गुरुवार, 6 अक्टूबर 2016
गुरुवार, 15 सितंबर 2016
*वातोल्बण विषम ज्वर* *(Chikungunya)*
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*वातोल्बण विषम ज्वर*
*(Chikungunya)*
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विविध प्रकार के विषम-ज्वर (Viral fevers) यदा-कदा जनपदोध्वंसीय (Epidemic) रूप धारण कर, मनुष्यों को कष्ट देते रहते हैं। कभी-कभी तो ये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मृत्यु का हेतु तक बन जाते हैं।
अतः वैद्यों को विषम-ज्वरों के युगानुरूप (Updated) हेतुओं, रूपों, निदान, साध्यासाध्यता, व उपचार का स्पष्ट ज्ञान होना आवश्यक है ।
गत कई वर्षों से वातोल्बण विषम ज्वर (Chikungunya) भारत के कई भागों में जनपदोध्वंस के रूप में फैलता दिखाई दे रहा है। इसे देखते हुए इस रोग के विविध पहलुओं पर विचार करने के लिए आज का अपडेट तैयार किया है। आशा है विद्वान वैद्य त्रुटियों को दृष्टिविगत करते हुए सारग्रहण कर कृतार्थ करेंगे।
*हेतु (Etiology)*
1. वातोल्बण विषम ज्वर (Chikungunya) का मूल हेतु चिकुनगुन्या वायरस (Chikungunya virus) द्वारा संक्रमण (कृमिज संक्रमण / भूताभिषंग) है, जो एॅडीज़ एॅजिप्टाइ (Aedes aegypti) मच्छर द्वारा काटने पर त्वक्-मार्ग से मनुष्य देह में प्रवेश पाता है।
2. व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधिनी-क्षमता / ओजस् / बल (Immunity) क्षीण होने पर इस रोग के उत्पन्न होने व बढ़ने की सम्भावना बढ़ जाती है।
*सम्प्राप्ति (Pathogenesis)*
_1. विषमयता (Viremia)_ -
एॅडीज़ एॅजिप्टाइ (Aedes aegypti) मच्छर के दंश व उसके कारण चिकुनगुन्या वायरस के देह में प्रवेश के लगभग 2-12 (प्रायः 4-8) दिवस तक उक्त वायरस की देह-धातुओं (मांस-अस्थि-सन्धि-स्नायु-कण्डराओं) में द्रुतगति से संख्या-वृद्धि (Replication) होती है।
_2. धातुनाश (Increased cell death)_ -
चिकुनगुन्या वायरस की देह में द्रुतगति से संख्या-वृद्धि का सबसे पहला व बड़ा परिणाम यह होता है कि इससे देह-धातुओं का नाश आरम्भ हो जाता है। यह धातु-नाश मुख्य रूप से चिकुनगुन्या वायरस के संचय-स्थलों - मांस-धातु (Muscles), स्नायु-कण्डरा उपधातु (Fibrous tissue), व अस्थि-सन्धि (Skeletal tissues - bones and joints) - में अत्यधिक होता है।
_3. ओजस्-क्रियाशीलता (Activation of the immune system)_ -
उपरोक्त घटनाओं के फलस्वरूप ओजस् व कफ-दोष (Immune system) क्रियाशील (Activate) हो कर, देह-धातुओं की सुरक्षा हेतु कई प्रकार के रक्षा-द्रव्यों (Interferons etc.) का निर्माण करते हैं, जो वायरस को नष्ट करने का कार्य करते हैं।
_4. वात-प्रकोप (Activation of the neuro-endocrine system)_ -
उपरोक्त घटनाओं के फलस्वरूप वात दोष (Neuro-endocrine system) का प्रकोप हो कर देह की नानाविध क्रियाओं (Physiological activities) में विषमता (Abnormalities) उत्पन्न होती है।
_5. शोथ (Inflammation)_ -
चिकनगुन्या वायरस व रक्षा-द्रव्यों (Defence substances) के द्वन्द्व में कई प्रकार के आमविष (Toxins) व पित्त-वर्गीय द्रव्यों (Enzymes) की उत्पत्ति होकर द्वन्द्व के स्थान (मांस-अस्थि-सन्धि-स्नायु-कण्डराओं) में शोथ, जाड्य, व अन्य कई प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं। ये विकृतियाँ कुछ दिनों से लेकर कई वर्षों तक रहती हैं व रोगी को कई प्रकार के कष्ट देती हैं।
*रूप (Presentation)*
1. ज्वर (Fever) - सहसा दारुण ज्वर (102-104° F) का होना।
2. अनेकविध चल-अचल, दारुण वेदनाएँ (Severe body pains) - जो प्रायः मांस-अस्थि-सन्धि-स्नायु-कण्डराओं में होती हैं, तथा शिरःशूल का होना।
3. रक्त-पिडिकाएँ (Maculo-papular rash on the skin)।
4. क्लम (Extreme exhaustion) व अतिदौर्बल्य (Weakness)।
5. अरुचि, हृल्लास, अतिसार आदि पचन सम्बन्धी कष्ट।
6. नेत्राभिष्यन्द (Conjunctivitis)।
7. अंग-सुप्तता (Flaccid paralysis & neuropathies), इत्यादि।
*साध्यासाध्यता (Course & Prognosis)*
वातोल्बण-विषम-ज्वर (Chikungunya) विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न रूप अपनाता है।
जबकि अधिकांश रोगी स्वतः पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाते हैं, फिर भी कुछेक रोगियों को इससे होने वाले कष्ट (विशेष रूप से अस्थि-सन्धि वेदना) जीर्ण अवस्था धारण कर रोगी को दीर्घावधि तक पीड़ित करते रहते हैं। यहाँ तक कि कभी-कभी तो ये कष्ट आजीवन रहते हैं। इसका मुख्य हेतु वायरस व वायरस-जन्य आमविष-द्रव्यों (Antigens) का धातुओं में लीन होकर दीर्घावधि तक बने रहना होता है।
रोगी का बल (Immunity) कम होने पर (विशेष रूप से बाल्यकाल व वृद्धावस्था में) कभी-कभी रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। आंकड़ों की माने तो एक हज़ार रोगियों में एक रोगी की मृत्यु सम्भावित रहती है।
*उपचार (Management)*
वातोल्बण-विषम-ज्वर (Chikungunya) का उपचार निम्न चिकित्सा सिद्धांतों के आधार पर किया जा सकता है -
_1. विषम-ज्वरहर औषधियाँ (Antiviral drugs):_
कालमेघ, भल्लातक, दुग्धिका (Antivir tablet 2 tds); भूम्यामलकी, काकमाची (Livie tablet 1 tds); इत्यादि।
_2. शोथहर औषधियाँ (Anti-inflammatory drugs)_:
शल्लकी, एरण्डमूल (Loswel tablet 1-2 tds); गुग्गुलु (कैशोर, योगराज); रास्ना, दशमूल इत्यादि।
_3. वेदनाहर औषधियाँ (Analgesic drugs)_:
जातिफल, वत्सनाभ, गोदन्ती (Dolid tablet 1-2 tds / sos); गुग्गुलु (महायोगराज); महावातविध्वंसन रस, पिप्पलीमूल इत्यादि।
_4. रसायन औषधियाँ (Immuno-modulator drugs)_:
गुडूची, तुलसी, पिप्पली, अश्वगंधा, भल्लातक, गोमूत्र इत्यादि।
_5. बल्य व धातुवर्धक औषधियाँ (Antioxidant drugs)_:
शिलाजतु, आमलकी, स्वर्णमाक्षिक, मुक्ताशुक्ति, अभ्रक, यशद (Minovit tablet) इत्यादि ।
_6. मेध्य रसायन औषधियाँ (Neurotropic drugs)_:
a. मनोद्वेग व अरति (बेचैनी) होने पर ब्राह्मी, तगर (Mentocalm tablet 1-2 tds), जटामांसी, शंखपुष्पी, मण्डूकपर्णी इत्यादि मनोशामक औषधियाँ ।
b. मनोअवसाद होने पर ज्योतिष्मती, अकरकरा, वचा, गण्डीर (Eleva tablet 1-2 tds) इत्यादि उत्तेजक औषधियाँ ।
_7. हृद्य व व्यान-बल्य औषधियाँ (Cardiotonic drugs)_:
हृद्दौर्बल्य (Depressed cardiac activity) व व्यान-क्षय (Hypotension) होने पर अर्जुन, अकीक, ज़हरमोहरा, गण्डीर, वनपलाण्डु (Carditonz tablet); कर्पूर, कस्तूरी, स्वर्ण, नागरवेल, मकरध्वज इत्यादि।
_8. पथ्यापथ्य (Do's and don'ts)_:
रोगी को आवश्यक पोषण व जल देते रहना आवश्यक है। इसके साथ-साथ पूर्ण विश्राम (मानसिक व शारीरिक) भी ज़रूरी है। रोगी का मनोबल बढ़ाने हेतु आश्वासन देते रहना चाहिए ।
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**चिकनगुनिया के बुखार के ठीक होने के बाद भी जोड़ों का दर्द नही जा रहा तो यह है उपाय---
इस प्रयोग के लिये आपको निम्नलिखित चीजों की जरूरत पड़ेगी :-
1 :- लहसुन की 2 कलियॉ
2 :- हरसिंगार के 5 पत्ते
3 :- तुलसी के 5 पत्ते
4 :- जंगली अजवायन या अजमोद 1 ग्राम
.
ऊपर लिखे सभी सामान लेकर एक छोटी ओखली में कूट लीजिये जिससे इन सभी की चटनी जैसी बन जायेगी । बस यह आपकी दवा तैयार है । इस दवा को दिन में दो समय सेवन करना है, सुबह खाली पेट और रात को सोने से पहले । इसके साथ गुनगुना पानी अथवा दूध का सेवन किया जा सकता है ।
ध्यान रखें कि हर बार ताजी चटनी बनाकर ही सेवन करने से उत्तम लाभ होगा । दर्द वाले जोड़ों पर इसी चटनी से मालिश भी की जा सकती है ।
**चिकनगुनिया के दर्द से राहत दिलाने वाला तेल
सामग्री :-
50 ग्राम सरसों का तेल
50 ग्राम सफेद तिल का तेल
15 लौंग
1 टुकडा दालचीनी
2 टेबल स्पून अजवायन
1 टेबल स्पून मेथी दाना
15 लहसुन की कली बारिक कटी हुई
1 छोटा टुकडा अदरक पिसा हुआ
1 टी स्पून हल्दी
2 बडे पीस कपूर
1 टेबल स्पून एलोवेरा जैल
विधि :-
कढाई मे दोनो तेल डाल कर तेज गैस पर गर्म करो फिर गैस को धीमी करके हल्दी और कपूर को छोड कर सारी चीजो को डाल दो , जब तक सारी चीजे जल न जाए और उन का सत तेल मे ना आ जाऐ , करीब 20-25 मिन्ट लगेंगे इन्हें जलने मे जब ये भून जाएगें तब तेल का रंग गहरा हो जाएगा फिर गैस बंद कर दे और उसमे हल्दी ,कपूर मिला दे जब तक कपूर घुल ना जाए तब तक तेल को ठंडा होने दे फिर तेल को छान कर एक शीशी मे भर कर रखो , कैसा भी बुरा दर्द हो इससे मालिश से गायब हो जाएगा
कृप्या कोई भी पेन किलर ना खाऐ तबियत खराब हो जाएगी चिकन गुनिया मे ये तेल बहुत असरदार है बनाकर मालिश करके देखे जिन्हे तकलीफ हो
चिकनगुनिया मे पैरो मे और जोइंट पेन ज्यादा होता है यह तेल 100% फायदेमंद है लगाते ही आराम आना शुरू हो जाएगा पहले दिन से . दिन मे 3 बार मालिश करें |
सोमवार, 5 सितंबर 2016
Ayurved Books
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रविवार, 4 सितंबर 2016
आंवला
आंवला चूर्ण और हल्दी चूर्ण समान मात्र में लेकर भोजन के पश्चात ग्रहण करने से मधुमेह में लाभ प्राप्त होता है।
हिचकी तथा उल्टी में आंवला रस, मिश्री के साथ दिन में दो-तीन बार सेवन करें। पीलिया से परेशान हैं तो आंवले को शहद के साथ चटनी बनाकर सुबह-शाम सेवन करें। आंवला, रीठा व शिकाकाई के चूर्ण से बाल धोने पर बाल स्वस्थ व चमकदार होते हैं।
आंवले का मुरब्बा शक्तिदायक व शीतलता प्रदान करने वाला होता है। स्मरण शक्ति कमजोर पड़ गई हो तो सुबह उठकर गाय के दूध के साथ दो आंवले का मुरब्बा खाना चाहिए।
वमन (उल्टी) : -* हिचकी तथा उल्टी में आंवले का 10-20 मिलीलीटर रस, 5-10 ग्राम मिश्री मिलाकर देने से आराम होता है। इसे दिन में 2-3 बार लेना चाहिए। केवल इसका चूर्ण 10-50 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ भी दिया जा सकता है।
* त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) से पैदा होने वाली उल्टी में आंवला तथा अंगूर को पीसकर 40 ग्राम खांड, 40 ग्राम शहद और 150 ग्राम जल मिलाकर कपड़े से छानकर पीना चाहिए।
* आंवले के 20 ग्राम रस में एक चम्मच मधु और 10 ग्राम सफेद चंदन का चूर्ण मिलाकर पिलाने से वमन (उल्टी) बंद होती है।
* आंवले के रस में पिप्पली का बारीक चूर्ण और थोड़ा सा शहद मिलाकर चाटने से उल्टी आने के रोग में लाभ होता है।
* आंवला और चंदन का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर 1-1 चम्मच चूर्ण दिन में 3 बार शक्कर और शहद के साथ चाटने से गर्मी की वजह से होने वाली उल्टी बंद हो जाती है।
* आंवले का फल खाने या उसके पेड़ की छाल और पत्तों के काढ़े को 40 ग्राम सुबह और शाम पीने से गर्मी की उल्टी और दस्त बंद हो जाते हैं।
* आंवले के रस में शहद और 10 ग्राम सफेद चंदन का बुरादा मिलाकर चाटने से उल्टी आना बंद हो जाती है।
संग्रहणी : -मेथी दाना के साथ इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर 10 से 20 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार पिलाने से संग्रहणी मिट जाती है।
"मूत्रकृच्छ (पेशाब में कष्ट या जलन होने पर) : -* आंवले की ताजी छाल के 10-20 ग्राम रस में दो ग्राम हल्दी और दस ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से मूत्रकृच्छ मिटता है।
* आंवले के 20 ग्राम रस में इलायची का चूर्ण डालकर दिन में 2-3 बार पीने से मूत्रकृच्छ मिटता है।
विरेचन (दस्त कराना) : -रक्त पित्त रोग में, विशेषकर जिन रोगियों को विरेचन कराना हो, उनके लिए आंवले के 20-40 मिलीलीटर रस में पर्याप्त मात्रा में शहद और चीनी को मिलाकर सेवन कराना चाहिए।
अर्श (बवासीर) : -* आंवलों को अच्छी तरह से पीसकर एक मिट्टी के बरतन में लेप कर देना चाहिए। फिर उस बरर्तन में छाछ भरकर उस छाछ को रोगी को पिलाने से बवासीर में लाभ होता है।
* बवासीर के मस्सों से अधिक खून के बहने में 3 से 8 ग्राम आंवले के चूर्ण का सेवन दही की मलाई के साथ दिन में 2-3 बार करना चाहिए।
* सूखे आंवलों का चूर्ण 20 ग्राम लेकर 250 ग्राम पानी में मिलाकर मिट्टी के बर्तन में रात भर भिगोकर रखें। दूसरे दिन सुबह उसे हाथों से मलकर छान लें तथा छने हुए पानी में 5 ग्राम चिरचिटा की जड़ का चूर्ण और 50 ग्राम मिश्री मिलाकर पीयें। इसको पीने से बवासीर कुछ दिनों में ही ठीक हो जाती है और मस्से सूखकर गिर जाते हैं।
* सूखे आंवले को बारीक पीसकर प्रतिदिन सुबह-शाम 1 चम्मच दूध या छाछ में मिलाकर पीने से खूनी बवासीर ठीक होती है।
* आंवले का बारीक चूर्ण 1 चम्मच, 1 कप मट्ठे के साथ 3 बार लें।
* आंवले का चूर्ण एक चम्मच दही या मलाई के साथ दिन में तीन बार खायें।
शुक्रमेह : -धूप में सुखाए हुए गुठली रहित आंवले के 10 ग्राम चूर्ण में दुगनी मात्रा में मिश्री मिला लें। इसे 250 ग्राम तक ताजे जल के साथ 15 दिन तक लगातार सेवन करने से स्वप्नदोष (नाइटफॉल), शुक्रमेह आदि रोगों में निश्चित रूप से लाभ होता है।
खूनी अतिसार (रक्तातिसार) : -यदि दस्त के साथ अधिक खून निकलता हो तो आंवले के 10-20 ग्राम रस में 10 ग्राम शहद और 5 ग्राम घी मिलाकर रोगी को पिलायें और ऊपर से बकरी का दूध 100 ग्राम तक दिन में 3 बार पिलाएं।
रक्तगुल्म (खून की गांठे) : -आंवले के रस में कालीमिर्च डालकर पीने से रक्तगुल्म खत्म हो जाता है।
प्रमेह (वीर्य विकार) : -* आंवला, हरड़, बहेड़ा, नागर-मोथा, दारू-हल्दी, देवदारू इन सबको समान मात्रा में लेकर इनका काढ़ा बनाकर 10-20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम प्रमेह के रोगी को पिला दें।
* आंवला, गिलोय, नीम की छाल, परवल की पत्ती को बराबर-बराबर 50 ग्राम की मात्रा में लेकर आधा किलो पानी में रातभर भिगो दें। इसे सुबह उबालें, उबलते-उबलते जब यह चौथाई मात्रा में शेष बचे तो इसमें 2 चम्मच शहद मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से पित्तज प्रमेह नष्ट होती है।
पित्तदोष : -आंवले का रस, शहद, गाय का घी इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर आपस में घोटकर लेने से प
मंगलवार, 9 अगस्त 2016
आयुर्वेदिक औषधीय तेल
*⚫🔆आयुर्वेदिक औषधीय तेल
⚫🔆*
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⚫आयुर्वेदिक दवाओं की जानकारी में हम अभी तक अनेक प्रकार की दवाएँ तथा विभिन्न रोगों की दवाएँ बता चुके हैं। इसी कड़ी के अंतर्गत हम आयुर्वेदिक औषधीय तेलों की उपयोगी जानकारी दे रहे हैं।
*⚫अणु तेल :* सिर का दर्द, आधा सीसी, पीनस, नजला, अर्दित, मन्यास्तम्भ आदि में लाभप्रद।
*⚫इरमेदादि तेल :* दंत रोगों में लाभदायक। मसूढ़ों के रोग, मुंह से दुर्गन्ध आना, जीभ, तालू व होठों के रोगों में लाभप्रद। ब्रणोपचार के लिए उत्तम। प्रयोग विधि : मुख रोगों में मुंह में भरना अथवा दिन में तीन-चार बार तीली से लगाना।
*⚫काशीसादि तेल :* व्रण शोधक तथा रोपण है। इसके लगाने से बवासीर के मस्से नष्ट हो जाते हैं। नाड़ी व्रण एवं दूषित व्रणों के उपचार हेतु लाभकारी। प्रयोग विधि : बवासीर में दिन में तीन चार बार गुदा में लगाना अथवा रूई भिगोकर रखना।
*⚫गुडुच्यादि तेल :* वात रक्त, कुष्ठ रोग, नाड़ी व्रण, विस्फोट, विसर्प व पाद दाहा पर उपयुक्त।
*⚫चंदनबला लाशादि तेल :* इसके प्रयोग से सातों धातुएं बढ़ती हैं तथा वात विकार नष्ट होते हैं। कास, श्वास, क्षय, शारीरिक क्षीणता, दाह, रक्तपित्त, खुजली, शिररोग, नेत्रदाह, सूजन, पांडू व पुराने ज्वर में उपयोगी है। दुबले-पतले शरीर को पुष्ट करता है। बच्चों के लिए सूखा रोग में लाभकारी। सुबह व रात्रि को मालिश करना चाहिए।
*⚫जात्यादि तेल :* नाड़ी व्रण (नासूर), जख्म व फोड़े के जख्म को भरता है। कटे या जलने से उत्पन्न घावों को व्रणोपचार के लिए उत्तम। प्रयोग
*🔆विधि :* जख्म को साफ करके तेल लगावें या कपड़ा भिगोकर बांधें।
*⚫नारायण तेल :* सब प्रकार के वात रोग, पक्षघात (लकवा), हनुस्म्भ, कब्ज, बहरापन, गतिभंग, कमर का दर्द, अंत्रवृद्धि, पार्श्व शूल, रीढ़ की हड्डी का दर्द, गात्र शोथ, इन्द्रिय ध्वंस, वीर्य क्षय, ज्वर क्षय, दन्त रोग, पंगुता आदि की प्रसिद्ध औषधि। सेवन में दो-तीन बार पूरे शरीर में मालिश करना चाहिए। मात्रा 1 से 3 ग्राम दूध के साथ पीना चाहिए।
*⚫पंचगुण तेल :* संधिवात, शरीर के किसी भी अवयव के दर्द में उपयोगी। कर्णशूल में कान में बूंदें डालें। व्रण उपचार में फाहा भिगोकर बांधे।
*⚫महाभृंगराज तेल :* बालों का गिरना बंद करता है तथा गंज को मिटाकर बालों को बढ़ाता है। असमय सफेद हुए बालों को काला करता है। माथे को ठंडा करता है। प्रयोग विधि : सिर पर धीरे-धीरे मालिश करना चाहिए।
*🔆महानारायण तेल :* नारायण तेल से अधिक लाभदायक है।
*⚫महामरिचादि तेल :* खाज, खुजली, कुष्ठ, दाद, विस्फोटक, बिवाई, फोड़े-फुंसी, मुंह के दाग व झाई आदि चर्म रोगों और रक्त रोगों के लिए प्रसिद्ध तेल से त्वचा के काले व नीले दाग नष्ट होकर त्वचा स्वच्छ होती है। सुबह व रात्रि को मालिश करना चाहिए।
*⚫महामाष (निरामिष) :* पक्षघात (लकवा), हनुस्तम्भ, अर्दित, पंगुता, शिरोग्रह मन्यास्तम्भ, कर्णनाद तथा अनेक प्रकार के वात रोगों पर लाभकारी।
*⚫महाविषगर्भ तेल :* सब तरह के वात रोगों की प्रसिद्ध औषधि। जोड़ों की सूजन समस्त शरीर में दर्द, गठिया, हाथ-पांव का रह जाना, लकवा, कंपन्न, आधा सीसी, शरीर शून्य हो जाना, नजला, कर्णनाद, गण्डमाला आदि रोगों पर। सुबह व रात्रि मालिश करें।
*⚫महालाक्षादि तेल :* सब प्रकार के ज्वर, विषम ज्वर, जीर्ण ज्वर व तपेदिक नष्ट करता है। कास, श्वास, प्रतिशाय (जुकाम), हाथ-पैरों की जलन, पसीने की दुर्गन्ध शरीर का टूटना, हड्डी के दर्द, पसली के दर्द, वात रोगों को नष्ट करता है। बल, वीर्य कांति बढ़ाता है तथा शरीर पुष्ट करता है। सुबह व रात्रि मालिश करना चाहिए।
*⚫मरिचादि तेल :* महामरिचादि तेल के समान न्यून गुण वाला।
*⚫रोपण तेल :* सब प्रकार के व्रणों (घाव) में ब्रणोपचार के लिए उत्तम। योनि रोग में उत्तर वस्ति में गुणकारी।
*⚫लाक्षादि तेल :* महालाक्षादि तेल के समान न्यून गुण वाला।
*⚫विषगर्भ तेल :* महाविषगर्भ तेल के समान न्यून गुण वाला।
*⚫षडबिंदु तेल :* इस तेल के व्यवहार से गले के ऊपर के रोग जैसे सिर दर्द, सर्दी, (जुकाम), नजला, पीनस आदि में लाभ होता है। सेवन : दिन में दो-तीन बार 5-6 बूंद नाक में डालकर सूंघना चाहिए।
*⚫सैंधवादि तेल :* सभी प्रकार के वृद्धि रोगों में इस तेल के प्रयोग से अच्छा लाभ होता है। आमवात, कमर व घुटने के दर्द आदि में उपयोगी है।
*⚫सोमराजी तेल :* इस तेल की मालिश से रक्त विकार, खुजली, दाद, फोड़ा-फुंसी, चेहरे पर कालिमा आदि में फायदा होता है।
*⚫एरण्ड तेल :* पेट के सुद्दों को दस्त के जरिये निकालता है। जोड़ों के दर्द में लाभकारी है।
*⚫जैतून तेल :* त्वचा को नरम करता है तथा चर्म रोगों में जलन आदि पर लाभप्रद है।
*⚫नीम तेल :* कृमि रोग, चर्म रोग, जख्म व बवासीर में लाभकारी।
*⚫बादाम तेल असली :* दिमाग को ताकत देता है, नींद लाता है, सिर दर्द व दिमाग की खुश्की दूर करता है। मस्तिष्क का कार्य करने वालों को लाभप्रद है। अर्श रोगियों तथा गर्भवती स्त्रियों को लाभकारी। सेवन : सिर पर मालिश करें तथा 3 से 6 ग्राम तक दूध में डालकर पीना चाहिए।
*⚫दयाल तेल :* गठिया का दर्द, पक्षघात (लकवा), कुलंगवात, अर्द्धगवात, चोट लगना, जोड़ों
का दर्द, कमर का दर्द तथा सब प्रकार के वात संबंधी दर्दों को शीघ्र दूर करता है।
*⚫बावची तेल :* सफेद दाग (चकत्ते) तथा अन्य कुष्ट रोगों पर।
*⚫मालकंगनी तेल :* वात व्याधियों में उपयुक्त।
*⚫लौंग तेल :* सिर दर्द व दांत दर्द में अक्सीर है।
*⚫विल्व तेल* कान दर्द, कान में आवाज तथा सनसनाहट होने पर बहरापन दूर करने में विशेष उपयोगी।
शनिवार, 30 जुलाई 2016
सोमवार, 4 जुलाई 2016
कब्ज के लिए आयुर्वेदिक उपचार
कब्ज होने का अर्थ है आपका पेट ठीक तरह से साफ नहीं हुआ है या आपके शरीर में तरल पदार्थ की कमी है। कब्ज के दौरान व्यक्ति तरोजाता महसूस नहीं कर पाता। अगर आपको लंबे समय से कब्ज रहता है और आपने इस बीमारी का इलाज नहीं कराया है तो ये एक भयंकर बीमारी का रूप ले सकती है। कब्ज होने पर व्यक्ति को पेट संबंधी दिक्कते भी होती हैं, जैसे पेट दर्द होना, ठीक से फ्रेश होने में दिक्कत होना, शरीर का मल पूरी तरह से न निकलना इत्यादि । कब्ज के लिए प्रभावी प्राकृतिक उपचार तो मौजूद है ही साथ ही आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से भी कब्ज को दूर किया जा सकता है। आइए जानें कब्ज के लिए कौन-कौन से आयुर्वेदिक उपचार मौजूद हैं।
• कब्ज होने पर अधिक मात्रा में पानी पीने की सलाह दी जाती है, गर्म पानी पीने से फ़ायदा होता हैं। पानी की कमी से आंतों में मल सूख जाता है। और मल निष्कासन में जोर लगाना पडता है। इसलिये कब्ज से परेशान रोगियों के लिये सर्वोत्तम सलाह तो यह है कि मौसम के मुताबिक २४ घंटे में ३ से ५ लिटर पानी पीने की आदत डालना चाहिये। सुबह उठते ही सवा लिटर पानी पीयें। फ़िर ३-४ किलोमिटर तेज चाल से भ्रमण करें। शुरू में कुछ अनिच्छा और असुविधा महसूस होगी लेकिन धीरे-धीरे आदत पड जाने पर कब्ज जड से मिट जाएगी।
• कब्ज के रोगी को तरल पदार्थ व सादा भोजन जैसे दलिया, खिचड़ी इत्यादि खाना चाहिए।
• कब्ज के दौरान कई बार सीने में भी जलन होने लगती हैं। ऐसे में एसीडिटी होने और कब्ज होने पर शक्कर और घी को मिलाकर खाली पेट खाना चाहिए।
• हरी सब्जियों और फलों जैसे पपीता, अंगूर, गन्ना, अमरूद, टमाटर, चुकंदर, अंजीर फल, पालक का रस या कच्चा पालक, किश्मिश को पानी में भिगोकर खाने, रात को मुनक्का खाने से कब्ज दूर करने में मदद मिलती है।
• दरअसल, पानी और तरल पदार्थों की कमी कब्ज का मुख्य कारण है। तरल पदार्थों की कमी से मल आंतों में सूख जाता है और मल निष्कासन में जोर लगाना पडता है। जिससे कब्ज रोगी को खांसी परेशानी होने लगती है।
• इसबगोल की की भूसी कब्ज में परम हितकारी है। दूध या पानी के साथ २-३ चम्मच इसबगोल की भूसी रात को सोते वक्त लेना फ़ायदे मंद है। दस्त खुलासा होने लगता है।यह एक कुदरती रेशा है और आंतों की सक्रियता बढाता है।
• खाने में हरे पत्तेदार सब्जियों के अलावा रेशेदार सब्जियों का सेवन खासतौर पर करना चाहिए। इससे शरीर में तरल पदार्थों में बढ़ोत्तरी होती है।
• चिकनाई वाले पदार्थ भी कब्ज के दौरान लेना अच्छा रहता है।
• गर्म पानी और गर्म दूध कब्ज दूर करते हैं। रात को गर्म दूध में केस्टनर यानी अरंडी का तेल डालकर पीना कब्ज को दूर करने में कारगार है।
• नींबू को पानी में डालकर, दूध में घी डालकर, गर्म पानी में शहद डालकर पीने से कब्ज दूर होती है। सुबह-सुबह गर्म पानी पीने से भी कब्ज को दूर करने में बहुत मदद मिलती है।
• अलसी के बीज का पाउडर पानी के साथ लेने से कब्ज में राहत मिलती है
इस तरह के प्रभावी प्राकृतिक उपचार और आयुर्वेदिक उपचार के माध्यम से कब्ज को स्थायी रूप से आसानी से दूर किया जा सकता है।
• दो सेवफ़ल प्रतिदिन खाने से कब्ज में लाभ होता है।
• अमरूद और पपीता ये दोनो फ़ल कब्ज रोगी के लिये अमॄत समान है। ये फ़ल दिन मे किसी भी समय खाये जा सकते हैं। इन फ़लों में पर्याप्त रेशा होता है और आंतों को शक्ति देते हैं। मल आसानी से विसर्जित होता है।
• अंगूर मे कब्ज निवारण के गुण हैं । सूखे अंगूर याने किश्मिश पानी में ३ घन्टे गलाकर खाने से आंतों को ताकत मिलती है और दस्त आसानी से आती है। जब तक बाजार मे अंगूर मिलें नियमित रूप से उपयोग करते रहें।
• अंजीर कब्ज हरण फ़ल है। ३-४ अंजीर फ़ल रात भर पानी में गलावें। सुबह खाएं। आंतों को गतिमान कर कब्ज का निवारण होता है।
• मुनका में कब्ज नष्ट करने के गुण हैं। ७ नग मुनक्का रोजाना रात को सोते वक्त लेने से कब्ज रोग का स्थाई समाधान हो जाता है।
20 साल पुरानी कब्ज की जडें उखाडने वाला ( रामबाण ) नुस्खा!
रात्रि में 25 ग्राम सोंफ पानी में भिगोकर रखें –
सुबह उसी पानी में उबालें – उबल जाने पर सोंफ को खूब मसलकर उसका पानी छान लें –
इस पानी में 4 मूँग के वजन बराबर ( 200 – 250 मि.ग्राम ) जितनी फुलायी हुई लाल फिटकरी ( शोधित ) का चूर्ण डालकर सुबह खाली पेट 40 दिन तक पीने से पुराने से पुराना यानि 20 वर्ष पुरानी कब्जियत भी दूर हो जाती है !
भोजन करने के तुरन्त बाद वज्रासन में 5-15 मिनट बैठने से पेट की एसिडिटी, अपच और कब्ज से छुटकारा पाया जा सकता है, इस आसन से भोजन जल्दी पचता ही है, साथ ही साथ घुटनों का दर्द में भी आराम मिलता है ।