मंगलवार, 10 नवंबर 2015

शीघ्रपतन

मूसली के लगभग 10 ग्राम चूर्ण को 250 ग्राम गाय के दूध में मिलाकर अच्छी तरह से उबालकर किसी मिट्टी के बर्तन में रख
दें। इस दूध में रोजाना सुबह और शाम पिसी हुई मिश्री मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और संभोग क्रिया की इच्छा न करना, वीर्य की कमी होना आदि रोगों में बहुत लाभ मिलता है।

कौंच को कपिकच्छू और कैवांच आदि के नामों से भी जाना जाता है। संभोग करने की शक्ति को बढ़ाने के लिए इसके बीज बहुत लाभकारी रहते हैं। इसके बीजों का सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है, संभोग करने की इच्छा तेज होती है और शीघ्रपतन रोग में लाभ होता है। इसके बीजों का उपयोग करने के लिए बीजों को दूध या पानी में उबालकर उनके ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए। इसके बाद बीजों को सुखाकर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए। इस चूर्ण को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम मिश्री के साथ दूध में मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है।
शतावरी, गोखरू, तालमखाना, कौंच के बीज, अतिबला और नागबला को एकसाथ मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ रोजाना सेवन करने से स्तंभन शक्ति तेज होती है और शीघ्रपतन के रोग में लाभ होता है। रात को संभोग क्रिया करने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से संभोग क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न होती है। वीर्य का पतला होना, यौन-दुर्बलता और विवाह के बाद शीघ्रपतन होना जैसे रोगों में इसका सेवन बहुत लाभकारी रहता है।
मोचरस, कौंच के बीज, शतावरी, तालमखाना को 100-100 ग्राम की मात्रा में लेकर लगभग 400 ग्राम मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से बुढ़ापे में भी संभोग क्रिया का पूरा आनंद लिया जा सकता है। इस योग को लगभग 2-3 महीने तक सेवन करना लाभकारी रहता है।
लगभग 6 चम्मच अदरक का रस, 8 चम्मच सफेद प्याज का रस, 2 चम्मच देशी घी और 4 चम्मच शहद को एक साथ मिलाकर किसी साफ कांच के बर्तन में रख लें। इस योग को रोजाना 4 चम्मच की मात्रा में सुबह खाली पेट सेवन करना चाहिए। इसको लगातार 2 महीने तक सेवन करने से स्नायविक दुर्बलता, शिथिलता, लिंग का ढीलापन, कमजोरी आदि दूर हो जाते हैं।
बबूल की कच्ची पत्तियां, कच्ची फलियां और गोंद को बराबर मात्रा में मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें और इनमें इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी डिब्बे आदि में रख लें। इस चूर्ण को नियमित रूप से 2 महीने तक 2-2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है। इसके अलावा यह योग शीघ्रपतन और स्वप्नदोष जैसै रोगों में बहुत लाभकारी रहता है।
सफेद मूसली के चूर्ण और मुलहठी के चूर्ण को बराबर की मात्रा में मिला लें। इस चूर्ण को 1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम शुद्ध घी के साथ मिलाकर चाट लें और ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस योग को नियमित सेवन करने से धातु वृद्धि होती है, नपुंसकता दूर होती है और शरीर पुष्ट और शक्तिशाली बनता है।
10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना और बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंध, जायफल और रूदन्तीफल, 20-20 ग्राम सफेद मूसली, कौंच के बीज और त्रिफला तथा 15-15 ग्राम त्रिकटु, गोखरू को एक साथ जौकुट करके चूर्ण बना लें। इसके बाद इस मिश्रण के चूर्ण को लगभग 16 गुना पानी में मिलाकर उबालने के लिए रख दें। उबलने पर जब पानी जल जाए तो इसमें 10 ग्राम भांगरे का रस मिलाकर दुबारा से उबाल लें। जब यह पानी गाढ़ा सा हो जाए तो इसे उतारकर ठंडा करके कपड़े से अच्छी तरह मसलकर छान लें और सुखाकर तथा पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसन्तकुसूमाकर रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग को मिला लें। इस औषधि को आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम चाटकर ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस औषधि को सेवन करने से पुरुषों के शरीर में बल और वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है और वह संभोगक्रिया को लंबे समय तक चला सकता है। इस औषधि के सेवन काल के दौरान खटाई, तेज मिर्च-मसाले वाले और तले हुए भोजन का सेवन करना चाहिए।
मुलहठी के बारीक चूर्ण को 10 ग्राम की मात्रा में घी और शहद से साथ चाटकर ऊपर से दूध पीने से संभोग शक्ति बहुत तेज होती है।
सर्दी के मौसम में उड़द की दाल के लड्ड़ू बनाकर रोजाना सुबह के समय खाकर ऊपर से दूध पीने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है।
लगभग 20 ग्राम उड़द की दाल के छिलके उतारकर रात के समय पानी में भिगों दें। सुबह इस दाल को बारीक पीसकर पिट्ठी बना लें और कड़ाही में डालकर घी के साथ गुलाबी होने तक सेक लें। इसके बाद एक दूसरे बर्तन में 250 ग्राम दूध डालकर उबाल लें। दूध के उबलने पर इसमें सिंकी हुई उड़द की दाल डालकर पका लें। पकने पर इसमें शक्कर डालकर नीचे उतार लें। इस खीर को ठंडा करके रोजाना सुबह नाश्ते के समय 2 चम्मच शहद के साथ सेवन करने से पुरुष की संभोग शक्ति बहुत ज्यादा तेज हो जाती है। ( उड़द की दाल और कौंच के बीजों को प्रयोग में लाने से पहले उन्हें गर्म पानी या दूध में उबालकर उनके छिलके उतार लेने चाहिए।)
लगभग 250 ग्राम शतावरी घृत में इतनी ही मात्रा में शक्कर, 5 ग्राम छोटी पीपल और 5 चम्मच शहद मिला लें। इस मिश्रण को 1-1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
कौंच के बीज, उड़द, गेंहू, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में दूध मिलाकर आटे की तरह गूंथ लें। इसके बाद इसकी छोटी-छोटी पूड़ियां बनाकर गाय के घी में तल लें। इन पूड़ियों को खाकर ऊपर से दूध पीने से वीर्य की बढ़ोतरी होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है। दिए गए द्रव्यों के देशी घी में लड़डू बनाकर सेवन करना भी बहुत लाभकारी रहता है।
दही की मलाई में उतनी ही मात्रा में वंशलोचन, कालीमिर्च, शक्कर, शहद और काली मिर्च मिला लें। इसके बाद एक मिट्टी के घड़े के मुंह पर साफ कपड़ा बांध देना चाहिए तथा उस कपड़े से दिए गए मिश्रण को छान लें। इससे मिश्रण छनकर उस घड़े के अंदर जमा हो जाएगा। इस छने हुए मिश्रण को रोजाना 2-2 चम्मच की मात्रा में घी के साथ सेवन करके ऊपर से दूध पीने से पुरुष के शरीर में ताकत आती है और संभोग शक्ति तेज होती है।
30 पीस छोटी पीपल को लगभग 40 ग्राम तिल के तेल या गाय के घी में भूनकर बिल्कुल पाउडर बना लें। फिर उसमें शहद और शक्कर मिलाकर दूध निकालने के बर्तन में डालकर उसी के अंदर गाय का दूध दूह लें। इस दूध को अपनी रुचि के अनुसार सेवन करें। इसको 1-1 चम्मच की मात्रा में गाय के ताजा निकले हुए दूध के साथ सेवन करने से बल और वीर्य की वृद्धि होती है।
100-100 ग्राम शतावरी, कौंच के बीज, उड़द, खजूर, मुनक्का दाख और सिंघाड़ा को मोटा-मोटा पीसकर चूर्ण बना लें। इसके बाद 1 लीटर दूध में इतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर इसमें चूर्ण को भी मिला लें और हल्की आग पर पकाने के लिए रख दें। पकने पर जब सिर्फ दूध बच जाए तो नीचे उतारकर छान लें। फिर इसमें लगभग 300-300 ग्राम चीनी, वंशलोचन का बारीक चूर्ण और घी मिला लें। इसके बाद इसमें शहद मिलाकर 50 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से बल और वीर्य बढ़ता है।
लगभग 25 ग्राम खस-खस के दाने, 25 ग्राम भुने चने, 25 ग्राम खांड और नारियल की पूरी गिरी को एक साथ कूटकर पीसकर रख लें। इस चूर्ण को रोजाना 70 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से शरीर में वीर्य और ताकत की बढ़ोत्तरी होती है।
लौंग, अकरकरा, कबाबचीनी, ऊदस्वालिस और बीजबंद को बराबर की मात्रा में लेकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद इस चूर्ण के वजन से 2 गुणा पुराना गुड़ लेकर लेकर इसमें मिला लें और छोटी-छोटी गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ 21 दिनों तक लेने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है।
25 ग्राम पिसी-छनी हुई मुलहठी, 25 ग्राम पिसी और छनी असगंध, और 12 ग्राम पिसा और छना हुआ बिधारा को एकसाथ मिलाकर शीशी में भर लें। सर्दी के मौसम में इसमें से 3 ग्राम चूर्ण को अच्छी तरह से घुटे हुए लगभग 0.12 ग्राम मकरध्वज के साथ मिला लें। इसके बाद इसे मिश्री मिले दूध के साथ रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीनों तक सेवन करने से संभोग शक्ति तेज होती है।
लगभग 25-25 ग्राम सफेद बूरा, ढाक की छाल का रस, गेंहू का मैदा और शुद्ध घी को एकसाथ मिलाकर हलवा बना लें। इस हलुए को रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से शरीर मजबूत बनता है, धातु पुष्ट होती है और संभोग करते समय चरम सुख की प्राप्ति होती है।
10 ग्राम भैंस का घी और 10 ग्राम सितोपलादि चूर्ण को किसी कांच या मिट्टी के बर्तन में भरकर रख लें। फिर उसी बर्तन में गाय या भैंस का दूह लें तथा उस दूध को पी लें। रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीनों तक इस दूध का सेवन करने से हर प्रकार की कमजोरी दूर हो जाती है, धातु पुष्ट हो जाता है, बल-वीर्य की बढ़ोतरी होती है, स्तंभन शक्ति बढ़ती है और संभोग शक्ति में रुचि उत्पन्न होती है।
सफेद चीनी, ग्वारपाठे का गूदा, घी और गेंहू के मैदा को बराबर मात्रा में एकसाथ मिलाकर हलवा बनाकर खाने से 21 दिन में ही पुरुष की नपुंसकता दूर हो जाती है।
25-25 ग्राम केसर, पीपल, जायफल, जावित्री, अकरकरा, सोंठ, लोंग और लाल चंदन, 6 ग्राम शुद्ध हिंगुल, 6 ग्राम शुद्ध गंधक और 90 ग्राम अफीम को ले लें। इन सारी औषधियों को कूटकर और छानकर लगभग 20-20 ग्राम की मात्रा में रख लें। फिर सबको एकसाथ मिलाकर हिंगुल, गंधक और अफीम के साथ खरल में डालकर पानी मिलाकर घोट लें। इसके पूरी तरह से घुट जाने पर 0.36 ग्राम और 0.36 ग्राम की गोलियां बना लें। यह एक गोली रोजाना सोने से पहले खाकर ऊपर से दूध पीने से संभोग करने की शक्ति तेज होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है।
सूखे बिदारीकंद को पीसकर उसमें ताजी बिदारीकंद के रस की 7 भावनाएं देकर उसमें मिश्री तथा शहद मिलाकर लगभग 20 ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से 3 महीने तक सुबह के समय सेवन करने से बूढ़े लोग भी अपने शरीर में जवानों जैसी ताकत महसूस करते हैं।
लगभग 10-10 ग्राम जायफल, काला अनार, रुमी मस्तंगी, खस की जड़, बालछड़, दालचीनी, बबूल और शहद, 1 ग्राम कस्तूरी, 9 ग्राम सालममिश्री और 125 ग्राम मिश्री को एक साथ मिलाकर पीसकर छान लें। इस चूर्ण को 6 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीने तक सेवन करने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
तालमखाना, समुंद्रशोष, ढाक का गोंद, बीजबंद, बड़े गोखरू, तज और सफेद मूसली को एक साथ मिलाकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद इस चूर्ण के बराबर ही इसमें पिसी हुई मिश्री मिलाकर रख लें। इस चूर्ण को रोजाना सुबह 6 ग्राम की मात्रा में फांककर उसके ऊपर से गाय का धार वाला ताजा दूध पीने से शरीर में ताकत और वीर्य की बढ़ोतरी होती है |

शनिवार, 7 नवंबर 2015

अफीम से उपचार:

अफीम से उपचार:

सामान्य परिचय : अफीम पोस्त के पौधे से प्राप्त की जाती है। इसके पौधे की ऊंचाई एक मीटर, तना हरा, सरल और स्निग्ध (चिकना), पत्ते आयताकार, पुष्प सफेद, बैंगनी या लाल, सुंदर कटोरीनुमा एवं चौथाई इंच व्यास वाले आकार में होते है। इसके फल, पुष्पों के झड़ने के तुरंत बाद ही लग जाते हैं, जो एक इंच व्यास के अनार के समान होते हैं। ये डोडा कहलाते हैं। बाद में ये अपने आप फट जाते हैं। अफीम फल का छिलका पोश्त कहलाता है। सफेद रंग के सूक्ष्म, गोल, मधुर और स्निग्ध दाने बीज के रूप में डोडे के अंदर होते हैं, जो आमतौर पर खसखस के नाम से जाने जाते हैं।
बाजार में अफीम घनाकार बर्फी के रूप में जमाकर बेची जाती है। नमी का असर होते ही अफीम मुलायम हो जाती है। इसका आंतरिक रंग गहरा बादामी और चमकीला होता है, जबकि बाहरी रंग कालिमा लिए गहरा भूरा होता है। इसमें विशिष्ट प्रकार की तीव्र गंध होती है, जो स्वाद में तीखी होती है। गर्म जल में घुल जाने वाली अफीम जलाने से न तो धुआं देती है और न राख ही शेष रहती है।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
संस्कृत अहिफेन।
हिंदी अफीम, पोस्त, पोस्ता, अफीम का डोडा।
मराठी आफू, आफीमु।
गुजराती अफीण।
फारसी तियाग।
अरबी लब्नुल, खखास।
बंगाली आफिम।
अंग्रेजी ओपियुम, पोपी।
लैटिन पापवर सोम्नीफेरम।
रंग : अफीम का रंग काला होता है।
स्वाद : इसका स्वाद कडुवा होता है।
स्वरूप : दाना पोस्ता की हरी फली में सुई चुभोकर उसका दूध निकालते हैं जो पहले सफेद और जल्द ही लाल और जम जाने पर काला हो जाता है।
स्वभाव : अफीम गर्म प्रकृति की होती है।
हानिकारक : अफीम को अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर को सांवला कर देती है। लोग भ्रमवश अफीम का प्रयोग संभोग व सेक्स की ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं, जबकि हकीकत यह है कि अफीम खाने से कुछ दिन बाद मर्द नामर्द हो जाता है। संभोग शक्ति क्षीण हो जाती है।
दोषों को दूर करने वाला : भांग के बीज अफीम के दोषों को खत्म कर देती हैं।
खुराक (मात्रा): लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग।
गुण : आयुर्वेदिक मतानुसार : अफीम की प्रकृति गर्म, स्वाद में तीखा, प्रभाव में नशीला, कफ-वात शामक, पित्त प्रकोपक, नींद लाने वाली, दर्दनाशक, पसीना लाने वाली, शारीरिक स्रावों को रोकने वाली होती है।
यूनानी मतानुसार : अफीम मस्तिष्क की शक्ति को उत्तेजित करती है, शरीर की शक्ति व गर्मी को बढ़ाने से आनन्द और संतोष की अनुभूति प्रदान करती है। आदत पड़ने पर निर्भरता बढ़ाना, शारीरिक अंगों की पीड़ा दूर करने की प्रकृति, कामोत्तेजक, स्तम्भन शक्ति बढ़ाने वाली, आधासीसी, कमर दर्द, जोड़ों के दर्द, बहुमूत्र, मधुमेह, श्वास के रोग, अतिसार तथा खूनी दस्त में गुणकारी है।
विशेषज्ञों के मतानुसार : अफीम की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर मुख्य रूप से मार्फिन 5 से 31 प्रतिशत, जल 16 प्रतिशत, थोड़ी-सी मात्रा में कोडीन, थीबेन, नार्सीन, नार्कोटीन, पापावरीन, एपोमार्फिन, आक्सीडीमार्फ्रीन, एपोकोडीन, ओपियोनिन, मेकोनिन एसिड, दुग्धाम्ल, राल, ग्लूकोज, अमोनिया, उड़नशील तेल, मैग्नीशियम के लवण आदि तत्त्व पाए गए हैं। एलोपैथिक चिकित्सा में अफीम से प्राप्त मोर्फीन, कोडीन का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। अफीम का प्रभाव मुख्य रूप से मस्तिष्क और वात नाड़ियों के सुशुम्ना केन्द्र पर ज्यादा होता है। इससे पीड़ा कम होती है, नींद आती है, स्त्री-प्रसंग में वीर्य को रोक कर आनन्द देती है, वीर्यस्तम्भन होता है, उत्तेजना मिलती है, मादक असर (नशा) होता है और अधिक पसीना आता है।
दोष : अफीम का अधिक मात्रा में सेवन हानिकारक है और इससे मृत्यु तक हो सकती है।
निवारण : रीठे का जल, नीम का काढ़ा, मैनफल व तम्बाकू का काढ़ा, और करमयक शाक का रस निचोड़कर पिलाने से प्राण त्याग करता हुआ बीमार भी बच जाता है।

विभिन्न रोगों में अफीम से उपचार:

1 सिर दर्द: -आधा ग्राम अफीम और 1 ग्राम जायफल को दूध में मलकर, इस तैयार लेप को मस्तक पर लगाएं या फिर आधा ग्राम अफीम को 2 लौंग के चूर्ण के साथ हल्का गर्म करके खोपड़ी (सिर) पर लेप लगाने से सर्दी और बादी से उत्पन्न सिर दर्द दूर होगा।

2 गर्भस्राव (गर्भ से रक्त के बहने पर): -40 मिलीग्राम अफीम पिण्ड को खजूर के साथ मिलाकर दिन में गर्भस्राव से पीड़ित स्त्री को 3 बार खिलाएं। इससे गर्भस्राव शीघ्र रुकेगा।

3 स्वरदोष (गला खराब होने पर):-अजवायन और अफीम के डोडे समान मात्रा में पानी में उबाकर छान लें और फिर छाने हुए पानी से गरारे करने से स्वरदोष में आराम होगा।

4 कमर का दर्दं:-एक चम्मच पोस्त के दानों को समान मात्रा में मिश्री के साथ पीसकर एक कप दूध में मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से लाभ होगा।

5 अतिसार (दस्त):-*आम की गिरी का चूर्ण 2 चम्मच, अफीम लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिलाकर एक चौथाई चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन कराएं।
*अफीम और केसर को समान मात्रा में लेकर पीस लें तथा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोलियां बना लें। इसे शहद के साथ देने से अतिसार में लाभ होता है।
*अफीम को सेंककर खिलाने से दस्त में आराम मिलता है।
*लगभग 4 से 9 ग्राम तक पोस्त के डोडे पीसकर पिलाने से दस्त मिटता है।"

6 आमातिसार (आंवयुक्त पेचिश):-*भुनी हुई लहसुन की कली में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम मिलाकर खाने से इस रोग में राहत में मिलती है।
*5 ग्राम अफीम, मोचरस, बेलगिरी, इन्द्रजौ, गुलधावा, आम की गुठली की गिरी को 10-10 ग्राम लें। प्रत्येक औषधि को अलग-अलग पीसकर चूर्ण बना लें। फिर सबको एकत्रकर उसमें अफीम मिला लें। लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग चूर्ण को लस्सी के साथ सेवन करने से पेचिश के रोगी का रोग ठीक हो जाता है।"

7 उल्टी:-*कपूर, नौसादर और अफीम बराबर मात्रा में मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां शहद के साथ बना लें। दिन में 3 बार 1-1 गोली पानी के साथ लें।
*अफीम, नौसादर और कपूर को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर रख लें। फिर इसके अंदर पानी डालकर मूंग के बराबर की छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इस 1-1 गोली को ठंडे पानी के साथ खाने से उल्टी और उबकाई आना बंद हो जाती है।"

8 अनिद्रा (नींद का कम आना):-गुड़ और पीपलामूल का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिला लें। इसकी 1 चम्मच की मात्रा में अफीम की लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग मात्रा मिलाकर रात्रि में भोजन के बाद सेवन करने से लाभ होता है।

9 नपुंसकता लाने वाला: -कुछ लोग भ्रमवश अफीम का प्रयोग संभोग व सेक्स की ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि अफीम खाने से कुछ दिन व्यक्ति नामर्द हो जाता है और उसकी संभोग (सेक्स) शक्ति क्षीण हो जाती है।

10 मस्तक पीड़ा:-1 ग्राम अफीम और 2 लौंग को पीसकर लेप करने से बादी और सर्दी के कारण उत्पन्न मस्तक पीड़ा मिटती है।

11 आंखों के रोग: -आंख के दर्द और आंख के दूसरे रोगों में इसका लेप बहुत लाभकारी है।

12 नकसीर (नाक से खून आने पर):-अफीम और कुंदरू गोंद दोनों बराबर मात्रा में पानी के साथ पीसकर सूंघने से नकसीर बंद होती है।

13 केश (बाल): -अफीम के बीजों को दूध में पीसकर सिर पर लगाने से इसमें होने वाली फोड़े फुन्सियां एवं रूसी साफ हो जाती है।

14 दंतशूल (दांत का दर्द): -*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम और लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग नौसादर, दोनों को दांतों में रखने से दाड़ की पीड़ा मिटती है और दांत के छेद में रखने से दांतों का दर्द मिटता है।
*अफीम और नौसादर बराबर की मात्रा में मिलाकर कीड़ा लगे दांत के छेद में दबाकर रखने से दांत दर्द में राहत मिलती है।"

15 कान का दर्द: -*अफीम को ग्लिसरीन में मिलाकर बूंद-बूंद करके रोजाना हर 3-4 घंटे के बाद 2 बूंदे कान में डालने से कान का दर्द कम हो जाता है।
*अफीम की लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग भस्म को गुलाब के तेल में मिलाकर कान में टपकाने से पीड़ा मिटती है।
*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम को आग पर पका लें। फिर इसे गुलरोगन के साथ पीसकर कान में डालें। इससे सर्दी की वजह से कान में होने वाला दर्द ठीक हो जाता है।
*4 चावल भर अफीम के पत्तों की राख को गुलाब के तेल में मिलाकर कान में डालने से कान का दर्द दूर हो जाता है।"

16 खांसी: -*पोस्त के बीज सहित इसके 60 ग्राम डोडे का काढ़ा बना लें, उसमें 50 ग्राम बूरा मिलाकर शर्बत बनाकर पिलाने से नजला-जुकाम व खांसी मिटती है।
*पोस्त के डंठल अलग करके, इसके दो डोडे लें तथा इन्हें 2 ग्राम सेंधानमक के साथ 350 मिलीलीटर पानी में उबाल लें, जब 100 मिलीलीटर पानी शेष रह जाए तो छानकर सोते समय पिलाने से खांसी मिटती है।
*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम को मुनक्के में रखकर निगल लें। खांसी का दौरा शांत होकर नींद आ जाएगी।
*20 से 40 मिलीलीटर वन्यकान्हू के अफीम बीजों का काढ़ा रोजाना 3-4 बार सेवन करने से खांसी ठीक हो जाती है।
*1 से 2 ग्राम वन्यकान्हू की अफीम को सुबह-शाम सेवन करने से खांसी में लाभ मिलता है।
*क्षय (टी.बी.) रोग के रोगी को यदि खांसी के कारण नींद न आती हो तो शाम के समय लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम को मुनक्का में भरकर निगल लेने से रात में चैन की नींद आती है और खांसी भी बार-बार नहीं आती है।"

17 आमाशय की सूजन और दर्द: -आमाशय की झिल्ली की सूजन और पेट के दर्द में इसका लेप करने से आमाशय की सूजन और पेट के दर्द में बहुत लाभ मिलता है।

18 संग्रहणी (पेचिश): -अफीम और बछनाग 3-3 ग्राम, लौह भस्म 250 ग्राम और अभ्रक डेढ़ ग्राम इन चारों वस्तुओं को दूध में घोटकर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोलियां बनाकर दूध के साथ प्रतिदिन सेवन करनी चाहिए। खाने में जल को त्याग करके केवल दूध का ही लेना चाहिए।

19 खुजली :-अफीम को तिल के तेल में मिलाकर मालिश करने से खुजली मिटती है।

20 जोंक के डंक मारने पर: -जोंक का डंक अगर पक जाए तो उस पर इसके दानों को पीसकर लेप करना चाहिए।

21 बुखार: -*अफीम एक डोडे और सात कालीमिर्चों को उबालकर सुबह-शाम पिलाने से चतुर्थिक (चार दिन के अंतर पर आने वाला बुखार) ज्वर मिटता है।
*अफीम तथा कपूर को एक साथ पीसकर देने से पुराना बुखार ठीक हो जाता है।"

22 नासूर: -मनुष्य के नाखून की राख में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम मिला लें, फिर इसे आग पर पकाकर खाये। इससे नासूर में लाभ होता है।

23 गर्भाशय की पीड़ा:-प्रसव (बच्चे के जन्म देने) होने के पश्चात् गर्भाशय की पीड़ा मिटाने के लिए अफीम के डोडों का काढ़ा (इसका उबला हुआ पानी) पिलाना चाहिए।

24 श्वास रोग: -वनकान्हू की अफीम 1 से 2 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से श्वास में लाभकारी होता है।

25 काली खांसी: -एक ग्राम अफीम, 10 ग्राम मुलहठी का चूर्ण, 10 ग्राम बबूल का गोंद, 10 ग्राम निशासता को पीसकर मूंग के आकार की गोलियां बना लेते हैं। यह 1 से 2 वर्ष वाले को बच्चे को 1 गोली, 2 से 4 वर्ष वाले को 2 गोली तथा 4 से 8 वर्ष वाले को 3 गोली सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से काली खांसी, कुकर खांसी के रोग मे लाभ होता है। यदि कफ कड़ा हो तो प्रवाल भस्म लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग शहद से देना चाहिए। इससे खांसी के साथ बलगम निकलकर आराम आ जाता है।

26 दांतों में कीड़े लगना: -हींग एवं अफीम मिलाकर गोली बना लें। इन गोलियों को दांत के गड्ढ़े में रखने से कीड़े मर जाते हैं तथा दर्द में आराम मिलता है।

27 बंद जुकाम: -थोड़ी सी अफीम खाकर उसके ऊपर से गर्म दूध पीने से सर्दी का जुकाम दूर हो जाता है।

28 दस्त: -*एक ग्राम अफीम और एक ग्राम केसर को मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इसके बाद एक-एक गोली दिन में 3 बार शहद के साथ खुराक के रूप में सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है।
*अफीम और समुद्रफेन को मिलाकर खाने से दस्त का आना रुक जाता है। अफीम, मोचरस और धाय के फूल को मिलाकर चूर्ण बनाकर रख लें, फिर इस बने चूर्ण की 3 से 6 ग्राम मात्रा गाय के दूध से जमे दही में मिलाकर लेने से अतिसार में लाभ मिलता है।
*अफीम 3 ग्राम, अकरकरा 7 ग्राम, झाऊ के फूल 14 ग्राम, सामक 14 ग्राम, हुबुलास 14 ग्राम को लेकर अच्छी तरह पीसकर बबूल के गोंद के रस में मिलाकर छोटी-छोटी लगभग 3-3 ग्राम की गोलियां बनाकर रख लें। फिर इन बनी गोलियों को सेवन करने से दस्त का आना बंद हो जाता है। "

29 बवासीर (अर्श): -*अफीम तथा कुचला को पीसकर मलहम बनायें। मलहम को मस्सों पर लगाने से मस्से सूखते हैं और दर्द में आराम रहता है।
*बवासीर के मस्सों पर रसवंती तथा अफीम को पीसकर लेप करने से दर्द कम होता है तथा खून का बहना भी बंद हो जाता है।
*धतूरे के पत्तों के रस में अफीम मिलाकर लेप करने से दर्द जल्द ही बंद हो जाता है। "

30 वात रोग: -लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम खाने से गठिया के तेज दर्द में भी आराम हो जाता है।

31 नाक के रोग: -अफीम और कुंदरू के गोंद को बराबर मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को सूंघने से नाक से खून आना बंद हो जाता है।

32 वीर्य रोग : -अफीम लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग के घोल में एक मुठ्ठी चने भिगोकर सुबह-शाम अंकुरित होने पर 1-1 चना चबा लें। केवल 21 दिन तक यह प्रयोग करने से स्वप्नदोष (नाइटफाल) और धातु (वीर्य) कमी दूर होती है।

33 अंगुलियों का कांपना: -तिल के तेल में अफीम और आक के पत्ते मिलाकर गर्म करके लेप करने से हाथ-पैर की अंगुलियों का कम्पन दूर हो जाता है।

34 जोड़ों (गठिया) में दर्द: -*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम और लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग कपूर की गोली बनाकर खायें। इससे शरीर में पसीना अधिक मात्रा में आकर गठिया के दर्द में जल्दी लाभ मिलता होता है।
*4 ग्राम कपूर और एक ग्राम अफीम को पीसकर 20 गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें। इसकी एक-एक गोली सुबह-शाम गर्म पानी से लें, इससे जोड़ों के दर्द में आराम मिलेगा।
*250 मिलीलीटर सरसों का तेल, 10 ग्राम अजवायन, 3 पुती लहसुन कुचली हुई दो लौंग का चूर्ण और चुटकी भर अफीम सबको मिलाकर आग पर अच्छी तरह पका लें। जब अजवायन, लहसुन आदि सभी जलकर काले पड़ जाएं, तो तेल को आग से नीचे उतारकर छान लें। इस तेल की मालिश सुबह-शाम प्रतिदिन जोड़ों पर करने से रोगी को लाभ मिलता है।"

35 हैजा: -कालीमिर्च, हींग और अफीम आदि को समान मात्रा में लेकर पीसकर रख लें। इसे लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग प्रत्येक 2 से 4 घण्टे पर रोगी को सेवन करायें। यह योग हैजा के प्रथम अवस्था में ही देने से रोग आगे नहीं बढ़ता और रोग ठीक हो जाता है।

36 हाथ-पैरों की ऐंठन: -*1.25 ग्राम अफीम या इतनी ही मात्रा में भांग का सेवन करने से हाथ-पैरो की ऐंठन दूर हो जाती है।
*अफीम का मैल, तेल में मिलाकर गर्म करके मालिश करने से हाथ-पैरों की ऐंठन दूर हो जाती है।"

37 मानसिक उन्माद (पागलपन): -अफीम को थोड़ी मात्रा में खिलाने से मानसिक उन्माद (पागलपन) और घबराहट दूर हो जाती है।

38 बालरोग: -अफीम, भुनी हुई हल्दी, भुना हुआ सुहागा को उबाले हुए पानी में मिलाकर घोल बना लें। इस घोल की 4 बूंद आंखों में डालने से सर्दी में आई हुई आंख का दर्द, आंखों का सूजना और लाल होना दूर हो जाता है।

39 वन्यकाहू के बीज: -वन्यकाहू के बीज के तेल से सिर में मालिश करने से बालों में बहुत लाभ होता है।

40 गले के रोग: -मूंग की दाल के दाने की आधी मात्रा के बराबर अफीम खाने से सर्दी लगने की वजह से बैठा हुआ गला खुल जाता है।

लवण भास्कर चूर्ण

लवण भास्कर चूर्ण
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इस योग को आचार्य भास्कर ने बनाया था।
ऊपर से नमक डालने के बजाय थोड़ी मात्रा में लवन भास्कर का उपयोग करे , ये आम , वात और कफ दोषों को दूर करेगा।
घटक द्रव्य-सेंधानमक,विडनमक,पीपल,पिपलामूल,तेजपात, काला जीरा,तालीस पत्र,नागकेशर, अम्लवेत,सौचल नमक,जीरा,काली मिर्च,सोंठ,समुद्री नमक,अनार दाना,बड़ी इलायची,दाल चीनी आदि।
यह खाना पचाने का एक जायकेदार योग है।यह एक निरापद योग है जो 1 से 3 ग्राम की मात्रा में लेने पर उदर संबंधी रोगों को अपने से दूर रखा जा सकता है।इसे लेने से लार और पाचक रस सही मात्रा में बनते है। यह योग वैसे छाछ या मट्ठे के साथ सर्वोत्तम लाभ प्रदान करता है किन्तु काँजी,दही का पानी या सामान्य गर्म जल के साथ भी लिया जा सकता है व इसके लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।रात को सोने से पहले गर्म पानी से लिया हुआ चूर्ण सुबह को साफ व खुलकर शौच लाता है और कब्ज से राहत प्रदान करता है।यह कफ को दूर करता है इसलिए सर्दी ज़ुकाम और सांस की बीमारियों में राहत देता है। त्वचा सम्बन्धी बीमारियों और आम वात की बीमारियाँ जैसे अर्थराइटिस में लाभकारी।
इस योग के प्रयोग से पेट की वायु,डकार आना तथा भूख न लगना आदि रोगों का शमन बड़ी ही आसानी से हो जाता है।यह पित्त को बढाए बिना अग्नि जठराग्नि यानी भूख को बढ़ाता है।
सावधानी -सामान्य नमक की तरह ही गुर्दे की बीमारियों और उच्च रक्तचाप पर इसे नहीं लेना चाहिए।गर्भवती स्त्रियों को भी इसे नहीं लेना चाहिए।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

आयुर्वेदिक चाय


आयुर्वेदिक चाय
लाभ-- इस पेय के सेवन से शरीर में स्फूर्ति व मस्तिष्क में शक्ति आती है । पाचनक्रिया में सुधार होता है और भूख बढ़ती है । सर्दी, बलगम, खांसी, दमा, श्वास, कफजन्य ज्वर और न्युमोनिया जैसे रोग होने की सम्भावना कम हो जाती है । इसे ओजस्वी चाय नाम दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
सामग्री
(१) गुलबनपशा २५ ग्राम
(२) छाया में सुखाये हुए तुलसी के पत्ते २५ ग्राम
(३) तज २५ ग्राम
(४) छोटी इलायची १२ ग्राम
(५) सोंफ १२ ग्राम
(६) ब्राह्मी के सूखे पत्ते १२ ग्राम
(७) छिली हुई जेठीमधु १२ ग्राम
विधि-- उपर्युक्त प्रत्येक वस्तु को अलग-अलग कूटकर चूर्ण बना के मिश्रित कर लें । जब चाय-कॉफी पीने की आवश्यकता महसूस हो, तब मिश्रण में से ५-६ ग्राम चूर्ण लेकर ४०० ग्राम पानी में उबालें । जब आधा पानी बाकी रहे तब नीचे उतारकर छान लें । उसमें दूध-खांड मिलाकर धीरे-धीरे पियें । चीन जैसे देशों में तो आयुर्वेदिक चाय का प्रचलन बढ़ रहा है, फिर हमारे देशवासी चाय-कॉफी पीकर अपनी तबाही क्यों करें ?

स्वास्थ्यवर्धक मेथी के लड्डू

सर्दी मे आने वाली हरी पत्तेदार सब्जियाँ स्वस्थ्य के लिए बहुत ही फायदेमंद होती हैं। इसमे बात अगर मेथी की हो तो मेथी तो वो सब्जी है जो खाने के स्वाद को और ज्यादा बढ़ा देती है। दवाई के रूप मे मेथी का उपयोग हजारों साल से होता रहा है। कमर दर्द, बदन दर्द, गठिया, प्रसूता के लिए, डाईबीटीज़, आंखो की कमजोरी, शारीरिक दुर्बलता व मूत्र संबंधी विकार मे मेथी अत्यधिक फायदेमंद है।
आज आपको मेथी के लड्डू बनाने की विधि और उसके फायदे के बारे मे बता रहा हूँ। स्त्रियाँ भी इस लड्डू का सेवन करके सदैव स्वस्थ रह सकती हैं। अभी सर्दियाँ शुरू हो चुकी हैं तो इसका प्रयोग निश्चित ही आप सभी के लिए बहुत अच्छा रहेगा।
मेथी दाना 500 ग्राम, सौंठ का पाउडर 250 ग्राम, 500 ग्राम शुद्ध घी, चार लीटर दूध, 1.5 किलोग्राम चीनी, छोटी पिपला मूल, अजवायन, जीरा, कलौंजी, सौंफ, धनिया, कचूर, तेजपात, दालचीनी, जायफल और नागरमोथा सभी प्रति 10 ग्राम की मात्रा मे लें। सभी सामग्री को खूब अच्छे से कूट-पीसकर बारीक चूर्ण बना लें। अब दूध को कढ़ाई मे डालकर खूब औटाएँ। जब दूध आधा रह जाए तब इसमे मेथी चूर्ण व सौंठ का चूर्ण डालकर इसे हिलाते रहे व इसका मावा बना दें। अब घी डालकर इसकी गुलाबी होने तक इसकी सिकाई करें। अब इसमे बाकी की सभी औषधियाँ मिलकर गाढ़ा होने तक सेंकें। अब इसको नीचे उतारकर इसको बर्फी या 10-10 ग्राम के लड्डू के रूप मे बांध लें।
इस लड्डू को सुबह 20 ग्राम की मात्रा मे दूध के साथ सेवन करने से सभी तरह के वायु विकार समाप्त हो जाते हैं। शरीर हृष्टपुष्ट होता हैं। स्त्रियाँ प्रसव के बाद इसे सेवन करें। इससे शरीर कांतिवान होगा। जिन व्यक्तियों के जोड़ों मे दर्द, घुटनों मे दर्द, थकान सी महसूस होना, पैरों के तलुओं मे पसीना आना, बाएंटे आना व अन्य कोई भी वायु विकार आदि दोष इसके सेवन से समाप्त हो जाते हैं।

शुक्रवार, 23 अक्टूबर 2015

संग्रहणी

संग्रहणी :-
मंदाग्नि के कारण भोजन न पचने पर अजीर्ण होकर दस्त लगते लगते हैं तो यही दस्त संग्रहणी कहलाती है। अर्थात् खाना खाने के बाद तुरंत ही शौच होना या खाने के बाद थोड़ी देर में अधपचा या अपरिपक्व मल निकलना संग्रहणी कही जाती है। इस रोग के कारण अन्न कभी पचकर, कभी बिना पचे, कभी पतला, कभी गाढ़ा कष्ट या दुर्गंध के साथ शौच के रूप में निकलता है। शरीर में दुर्बलता आ जाती है।
वातज संग्रहणी :- जो मनुष्य वातज पदार्थों का भक्षण करे, मिथ्या आहार-विहार करे और अति मैथुन करे तो बादी कुपित होकर जठराग्नि को बिगाड़ देती है। तब वातज संग्रहणी उत्पन्न होती है।
पित्तज संग्रहणी :- जो पुरुष गरम वस्तु का सेवन अधिक करे, मिर्च आदि तीक्ष्ण, खट्टे और खारे पदार्थ खाए तो उसका पित्त दूषित होकर जठराग्नि को बुझा देता है। उसका कच्चा मल निकलने लगता है तब पित्तज संग्रहणी होती है।
कफज संग्रहणी :- जो पुरुष भारी, चिकनी व शीतल वस्तु खाते हैं तथा भोजन करके सो जाते हैं, उस पुरुष का कफ कुपित होकर जठराग्नि को नष्ट कर देता है।
लक्षण :-
वातज :- खाया हुआ आहार कष्ट से पचे, कंठ सूखे, भूख न लगे, प्यास अधिक लगे, कानों में भन-भन होना, जाँघों व नाभि में पीड़ा होना आदि।
पित्तज :- कच्चा मल निकले, पीले वर्ण का पानी मल सहित गुदाद्वार से निकलना और खट्टी डकारें आना।
कफज :- अन्न कष्ट से पचे, हृदय में पीड़ा, वमन और अरुचि हो, मुँह मीठा रहे, खाँसी, पीनस, गरिष्ठता और मीठी डकारें आना।
घरेलू उपचार :-
1........ सोंठ, पीपल, पीपलामूल, चव्य एवं चित्रक का 8 ग्राम चूर्ण नित्य गाय के दूध से बनी छाछ के साथ पिएँ, ऊपर से दो-चार बार और भी छाछ पिएँ तो वात संग्रहणी दूर होगी।
2.......... 8 ग्राम शुद्ध गंधक, 4 ग्राम शुद्ध पारद की कजली, 10 ग्राम सोंठ, 8 ग्राम काली मिर्च, 10 ग्राम पीपली, 10 ग्राम पांचों नमक, 20 ग्राम सेंकी हुई अजवायन, 20 ग्राम भूनी हुई हींग, 24 ग्राम सेंका सुहागा और एक पैसे भर भुनी हुई भाँग-इन सबको पीसकर-छानकर कजली मिला दें। उसके बाद इसे दो दिन बाद भी पीसें तो चूर्ण बन जाए। यह 2 या 4 ग्राम चूर्ण गाय के दूध से बनी छाछ के साथ पीने से वात संग्रहणी मिटती है।
3........... जायफल, चित्रक, श्वेत चंदन, वायविडंग, इलायची, भीमसेनी कपूर, वंशलोचन, जीरा, सोंठ, काली मिर्च, पीपली, तगर, पत्रज और लवंग बराबर-बराबर लेकर चूर्ण बनाकर इन सबके चूर्ण से दुगुनी मिश्री और थोड़ी बिना सेंकी भाँग-ये सब मिलाकर इसमें से 4 या 6 ग्राम चूर्ण गाय के दूध की छाछ के साथ पंद्रह दिनों तक सेवन करें तो पित्त संग्रहणी दूर होगी।
4......... रसोत, अतीस, इंद्रयव, तज, धावड़े के फूल सबका 8 ग्राम चूर्ण गाय के दूध की छाछ के साथ या चावल के पानी के साथ पंद्रह दिनों तक लें तो पित्त संग्रहणी नष्ट होगी।
5......... हरड़ की छाल, पिप्पली, सोंठ, चित्रक, सेंधा नमक और काली मिर्च का 8 ग्राम चूर्ण नित्य गाय के दूध की छाछ के साथ पंद्रह दिन तक सेवन करें तो कफ संग्रहणी दूर होगी।
6.......प्रातः एवं साँय रामबाण रस सादे पानी के साथ। दोपहर मे 250 मिलीग्राम सिद्ध्प्राणेश्वर चावल के पानी से लेने से संग्रहणी रोग से मुक्ति मिलती है।
सभी प्रकार के उदर रोग के लिए शंख भस्म 125 मिलीग्राम, सिद्धप्राणेश्वर 125 मिलीग्राम, रामबाण रस 125 मिलीग्राम, स्वर्ण पर्पटी 60 मिलीग्राम, मकरध्वज 60 मिलीग्राम इन सबको मिलाकर दो पुड़िया बनाकर सुबह शाम भुने हुए जीरे और शहद के साथ लें।
प्रातःकाल मूंग-चावल की खिचड़ी खाएं। शाम को शुद्ध घी का हलवा खाने से इस रोग का निदान हो जाता है।

गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

गोंद के औषधीय गुण -

गोंद के औषधीय गुण -
किसी पेड़ के तने को चीरा लगाने पर उसमे से जो स्त्राव निकलता है वह सूखने पर भूरा और कडा हो जाता है उसे गोंद कहते है .यह शीतल और पौष्टिक होता है . उसमे उस पेड़ के ही औषधीय गुण भी होते है . आयुर्वेदिक दवाइयों में गोली या वटी बनाने के लिए भी पावडर की बाइंडिंग के लिए गोंद का इस्तेमाल होता है .
- कीकर या बबूल का गोंद पौष्टिक होता है .
- नीम का गोंद रक्त की गति बढ़ाने वाला, स्फूर्तिदायक पदार्थ है।इसे ईस्ट इंडिया गम भी कहते है . इसमें भी नीम के औषधीय गुण होते है - पलाश के गोंद से हड्डियां मज़बूत होती है .पलाश का 1 से 3 ग्राम गोंद मिश्रीयुक्त दूध अथवा आँवले के रस के साथ लेने से बल एवं वीर्य की वृद्धि होती है तथा अस्थियाँ मजबूत बनती हैं और शरीर पुष्ट होता है।यह गोंद गर्म पानी में घोलकर पीने से दस्त व संग्रहणी में आराम मिलता है।
- आम की गोंद स्तंभक एवं रक्त प्रसादक है। इस गोंद को गरम करके फोड़ों पर लगाने से पीब पककर बह जाती है और आसानी से भर जाता है। आम की गोंद को नीबू के रस में मिलाकर चर्म रोग पर लेप किया जाता है।
- सेमल का गोंद मोचरस कहलाता है, यह पित्त का शमन करता है।अतिसार में मोचरस चूर्ण एक से तीन ग्राम को दही के साथ प्रयोग करते हैं। श्वेतप्रदर में इसका चूर्ण समान भाग चीनी मिलाकर प्रयोग करना लाभकारी होता है। दंत मंजन में मोचरस का प्रयोग किया जाता है।
- बारिश के मौसम के बाद कबीट के पेड़ से गोंद निकलती है जो गुणवत्ता में बबूल की गोंद के समकक्ष होती है।
- हिंग भी एक गोंद है जो फेरूला कुल (अम्बेलीफेरी, दूसरा नाम एपिएसी) के तीन पौधों की जड़ों से निकलने वाला यह सुगंधित गोंद रेज़िननुमा होता है । फेरूला कुल में ही गाजर भी आती है । हींग दो किस्म की होती है - एक पानी में घुलनशील होती है जबकि दूसरी तेल में । किसान पौधे के आसपास की मिट्टी हटाकर उसकी मोटी गाजरनुमा जड़ के ऊपरी हिस्से में एक चीरा लगा देते हैं । इस चीरे लगे स्थान से अगले करीब तीन महीनों तक एक दूधिया रेज़िन निकलता रहता है । इस अवधि में लगभग एक किलोग्राम रेज़िन निकलता है । हवा के संपर्क में आकर यह सख्त हो जाता है कत्थई पड़ने लगता है ।यदि सिंचाई की नाली में हींग की एक थैली रख दें, तो खेतों में सब्ज़ियों की वृद्धि अच्छी होती है और वे संक्रमण मुक्त रहती है । पानी में हींग मिलाने से इल्लियों का सफाया हो जाता है और इससे पौधों की वृद्धि बढ़िया होती
- गुग्गुल एक बहुवर्षी झाड़ीनुमा वृक्ष है जिसके तने व शाखाओं से गोंद निकलता है, जो सगंध, गाढ़ा तथा अनेक वर्ण वाला होता है. यह जोड़ों के दर्द के निवारण और धुप अगरबत्ती आदि में इस्तेमाल होता है .
- प्रपोलीश- यह पौधों द्धारा श्रावित गोंद है जो मधुमक्खियॉं पौधों से इकट्ठा करती है इसका उपयोग डेन्डानसैम्बू बनाने में तथा पराबैंगनी किरणों से बचने के रूप में किया जाता है।
- ग्वार फली के बीज में ग्लैक्टोमेनन नामक गोंद होता है .ग्वार से प्राप्त गम का उपयोग दूध से बने पदार्थों जैसे आइसक्रीम , पनीर आदि में किया जाता है। इसके साथ ही अन्य कई व्यंजनों में भी इसका प्रयोग किया जाता है.ग्वार के बीजों से बनाया जाने वाला पेस्ट भोजन, औषधीय उपयोग के साथ ही अनेक उद्योगों में भी काम आता है।
- इसके अलावा सहजन , बेर , पीपल , अर्जुन आदि पेड़ों के गोंद में उसके औषधीय गुण मौजूद होते है