष्ट, अश्वगंधारिष्ट, सप्तामृत लौह, नवायस मंडूर, आरोग्यवर्धिनी वटी, च्यवनप्राश, मसूली पाक, बादाम पाक, अश्वगंधा पाक, शतावरी पाक, लौहभस्म, शंखभस्म, स्वर्णभस्म, अभ्रकभस्म तथा मालिश के लिए बला तेल, महामाष तेल (निरामिष) आदि का प्रयोग आवश्यकतानुसार करना चाहिए।भोजन में जरूरी :गेहूँ, जौ की चपाती, मूंग या अरहर की दाल, पालक, पपीता, लौकी, मेथी, बथुआ, परवल, पत्तागोभी, फूलगोभी, दूध, घी, सेव, अनार, मौसम्बी आदि फल अथवा फलों के रस, सूखे मेवों में अंजीर, अखरोट, बादाम, पिश्ता, काजू, किशमिश आदि। सोते समय एक गिलास कुनकुने दूध में एक चम्मच शुद्ध घी डालकर पिएँ, इसी के साथ एक चम्मच अश्वगंधा चूर्ण लें, लाभ न होने तक सेवन करें।