गुरुवार, 15 सितंबर 2016

*वातोल्बण विषम ज्वर* *(Chikungunya)*


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*वातोल्बण विषम ज्वर*
*(Chikungunya)*
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विविध प्रकार के विषम-ज्वर (Viral fevers) यदा-कदा जनपदोध्वंसीय (Epidemic) रूप धारण कर, मनुष्यों को कष्ट देते रहते हैं। कभी-कभी तो ये प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से मृत्यु का हेतु तक बन जाते हैं।

अतः वैद्यों को विषम-ज्वरों के युगानुरूप (Updated) हेतुओं, रूपों, निदान, साध्यासाध्यता, व उपचार का स्पष्ट ज्ञान होना आवश्यक है ।

गत कई वर्षों से वातोल्बण विषम ज्वर (Chikungunya) भारत के कई भागों में जनपदोध्वंस के रूप में फैलता दिखाई दे रहा है। इसे देखते हुए इस रोग के विविध पहलुओं पर विचार करने के लिए आज का अपडेट तैयार किया है। आशा है विद्वान वैद्य त्रुटियों को दृष्टिविगत करते हुए सारग्रहण कर कृतार्थ करेंगे।


*हेतु (Etiology)*

1. वातोल्बण विषम ज्वर (Chikungunya) का मूल हेतु चिकुनगुन्या वायरस (Chikungunya virus) द्वारा संक्रमण (कृमिज संक्रमण / भूताभिषंग) है, जो एॅडीज़ एॅजिप्टाइ (Aedes aegypti) मच्छर द्वारा काटने पर त्वक्-मार्ग से मनुष्य देह में प्रवेश पाता है।

2. व्यक्ति की रोग-प्रतिरोधिनी-क्षमता / ओजस् / बल (Immunity) क्षीण होने पर इस रोग के उत्पन्न होने व बढ़ने की सम्भावना बढ़ जाती है।


*सम्प्राप्ति (Pathogenesis)*

_1. विषमयता (Viremia)_ -
एॅडीज़ एॅजिप्टाइ (Aedes aegypti) मच्छर के दंश व उसके कारण चिकुनगुन्या वायरस के देह में प्रवेश के लगभग 2-12 (प्रायः 4-8) दिवस तक उक्त वायरस की देह-धातुओं (मांस-अस्थि-सन्धि-स्नायु-कण्डराओं) में द्रुतगति से संख्या-वृद्धि (Replication) होती है।

_2. धातुनाश (Increased cell death)_ -
चिकुनगुन्या वायरस की देह में द्रुतगति से संख्या-वृद्धि का सबसे पहला व बड़ा परिणाम यह होता है कि इससे देह-धातुओं का नाश आरम्भ हो जाता है। यह धातु-नाश मुख्य रूप से चिकुनगुन्या वायरस के संचय-स्थलों - मांस-धातु (Muscles), स्नायु-कण्डरा उपधातु (Fibrous tissue), व अस्थि-सन्धि (Skeletal tissues - bones and joints) - में अत्यधिक होता है।

_3. ओजस्-क्रियाशीलता (Activation of the immune system)_ -
उपरोक्त घटनाओं के फलस्वरूप ओजस् व कफ-दोष (Immune system) क्रियाशील (Activate) हो कर, देह-धातुओं की सुरक्षा हेतु कई प्रकार के रक्षा-द्रव्यों (Interferons etc.) का निर्माण करते हैं, जो वायरस को नष्ट करने का कार्य करते हैं।

_4. वात-प्रकोप (Activation of the neuro-endocrine system)_ -
उपरोक्त घटनाओं के फलस्वरूप वात दोष (Neuro-endocrine system) का प्रकोप हो कर देह की नानाविध क्रियाओं (Physiological activities) में विषमता (Abnormalities) उत्पन्न होती है।

_5. शोथ (Inflammation)_ -
चिकनगुन्या वायरस व रक्षा-द्रव्यों (Defence substances) के द्वन्द्व में कई प्रकार के आमविष (Toxins) व पित्त-वर्गीय द्रव्यों (Enzymes) की उत्पत्ति होकर द्वन्द्व के स्थान (मांस-अस्थि-सन्धि-स्नायु-कण्डराओं) में शोथ, जाड्य, व अन्य कई प्रकार की विकृतियाँ उत्पन्न होती हैं। ये विकृतियाँ कुछ दिनों से लेकर कई वर्षों तक रहती हैं व रोगी को कई प्रकार के कष्ट देती हैं।


*रूप (Presentation)*

1. ज्वर (Fever) - सहसा दारुण ज्वर (102-104° F) का होना।

2. अनेकविध चल-अचल, दारुण वेदनाएँ (Severe body pains) - जो प्रायः मांस-अस्थि-सन्धि-स्नायु-कण्डराओं में होती हैं, तथा शिरःशूल का होना।

3. रक्त-पिडिकाएँ (Maculo-papular rash on the skin)।

4. क्लम (Extreme exhaustion) व अतिदौर्बल्य (Weakness)।

5. अरुचि, हृल्लास, अतिसार आदि पचन सम्बन्धी कष्ट।

6. नेत्राभिष्यन्द (Conjunctivitis)।

7. अंग-सुप्तता (Flaccid paralysis & neuropathies), इत्यादि।


*साध्यासाध्यता (Course & Prognosis)*

वातोल्बण-विषम-ज्वर (Chikungunya) विभिन्न व्यक्तियों में विभिन्न रूप अपनाता है।

जबकि अधिकांश रोगी स्वतः पूर्ण रूप से स्वस्थ हो जाते हैं, फिर भी कुछेक रोगियों को इससे होने वाले कष्ट (विशेष रूप से अस्थि-सन्धि वेदना) जीर्ण अवस्था धारण कर रोगी को दीर्घावधि तक पीड़ित करते रहते हैं। यहाँ तक कि कभी-कभी तो ये कष्ट आजीवन रहते हैं। इसका मुख्य हेतु वायरस व वायरस-जन्य आमविष-द्रव्यों (Antigens) का धातुओं में लीन होकर दीर्घावधि तक बने रहना होता है।

रोगी का बल (Immunity) कम होने पर (विशेष रूप से बाल्यकाल व वृद्धावस्था में) कभी-कभी रोगी की मृत्यु भी हो सकती है। आंकड़ों की माने तो एक हज़ार रोगियों में एक रोगी की मृत्यु सम्भावित रहती है।


*उपचार (Management)*

वातोल्बण-विषम-ज्वर (Chikungunya) का उपचार निम्न चिकित्सा सिद्धांतों के आधार पर किया जा सकता है -

_1. विषम-ज्वरहर औषधियाँ (Antiviral drugs):_
कालमेघ, भल्लातक, दुग्धिका (Antivir tablet 2 tds); भूम्यामलकी, काकमाची (Livie tablet 1 tds); इत्यादि।

_2. शोथहर औषधियाँ (Anti-inflammatory drugs)_:
शल्लकी, एरण्डमूल (Loswel tablet 1-2 tds); गुग्गुलु (कैशोर, योगराज); रास्ना, दशमूल इत्यादि।

_3. वेदनाहर औषधियाँ (Analgesic drugs)_:
जातिफल, वत्सनाभ, गोदन्ती (Dolid tablet 1-2 tds / sos); गुग्गुलु (महायोगराज); महावातविध्वंसन रस, पिप्पलीमूल इत्यादि।

_4. रसायन औषधियाँ (Immuno-modulator drugs)_:
गुडूची, तुलसी, पिप्पली, अश्वगंधा, भल्लातक, गोमूत्र इत्यादि।

_5. बल्य व धातुवर्धक औषधियाँ (Antioxidant drugs)_:
शिलाजतु, आमलकी, स्वर्णमाक्षिक, मुक्ताशुक्ति, अभ्रक, यशद (Minovit tablet) इत्यादि ।

_6. मेध्य रसायन औषधियाँ (Neurotropic drugs)_:
a. मनोद्वेग व अरति (बेचैनी) होने पर ब्राह्मी,  तगर (Mentocalm tablet 1-2 tds), जटामांसी, शंखपुष्पी, मण्डूकपर्णी इत्यादि मनोशामक औषधियाँ ।
b. मनोअवसाद होने पर ज्योतिष्मती, अकरकरा, वचा, गण्डीर (Eleva tablet 1-2 tds) इत्यादि उत्तेजक औषधियाँ ।

_7. हृद्य व व्यान-बल्य औषधियाँ (Cardiotonic drugs)_:
हृद्दौर्बल्य (Depressed cardiac activity) व व्यान-क्षय (Hypotension) होने पर अर्जुन, अकीक, ज़हरमोहरा, गण्डीर, वनपलाण्डु (Carditonz tablet); कर्पूर, कस्तूरी, स्वर्ण, नागरवेल, मकरध्वज इत्यादि।

_8. पथ्यापथ्य (Do's and don'ts)_:
रोगी को आवश्यक पोषण व जल देते रहना आवश्यक है। इसके साथ-साथ पूर्ण विश्राम (मानसिक व शारीरिक) भी ज़रूरी है। रोगी का मनोबल बढ़ाने हेतु आश्वासन देते रहना चाहिए ।


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**चिकनगुनिया के बुखार के ठीक होने के बाद भी जोड़ों का दर्द नही जा रहा तो यह है उपाय---

इस प्रयोग के लिये आपको निम्नलिखित चीजों की जरूरत पड़ेगी :-

1 :- लहसुन की 2 कलियॉ

2 :- हरसिंगार के 5 पत्ते

3 :- तुलसी के 5 पत्ते

4 :- जंगली अजवायन या अजमोद 1 ग्राम

.

ऊपर लिखे सभी सामान लेकर एक छोटी ओखली में कूट लीजिये जिससे इन सभी की चटनी जैसी बन जायेगी । बस यह आपकी दवा तैयार है । इस दवा को दिन में दो समय सेवन करना है, सुबह खाली पेट और रात को सोने से पहले । इसके साथ गुनगुना पानी अथवा दूध का सेवन किया जा सकता है ।
ध्यान रखें कि हर बार ताजी चटनी बनाकर ही सेवन करने से उत्तम लाभ होगा । दर्द वाले जोड़ों पर इसी चटनी से मालिश भी की जा सकती है ।

**चिकनगुनिया के दर्द से राहत दिलाने वाला तेल

सामग्री :-
50 ग्राम सरसों का तेल
50 ग्राम सफेद तिल का तेल
15 लौंग
1 टुकडा दालचीनी
2 टेबल स्पून अजवायन
1 टेबल स्पून मेथी दाना
15 लहसुन की कली बारिक कटी हुई
1 छोटा टुकडा अदरक पिसा हुआ
1 टी स्पून हल्दी
2 बडे पीस कपूर
1 टेबल स्पून एलोवेरा जैल

विधि :-
कढाई मे दोनो तेल डाल कर तेज गैस पर गर्म करो फिर गैस को धीमी करके हल्दी और कपूर को छोड कर  सारी चीजो को डाल दो , जब तक सारी चीजे जल न जाए और उन का सत तेल मे ना आ जाऐ , करीब 20-25 मिन्ट लगेंगे इन्हें जलने मे जब ये भून जाएगें तब तेल का रंग गहरा हो जाएगा फिर गैस बंद कर दे और उसमे हल्दी ,कपूर मिला दे जब तक कपूर घुल ना जाए तब तक तेल को ठंडा होने दे फिर तेल को छान कर एक शीशी मे भर कर रखो , कैसा भी बुरा  दर्द हो  इससे मालिश से गायब हो जाएगा
कृप्या कोई भी पेन किलर ना खाऐ तबियत खराब हो जाएगी चिकन गुनिया मे  ये तेल बहुत असरदार है बनाकर मालिश करके देखे जिन्हे तकलीफ हो
चिकनगुनिया मे पैरो मे और जोइंट पेन ज्यादा होता है यह तेल 100% फायदेमंद है लगाते ही आराम आना शुरू हो जाएगा पहले दिन से . दिन मे 3 बार मालिश करें |


रविवार, 11 सितंबर 2016

कैशोर गुग्गुलु


कैशोर गुग्गुलु, एक आयुर्वेदिक दवाई है जिसे वातरक्त जिसे आम भाषा में गाउट gout कहा जाता है, चमड़ी के रोग skin diseases तथा रक्त विकार vitiation of blood, के उपचार में प्रयोग किया जाता है। इस औषधि को भैषज्य रत्नावली के वातरक्ताधिकार से लिया गया है। कैशोर गुग्गुलु के सेवन से शरीर में जोड़ों और मसल्स के दर्द और सूजन से राहत मिलती है। यह मुख्य रूप से ऐसे जोड़ों के दर्द जिनमें वात तथा पित्त बढ़ा (द्विदोषज) हुआ हो, जोड़ सूज कर लाल हो गए हो तथा उनमें गर्माहट हो, में दी जाती है।

यह दवाई शरीर में यूरिक एसिड को कम करती है और पाचन को भी बेहतर करती है। यह खून को साफ़ करती है और कब्ज़ को दूर करती है। यह शरीर में चयापचय जिसे मेटाबोलिज्म कहा जाता है उसे भी ठीक करती है। इसमें एंटी-ऑक्सीडेंट, सूजन दूर करने के तथा एंटी-एजिंग गुण हैं।

Kaishore Guggulu / Kishore guggul is Ayurvedic medicine used in treatment of joint and muscles disorders, gout, skin eruptions, infections, lumps and growths. It is prepared from well-known Ayurvedic herbs and used as supplement for gout or Vata Rakta and its complication.

Here is given more about this medicine, such as indication/therapeutic uses, Key Ingredients and dosage in Hindi language.
कैशोर गुग्गुलु के घटक Ingredients of Kaishore Guggulu

Guggulu Shuddha (O.R) 768 g
Haritaki (P.) 256 g
Bibhitaka (P.) 256 g
Amalaki (P.) 256 g
Chinnaruha (Guduci) (St.) 1.536 kg
Water for decoction 12.288 l reduced to 6.144 l
Haritaki (P.) 8 g
Bibhitaka (P.) 8 g
Amalaki (P.) 8 g
Sunthi (Rz.) 24 g
Marica (Fr.) 24 g
Pippali (Fr.) 24 g
Krimiripu (Vidanga) (Fr.) 24 g
Trivrit (Rt.) 12 g
Danti (Rt.) 12 g
Amrita (Guduci) (St.) 48 g
Ghrita (Goghrita) 384 g

मुख्य घटक:

1. गुग्गुलु एक पेड़ से प्राप्त किया जाता है और अनेक आयुर्वेदिक दवाओं के निर्माण में प्रयोग किया जाता है। यह वात, पित्त और कफ का संतुलन करता है। यह तासीर में गर्म होता है। गुग्गुलु शरीर की सभी प्रणालियों पर काम करता है। यह टॉनिक, एंटीसेप्टिक, दर्द से राहत, ऐंठन से राहत, और कफ कम करने वाला होता है। यह विशेष रूप से दर्द कम करने, शरीर से सूजन को हटाने, शरीर से टोक्सिन निकालने और ग्रंथियों की असामान्य बढ़वार को रोकने के लिए इस्तेमाल होता है।

2. आवंला, लिवर और इम्यून सिस्टम के सही काम करने में सहायता करता है। यह बड़े हुए पित्त को शांत करता है। बहेड़ा विशेष रूप से, कफ के लिए अच्छा है और श्वसन प्रणाली सहित दूसरे अंगों में जमा कफ को कम करता है। हरीतकी, विषाक्त पदार्थों को शरीर से निकलती है व अधिक वात को काम करती है।

3. गिलोय शरीर से विजातीय पदार्थों को दूर करती है। इसमें जिगर (लीवर) में सुधार, त्रिदोष हटाने , प्रतिरक्षा में सुधार करने की क्षमता है। गिलोय एक दिव्य अमृत है जिसकी वजह से इसे अमृता कहा जाता है।

गिलोय, आमला, रसायन हैं जो की शरीर की रोगप्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाते है।

4. त्रिकटु (सोंठ + काली मिर्च + पिप्पली) शरीर से आमदोष को दूर करता है। विडंग कृमिनाशक है।
कैशोर गुग्गुलु के लाभ/फ़ायदे Benefits of Kaishore guggulu

यह शरीर में वात-पित्त का संतुलन करती है। शरीर में वात की अधिकता को जोड़ों में होने वाली समस्याओं का मुख्य कारण माना जाता है।
यह बढे यूरिक एसिड को कम करती है।
इसके सेवन से जोड़ों और मांसपेशियों के दर्द से राहत मिलती है।
यह सूजन, दर्द, और शरीर में अधिक वात को दूर करने वाली औषधि है।
यह आर्थराइटिस, गाउट, रूमेटीज्म, जोड़ों के दर्द, मांसपेशियों के ऐठन-दर्द-स्प्रेन, तथा रक्त विकारों में बहुत फायदेमंद है।
यह दवाई पाचन को ठीक करने के साथ, गैस और कब्ज़ को दूर करती है।
यह रक्त को साफ़ करती है तथा त्वचा के विकारों जैसे की मुंहासे, घाव, एक्जिमा आदि में लाभप्रद है।
यह फंगल इन्फेक्शन में राहत देती है।
यह मासिक धर्म में होने वाले दर्द-ऐंठन में भी लाभप्रद है।
इसमें उष्णवीर्य वनस्पतियों के होने के कारण यह दवा खांसी, जुखाम, में लाभकारी है।
कैशोर गुग्गुलु के चिकित्सीय उपयोग Uses of Kaishore Guggulu

मन्दाग्नि Mandagni (Impaired digestive fire)
कब्ज़ Vibandha (Constipation)
वातरक्त Vatashonita (Gout)
मधुमेह में घाव Prameha Pidaka (Diabetic carbuncle)
छाले Vrana (Ulcer)
कफ Kasa (Cough)
चमड़ी के रोग Kushtha (Diseases of skin)
गुल्म Gulma (Abdominal lump)
सूजन (Oedema)
पांडु Pandu (Anaemia)
मेह रोग Meha (Excessive flow of urine)
बुढ़ापा Jaradosha (Senility)
सेवन विधि और मात्रा Dosage of Kaishore Guggulu

2-4 गोली, दिन में दो बार, सुबह और शाम लें।
इसे रोग अनुसार अनुपान / मंजिष्ठादी काढ़े / दूध या गर्म पानी के साथ लें।
इसे भोजन करने के बाद लें।
इसका सेवन कई महीनो तक किया जा सकता है।

सोमवार, 5 सितंबर 2016

Ayurved Books


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रविवार, 4 सितंबर 2016

आंवला

अच्‍छी सेहत का मालिक बनाए आंवला -----

आंवला चूर्ण और हल्दी चूर्ण समान मात्र में लेकर भोजन के पश्चात ग्रहण करने से मधुमेह में लाभ प्राप्त होता है।

हिचकी तथा उल्टी में आंवला रस, मिश्री के साथ दिन में दो-तीन बार सेवन करें। पीलिया से परेशान हैं तो आंवले को शहद के साथ चटनी बनाकर सुबह-शाम सेवन करें। आंवला, रीठा व शिकाकाई के चूर्ण से बाल धोने पर बाल स्वस्थ व चमकदार होते हैं।
आंवले का मुरब्बा शक्तिदायक व शीतलता प्रदान करने वाला होता है। स्मरण शक्ति कमजोर पड़ गई हो तो सुबह उठकर गाय के दूध के साथ दो आंवले का मुरब्बा खाना चाहिए।

वमन (उल्टी) : -* हिचकी तथा उल्टी में आंवले का 10-20 मिलीलीटर रस, 5-10 ग्राम मिश्री मिलाकर देने से आराम होता है। इसे दिन में 2-3 बार लेना चाहिए। केवल इसका चूर्ण 10-50 ग्राम की मात्रा में पानी के साथ भी दिया जा सकता है।

* त्रिदोष (वात, पित्त, कफ) से पैदा होने वाली उल्टी में आंवला तथा अंगूर को पीसकर 40 ग्राम खांड, 40 ग्राम शहद और 150 ग्राम जल मिलाकर कपड़े से छानकर पीना चाहिए।
* आंवले के 20 ग्राम रस में एक चम्मच मधु और 10 ग्राम सफेद चंदन का चूर्ण मिलाकर पिलाने से वमन (उल्टी) बंद होती है।
* आंवले के रस में पिप्पली का बारीक चूर्ण और थोड़ा सा शहद मिलाकर चाटने से उल्टी आने के रोग में लाभ होता है।
* आंवला और चंदन का चूर्ण बराबर मात्रा में लेकर 1-1 चम्मच चूर्ण दिन में 3 बार शक्कर और शहद के साथ चाटने से गर्मी की वजह से होने वाली उल्टी बंद हो जाती है।
* आंवले का फल खाने या उसके पेड़ की छाल और पत्तों के काढ़े को 40 ग्राम सुबह और शाम पीने से गर्मी की उल्टी और दस्त बंद हो जाते हैं।
* आंवले के रस में शहद और 10 ग्राम सफेद चंदन का बुरादा मिलाकर चाटने से उल्टी आना बंद हो जाती है।

संग्रहणी : -मेथी दाना के साथ इसके पत्तों का काढ़ा बनाकर 10 से 20 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार पिलाने से संग्रहणी मिट जाती है।
"मूत्रकृच्छ (पेशाब में कष्ट या जलन होने पर) : -* आंवले की ताजी छाल के 10-20 ग्राम रस में दो ग्राम हल्दी और दस ग्राम शहद मिलाकर सुबह-शाम पिलाने से मूत्रकृच्छ मिटता है।
* आंवले के 20 ग्राम रस में इलायची का चूर्ण डालकर दिन में 2-3 बार पीने से मूत्रकृच्छ मिटता है।

विरेचन (दस्त कराना) : -रक्त पित्त रोग में, विशेषकर जिन रोगियों को विरेचन कराना हो, उनके लिए आंवले के 20-40 मिलीलीटर रस में पर्याप्त मात्रा में शहद और चीनी को मिलाकर सेवन कराना चाहिए।

अर्श (बवासीर) : -* आंवलों को अच्छी तरह से पीसकर एक मिट्टी के बरतन में लेप कर देना चाहिए। फिर उस बरर्तन में छाछ भरकर उस छाछ को रोगी को पिलाने से बवासीर में लाभ होता है।
* बवासीर के मस्सों से अधिक खून के बहने में 3 से 8 ग्राम आंवले के चूर्ण का सेवन दही की मलाई के साथ दिन में 2-3 बार करना चाहिए।
* सूखे आंवलों का चूर्ण 20 ग्राम लेकर 250 ग्राम पानी में मिलाकर मिट्टी के बर्तन में रात भर भिगोकर रखें। दूसरे दिन सुबह उसे हाथों से मलकर छान लें तथा छने हुए पानी में 5 ग्राम चिरचिटा की जड़ का चूर्ण और 50 ग्राम मिश्री मिलाकर पीयें। इसको पीने से बवासीर कुछ दिनों में ही ठीक हो जाती है और मस्से सूखकर गिर जाते हैं।
* सूखे आंवले को बारीक पीसकर प्रतिदिन सुबह-शाम 1 चम्मच दूध या छाछ में मिलाकर पीने से खूनी बवासीर ठीक होती है।
* आंवले का बारीक चूर्ण 1 चम्मच, 1 कप मट्ठे के साथ 3 बार लें।
* आंवले का चूर्ण एक चम्मच दही या मलाई के साथ दिन में तीन बार खायें।

शुक्रमेह : -धूप में सुखाए हुए गुठली रहित आंवले के 10 ग्राम चूर्ण में दुगनी मात्रा में मिश्री मिला लें। इसे 250 ग्राम तक ताजे जल के साथ 15 दिन तक लगातार सेवन करने से स्वप्नदोष (नाइटफॉल), शुक्रमेह आदि रोगों में निश्चित रूप से लाभ होता है।

खूनी अतिसार (रक्तातिसार) : -यदि दस्त के साथ अधिक खून निकलता हो तो आंवले के 10-20 ग्राम रस में 10 ग्राम शहद और 5 ग्राम घी मिलाकर रोगी को पिलायें और ऊपर से बकरी का दूध 100 ग्राम तक दिन में 3 बार पिलाएं।

रक्तगुल्म (खून की गांठे) : -आंवले के रस में कालीमिर्च डालकर पीने से रक्तगुल्म खत्म हो जाता है।

प्रमेह (वीर्य विकार) : -* आंवला, हरड़, बहेड़ा, नागर-मोथा, दारू-हल्दी, देवदारू इन सबको समान मात्रा में लेकर इनका काढ़ा बनाकर 10-20 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम प्रमेह के रोगी को पिला दें।
* आंवला, गिलोय, नीम की छाल, परवल की पत्ती को बराबर-बराबर 50 ग्राम की मात्रा में लेकर आधा किलो पानी में रातभर भिगो दें। इसे सुबह उबालें, उबलते-उबलते जब यह चौथाई मात्रा में शेष बचे तो इसमें 2 चम्मच शहद मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से पित्तज प्रमेह नष्ट होती है।

पित्तदोष : -आंवले का रस, शहद, गाय का घी इन सभी को बराबर मात्रा में लेकर आपस में घोटकर लेने से प