गुरुवार, 12 नवंबर 2015

वात रोग--चिकित्सा

वात
        आयुर्वेदिक ग्रन्थों के अनुसार वात 80 प्रकार का होता है एवं इसी से सामंजस्य रखता हुआ एक और रोग है जिसे बाय या वायु कहते हैं। यह 84 प्रकार का होता है। यहाँ प्रश्न यह उठता है कि जब वात एवं वायु के इतने प्रकार हैं, तो, यह कैसे पता लगाया जाय कि यह वात रोग है या बाय एवं यह किस प्रकार का है ? यह कठिन समस्या है और यही कारण है कि इस रोग की उपयुक्त चिकित्सा नहीं हो पाती है, जिससे इस रोग से पीड़ित 50 प्रतिशत व्यक्ति सदैव परेशान रहते हैं। उन्हें कुछ दिन के लिए इस रोग में राहत तो जरूर मिलती है, परन्तु पूर्णतया सही नहीं हो पाता है। इस रोग की चिकित्सा एलोपैथी के माध्यम से पूर्णतया सम्भव नहीं है, जबकि आयुर्वेद के माध्यम से इसे आज कल 90 प्रतिशत तक जरूर सही किया जा सकता है, शेष 10 प्रतिशत माँ भगवती जगत जननी की कृपा से ही सम्भव है।
वात रोग लक्षण एवं परेशानी 
      इस रोग के कारण शरीर के सभी छोटे-बडे़ जोडो़ं व मांसपेशियों में दर्द व सूजन हो जाती है। गठिया में शरीर के एकाध जोड़ में प्रचण्ड पीड़ा के साथ लालिमायुक्त सूजन एवं बुखार तक आ जाता है। यह रोग शराब व मांस प्रेमियों को सामान्य व्यक्तियों की अपेक्षा जल्दी पकड़ता है। यह धीरे-धीरे शरीर के सभी जोड़ों तक पहुँचता है। संधिवात उम्र बढ़ने के साथ मुख्यतः घुटनों एवं पैरों के मुख्य जोड़ों को क्रमशः अपनी गिरफ्त में लेता हैं।
      वात रोग की शुरूआत धीरे-धीरे होती है। शुरू में सुबह उठने पर हाथ पैरों के जोडा़ें में कड़ापन महसूस होता है और अंगुलियाँ चलाने में परेशानी होती है। फिर इनमें सूजन व दर्द होने लगता है और अंग-अंग दर्द से ऐंठने लगता है जिससे शरीर में थकावट व कमजोरी महसूस होती है। साथ ही रोगी चिड़चिड़ा हो जाता है। इस रोग की वजह सेे शरीर की प्रतिरोधक क्षमता कम पड़ जाती है। इसी के साथ छाती में इन्फेक्शन, खांसी, बुखार तथा अन्य समस्यायें उत्पन्न हो जाती है। साथ ही चलना फिरना रुक जाता है।
     इन सबसे खतरनाक कुलंग वात होता है। यह रोग कुल्हे, जंघा प्रदेश एवं समस्त कमर को पकड़ता है एवं रीढ़ की हड्डी को प्रभावित करता है। इस रोग में तीव्र चिलकन (फाटन) जैसा तीव्र दर्द होता है और रोगी बेचैन हो जाता है, यहाँ तक कि इसमें मृत्यु तुल्य कष्ट होता है। यह रोग की सबसे खतरनाक स्टेज होती हैै। इस का रोगी दिन-रात दर्द से तड़पता रहता है और कुछ समय पश्चात् चलने-फिरने के काबिल भी नहीं रह जाता है। वह पूर्णतया बिस्तर पकड़ लेता है और चिड़चिड़ा हो जाता है। 
रोग से छुटकारा 
       इस रोग से छुटकारा पाने हेतु कुछ सरलतम आयुर्वेदिक नुस्खे एवं तेल का विवरण नीचे दे रहे हैं, जो पूर्ण परीक्षित योग हैं। ये नुस्खे 90 प्रतिशत रोगियों को फायदा करते हैं। शेष 10 प्रतिशत अपने पिछले कर्मों की वजह से दुख पाते हैं, जिसमें दवा कार्य नहीं करती। उसमें मात्र माता आदिशक्ति जगत् जननी भगवती दुर्गा जी एवं पूज्य गुरुदेव जी की कृपा ही रोग को दूर कर पाती है। यद्यपि ये नुस्खे परीक्षित हैं, परन्तु अपने चिकित्सक की देख रेख में लेंगे तो ज्यादा अच्छा होगा। दवा खाने की मात्रा रोग के अनुसार कम या ज्यादा दी जा सकती है। 
   एक बात ध्यान रखें कि जो जड़ी-बूटी औषधि रूप में आप उपयोग करें, वह पूर्णत: सही एवं ताजी हो। उसमें कीड़े न लगे हों, ज्यादा पुरानी न हो और साफ सुथरी हो, उन्ही दवाइयों के मिश्रण का उपयोग करें, लाभ अवश्य होगा। 
(1) वातान्तक बटीः-
                                सोंठ,सुहागा,सोंचर गांधी,सहिजन के संग गोली बांधी।
                                        80वात 84बाय कहै धनवन्तरि तड़ से जाये।।
      सोंठ 50 ग्राम, सुहागा 50 ग्राम, सोंचर (काला नमक) 50 ग्राम, गांधी(हींग) 50 ग्राम, सहिजन (मुनगा) की छाल का रस आवश्यकतानुसार, सबसे पहले कच्चे सुहागे को पीसकर आग में लोहे के तवे पर डालकर उसे भून लें। वह लाई की तरह फूल जायेगा, फूला हुआ सुहागा ही काम में लें। सोंठ, सुहागा एवं काला नमक को कूट-पीसकर एक थाली में डाल लें। फिर दूसरे बर्तन में सहिजन की छाल का रस लें हींग घोल लें। और उसमें जब हींग घुल जाये तो सहिजन की छाल का रस कुछ दूधिया हो जायेगा। उसमें कुटा-पिसा, सोंठ, काला नमक व सुहागा का पाउडर मिला लें। फिर उसकी चने के आकार की गोली बना लें और छाया में सुखाकर बन्द डिब्बे में रख लें। फिर सुबह-दोपहर-शाम दो-दो गोली नाश्ते या खाने के बाद सादा पानी से लें। आपको आराम 10 दिन में ही मिलने लगेगा। कम से कम 30 दिन यह गोलियां लगातार अवश्य खायें तभी पूर्ण लाभ हो पायेगा। यह नुस्खा कई बार का परीक्षित है। इस दवा के द्वारा बवासीर के रोगी को भी अवश्य लाभ मिलता है। 
(2) वात नासक चूर्णः-
चन्दसूर 50 ग्राम, मेथी 50 ग्राम, करैल 50 ग्राम, अचमोद  50 ग्राम, इन चारों दवाओं को कूट-पीसकर ढक्कन वाले डिब्बे में रखें। सुबह नाश्ते के बाद एक चम्मच चूर्ण गुनगुने पानी के साथ लें एवं रात्रि में भोजन के बाद गुनगुने दूध के साथ एक चम्मच लें। यह दवा भी कम से कम 60 दिन लें। निश्चय ही आराम मिलता है। 
(3) कुलंगवात (साइटिका)-
      मीठा सुरंजान 50 ग्राम, बड़़ी हरड़ का छिलका 50 ग्राम, पठानी लोंध 50 ग्राम, मुसब्बर 50 ग्राम। इन चारों को कूट-पीसकर डिब्बे में रख लें। इस दवा का एक चम्मच पाउडर पानी के साथ लें। यह दवा कम से कम 60 दिन तक लें या जब तक पूर्ण लाभ न मिल जाये तब तक लें। इसके खाने से दस्त लग सकते हैं। चिन्ता न करें, न ही दवा बन्द करें, दस्त अपने आप बन्द हो जायेगा एवं रोग भी निर्मूल हो जायेगा, दस्त लगने पर दवा की मात्रा कुछ घटा लें। 
परहेजः- चावल, बैगन, कद्दू, बेसन या चने की बनी कोई वस्तु न खायें तथा तली चीजें या बादी चीजें भी न लें।
(4) वातनाशक काढ़ाः- 
      हरसिंगार के हरे पत्ते 20 नग को अधकुचला कर 300 ग्राम पानी में डालकर धीमी आँच में पकायें। जब पानी 50 ग्राम रह जाये, तो आग से उतार लें और कपड़े से छानकर दो खुराक बनायें एक खुराक सुबह नास्ता के पहले गरम-गरम पी लें एवं दूसरी खुराक शाम को आग में हल्का गरम कर पी लें। प्रतिदिन नया काढ़ा ऊपर लिखी विधि से बनायें और सुबह शाम पियें। यह क्रिया 30 दिन लगातार करें। वात रोग में निश्चय ही आराम होगा।
(5) गठिया(संधिवात)ः-
      आँवला चूर्ण 20 ग्राम, हल्दी चूर्ण 20 ग्राम, असंगध चूर्ण 10 ग्राम, गुड़ 20 ग्राम इन चारों औषधियों को 500 ग्राम पानी में डालकर धीमी आँच में पकाये, जब पानी 100 ग्राम रह जाये तो उसे आग से उतार कर कपड़े या छन्नी से छान लें एवं इस काढ़े की तीन खुराक बनायें। सुबह, दोपहर एवं रात्रि में खाने के बाद पियें। इस प्रकार प्रतिदिन सुबह यह दवा बनायें, लगातार 30 दिन पीने पर गठिया में निश्चित रूप से आराम होता है।
परहेज-ज्यादा तली हुईं, खट्टी, गरिष्ठ चीजें व चावल आदि दवा सेवन के समय न लंे।
(6) गठिया की दवाः-
      सुरंजान 30ग्राम, चोवचीनी 30ग्राम, सोठ 30ग्राम, पीपर मूल 30ग्राम, हल्दी 30ग्राम, आँवला 50ग्राम, इन सब को कूट-पीसकर चूर्ण बनायें और उसमें 100ग्राम गुड़ मिलाकर रख लें। प्रतिदिन सुबह एवं शाम को 10ग्राम दवा में 10ग्राम शहद मिलाकर खायें। सुबह हल्का नाश्ता करने एवं राात्रि में खाना खाने के बाद ही दवा लें। यह दवा लगातार 30दिन लेने से गठिया वात जरूर सही होगा। 
परहेज-खट्टी चीजें, गरिष्ठ चीजें, चावल आदि न लें।
(7) वातनाशक तेलः-
      100ग्राम तारपीन का तेल, 30ग्राम कपूर, 10ग्राम पिपरमिण्ट, इन सबको मिलाकर धूप में एक दिन रखें। जब यह सब तारपीन में मिल जाये, तो दवा तैयार हो गई। जिन गाठों में दर्द हो, वहां पर यह दवा लगाकर धीरे-धीरे 15मिनट तक मालिश करें और इसके बाद कपड़ा गरम करके उस स्थान की सिकाई कर दें। एक सप्ताह में ही दर्द में आराम मिलने लगेगा। 
(8) वात हेतु तेलः-
      500ग्राम सरसांे का तेल (कडुआ तेल), 10ग्राम मदार का दूध, 50ग्राम करील की जड़ का बकला, 1 काला धतूरा का एक फल, 50ग्राम अमरबेल, लाजवन्ती पंचमूल 50ग्राम, 5ग्राम तपकिया हरताल, कुचला 2नग, इन सब को अधकुचला करके तेल में पकायें। जब ये सब दवायें जल जायें तो तेल उतार लें। इस तेल को गांठो में मलें एवं धूप सेंक करें या तेल लगाकर आग से सेकंे। दो या तीन दिनों में यह अपना लाभ दिखायेगा, यह तेल कुलंग बात के लिये भी पूर्णतया लाभदायक है।
नोट-यह तेल जहरीला बनता है। इसलिये इसे आँखों से दूर रखें। आँखों में लगने से पानी निकलने लगता है। इसे गांठों में लगाकर हाथ साबुन से धो लें।
(9) वायगोला का दर्दः-
      सफेद अकौवा (मदार), इसे स्वेतार्क भी कहते है। इसका एक फूल को गुड़ में लपेटकर रोगी को खिलाकर पानी पिला दें, आधा घंटे में ही रोगी का दर्द सही हो जायेगा।

बुधवार, 11 नवंबर 2015

Bronchitis Treatment

sitopalaadi 50 g + prawak pishti 10 g + rasa sindorr 2 g + tankana bhasama 5 g ----- give 1/2 spoon twice a day mixed with honey for one month.....with agastya haritaki avalehe 1/2 spoon twice a day......all before meals..

Piles Treatment

arshkuthar ras..2 tab bd.......abyarishtha 4tsf bd......panchsakar churna 1 tsf od......if bleeding ...pushyanuk churna 1 tsf bd....!

मंगलवार, 10 नवंबर 2015

शीघ्रपतन

मूसली के लगभग 10 ग्राम चूर्ण को 250 ग्राम गाय के दूध में मिलाकर अच्छी तरह से उबालकर किसी मिट्टी के बर्तन में रख
दें। इस दूध में रोजाना सुबह और शाम पिसी हुई मिश्री मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन, शीघ्रपतन और संभोग क्रिया की इच्छा न करना, वीर्य की कमी होना आदि रोगों में बहुत लाभ मिलता है।

कौंच को कपिकच्छू और कैवांच आदि के नामों से भी जाना जाता है। संभोग करने की शक्ति को बढ़ाने के लिए इसके बीज बहुत लाभकारी रहते हैं। इसके बीजों का सेवन करने से वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है, संभोग करने की इच्छा तेज होती है और शीघ्रपतन रोग में लाभ होता है। इसके बीजों का उपयोग करने के लिए बीजों को दूध या पानी में उबालकर उनके ऊपर का छिलका हटा देना चाहिए। इसके बाद बीजों को सुखाकर बारीक चूर्ण बना लेना चाहिए। इस चूर्ण को लगभग 5-5 ग्राम की मात्रा में सुबह और शाम मिश्री के साथ दूध में मिलाकर सेवन करने से लिंग का ढीलापन और शीघ्रपतन का रोग दूर होता है।
शतावरी, गोखरू, तालमखाना, कौंच के बीज, अतिबला और नागबला को एकसाथ मिलाकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में बराबर मात्रा में मिश्री मिलाकर 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह-शाम दूध के साथ रोजाना सेवन करने से स्तंभन शक्ति तेज होती है और शीघ्रपतन के रोग में लाभ होता है। रात को संभोग क्रिया करने से 1 घंटा पहले इस चूर्ण को गुनगुने दूध के साथ सेवन करने से संभोग क्रिया सफलतापूर्वक संपन्न होती है। वीर्य का पतला होना, यौन-दुर्बलता और विवाह के बाद शीघ्रपतन होना जैसे रोगों में इसका सेवन बहुत लाभकारी रहता है।
मोचरस, कौंच के बीज, शतावरी, तालमखाना को 100-100 ग्राम की मात्रा में लेकर लगभग 400 ग्राम मिश्री के साथ मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण को 2-2 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से बुढ़ापे में भी संभोग क्रिया का पूरा आनंद लिया जा सकता है। इस योग को लगभग 2-3 महीने तक सेवन करना लाभकारी रहता है।
लगभग 6 चम्मच अदरक का रस, 8 चम्मच सफेद प्याज का रस, 2 चम्मच देशी घी और 4 चम्मच शहद को एक साथ मिलाकर किसी साफ कांच के बर्तन में रख लें। इस योग को रोजाना 4 चम्मच की मात्रा में सुबह खाली पेट सेवन करना चाहिए। इसको लगातार 2 महीने तक सेवन करने से स्नायविक दुर्बलता, शिथिलता, लिंग का ढीलापन, कमजोरी आदि दूर हो जाते हैं।
बबूल की कच्ची पत्तियां, कच्ची फलियां और गोंद को बराबर मात्रा में मिलाकर बारीक चूर्ण बना लें और इनमें इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर किसी डिब्बे आदि में रख लें। इस चूर्ण को नियमित रूप से 2 महीने तक 2-2 चम्मच की मात्रा में दूध के साथ सेवन करने से वीर्य की वृद्धि होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है। इसके अलावा यह योग शीघ्रपतन और स्वप्नदोष जैसै रोगों में बहुत लाभकारी रहता है।
सफेद मूसली के चूर्ण और मुलहठी के चूर्ण को बराबर की मात्रा में मिला लें। इस चूर्ण को 1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम शुद्ध घी के साथ मिलाकर चाट लें और ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस योग को नियमित सेवन करने से धातु वृद्धि होती है, नपुंसकता दूर होती है और शरीर पुष्ट और शक्तिशाली बनता है।
10-10 ग्राम धाय के फूल, नागबला, शतावरी, तुलसी के बीज, आंवला, तालमखाना और बोलबीज, 5-5 ग्राम अश्वगंध, जायफल और रूदन्तीफल, 20-20 ग्राम सफेद मूसली, कौंच के बीज और त्रिफला तथा 15-15 ग्राम त्रिकटु, गोखरू को एक साथ जौकुट करके चूर्ण बना लें। इसके बाद इस मिश्रण के चूर्ण को लगभग 16 गुना पानी में मिलाकर उबालने के लिए रख दें। उबलने पर जब पानी जल जाए तो इसमें 10 ग्राम भांगरे का रस मिलाकर दुबारा से उबाल लें। जब यह पानी गाढ़ा सा हो जाए तो इसे उतारकर ठंडा करके कपड़े से अच्छी तरह मसलकर छान लें और सुखाकर तथा पीसकर चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में 20 ग्राम शोधी हुई शिलाजीत, 1 ग्राम बसन्तकुसूमाकर रस और 5 ग्राम स्वर्ण बंग को मिला लें। इस औषधि को आधा ग्राम की मात्रा में शहद के साथ मिलाकर सुबह-शाम चाटकर ऊपर से गर्म दूध पी लें। इस औषधि को सेवन करने से पुरुषों के शरीर में बल और वीर्य की बढ़ोत्तरी होती है और वह संभोगक्रिया को लंबे समय तक चला सकता है। इस औषधि के सेवन काल के दौरान खटाई, तेज मिर्च-मसाले वाले और तले हुए भोजन का सेवन करना चाहिए।
मुलहठी के बारीक चूर्ण को 10 ग्राम की मात्रा में घी और शहद से साथ चाटकर ऊपर से दूध पीने से संभोग शक्ति बहुत तेज होती है।
सर्दी के मौसम में उड़द की दाल के लड्ड़ू बनाकर रोजाना सुबह के समय खाकर ऊपर से दूध पीने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है।
लगभग 20 ग्राम उड़द की दाल के छिलके उतारकर रात के समय पानी में भिगों दें। सुबह इस दाल को बारीक पीसकर पिट्ठी बना लें और कड़ाही में डालकर घी के साथ गुलाबी होने तक सेक लें। इसके बाद एक दूसरे बर्तन में 250 ग्राम दूध डालकर उबाल लें। दूध के उबलने पर इसमें सिंकी हुई उड़द की दाल डालकर पका लें। पकने पर इसमें शक्कर डालकर नीचे उतार लें। इस खीर को ठंडा करके रोजाना सुबह नाश्ते के समय 2 चम्मच शहद के साथ सेवन करने से पुरुष की संभोग शक्ति बहुत ज्यादा तेज हो जाती है। ( उड़द की दाल और कौंच के बीजों को प्रयोग में लाने से पहले उन्हें गर्म पानी या दूध में उबालकर उनके छिलके उतार लेने चाहिए।)
लगभग 250 ग्राम शतावरी घृत में इतनी ही मात्रा में शक्कर, 5 ग्राम छोटी पीपल और 5 चम्मच शहद मिला लें। इस मिश्रण को 1-1 चम्मच की मात्रा में सुबह और शाम दूध के साथ सेवन करने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
कौंच के बीज, उड़द, गेंहू, चावल, शक्कर, तालमखाना और विदारीकंद को बराबर मात्रा में लेकर बारीक चूर्ण बना लें। इस चूर्ण में दूध मिलाकर आटे की तरह गूंथ लें। इसके बाद इसकी छोटी-छोटी पूड़ियां बनाकर गाय के घी में तल लें। इन पूड़ियों को खाकर ऊपर से दूध पीने से वीर्य की बढ़ोतरी होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है। दिए गए द्रव्यों के देशी घी में लड़डू बनाकर सेवन करना भी बहुत लाभकारी रहता है।
दही की मलाई में उतनी ही मात्रा में वंशलोचन, कालीमिर्च, शक्कर, शहद और काली मिर्च मिला लें। इसके बाद एक मिट्टी के घड़े के मुंह पर साफ कपड़ा बांध देना चाहिए तथा उस कपड़े से दिए गए मिश्रण को छान लें। इससे मिश्रण छनकर उस घड़े के अंदर जमा हो जाएगा। इस छने हुए मिश्रण को रोजाना 2-2 चम्मच की मात्रा में घी के साथ सेवन करके ऊपर से दूध पीने से पुरुष के शरीर में ताकत आती है और संभोग शक्ति तेज होती है।
30 पीस छोटी पीपल को लगभग 40 ग्राम तिल के तेल या गाय के घी में भूनकर बिल्कुल पाउडर बना लें। फिर उसमें शहद और शक्कर मिलाकर दूध निकालने के बर्तन में डालकर उसी के अंदर गाय का दूध दूह लें। इस दूध को अपनी रुचि के अनुसार सेवन करें। इसको 1-1 चम्मच की मात्रा में गाय के ताजा निकले हुए दूध के साथ सेवन करने से बल और वीर्य की वृद्धि होती है।
100-100 ग्राम शतावरी, कौंच के बीज, उड़द, खजूर, मुनक्का दाख और सिंघाड़ा को मोटा-मोटा पीसकर चूर्ण बना लें। इसके बाद 1 लीटर दूध में इतनी ही मात्रा में पानी मिलाकर इसमें चूर्ण को भी मिला लें और हल्की आग पर पकाने के लिए रख दें। पकने पर जब सिर्फ दूध बच जाए तो नीचे उतारकर छान लें। फिर इसमें लगभग 300-300 ग्राम चीनी, वंशलोचन का बारीक चूर्ण और घी मिला लें। इसके बाद इसमें शहद मिलाकर 50 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से बल और वीर्य बढ़ता है।
लगभग 25 ग्राम खस-खस के दाने, 25 ग्राम भुने चने, 25 ग्राम खांड और नारियल की पूरी गिरी को एक साथ कूटकर पीसकर रख लें। इस चूर्ण को रोजाना 70 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से शरीर में वीर्य और ताकत की बढ़ोत्तरी होती है।
लौंग, अकरकरा, कबाबचीनी, ऊदस्वालिस और बीजबंद को बराबर की मात्रा में लेकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद इस चूर्ण के वजन से 2 गुणा पुराना गुड़ लेकर लेकर इसमें मिला लें और छोटी-छोटी गोलियां बना लें। यह 1-1 गोली रोजाना सुबह और शाम दूध के साथ 21 दिनों तक लेने से शरीर में बल और वीर्य की वृद्धि होती है और संभोग करने की शक्ति तेज होती है।
25 ग्राम पिसी-छनी हुई मुलहठी, 25 ग्राम पिसी और छनी असगंध, और 12 ग्राम पिसा और छना हुआ बिधारा को एकसाथ मिलाकर शीशी में भर लें। सर्दी के मौसम में इसमें से 3 ग्राम चूर्ण को अच्छी तरह से घुटे हुए लगभग 0.12 ग्राम मकरध्वज के साथ मिला लें। इसके बाद इसे मिश्री मिले दूध के साथ रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीनों तक सेवन करने से संभोग शक्ति तेज होती है।
लगभग 25-25 ग्राम सफेद बूरा, ढाक की छाल का रस, गेंहू का मैदा और शुद्ध घी को एकसाथ मिलाकर हलवा बना लें। इस हलुए को रोजाना सुबह और शाम सेवन करने से शरीर मजबूत बनता है, धातु पुष्ट होती है और संभोग करते समय चरम सुख की प्राप्ति होती है।
10 ग्राम भैंस का घी और 10 ग्राम सितोपलादि चूर्ण को किसी कांच या मिट्टी के बर्तन में भरकर रख लें। फिर उसी बर्तन में गाय या भैंस का दूह लें तथा उस दूध को पी लें। रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीनों तक इस दूध का सेवन करने से हर प्रकार की कमजोरी दूर हो जाती है, धातु पुष्ट हो जाता है, बल-वीर्य की बढ़ोतरी होती है, स्तंभन शक्ति बढ़ती है और संभोग शक्ति में रुचि उत्पन्न होती है।
सफेद चीनी, ग्वारपाठे का गूदा, घी और गेंहू के मैदा को बराबर मात्रा में एकसाथ मिलाकर हलवा बनाकर खाने से 21 दिन में ही पुरुष की नपुंसकता दूर हो जाती है।
25-25 ग्राम केसर, पीपल, जायफल, जावित्री, अकरकरा, सोंठ, लोंग और लाल चंदन, 6 ग्राम शुद्ध हिंगुल, 6 ग्राम शुद्ध गंधक और 90 ग्राम अफीम को ले लें। इन सारी औषधियों को कूटकर और छानकर लगभग 20-20 ग्राम की मात्रा में रख लें। फिर सबको एकसाथ मिलाकर हिंगुल, गंधक और अफीम के साथ खरल में डालकर पानी मिलाकर घोट लें। इसके पूरी तरह से घुट जाने पर 0.36 ग्राम और 0.36 ग्राम की गोलियां बना लें। यह एक गोली रोजाना सोने से पहले खाकर ऊपर से दूध पीने से संभोग करने की शक्ति तेज होती है और स्तंभन शक्ति बढ़ती है।
सूखे बिदारीकंद को पीसकर उसमें ताजी बिदारीकंद के रस की 7 भावनाएं देकर उसमें मिश्री तथा शहद मिलाकर लगभग 20 ग्राम की मात्रा में नियमित रूप से 3 महीने तक सुबह के समय सेवन करने से बूढ़े लोग भी अपने शरीर में जवानों जैसी ताकत महसूस करते हैं।
लगभग 10-10 ग्राम जायफल, काला अनार, रुमी मस्तंगी, खस की जड़, बालछड़, दालचीनी, बबूल और शहद, 1 ग्राम कस्तूरी, 9 ग्राम सालममिश्री और 125 ग्राम मिश्री को एक साथ मिलाकर पीसकर छान लें। इस चूर्ण को 6 ग्राम की मात्रा में रोजाना सुबह और शाम 3-4 महीने तक सेवन करने से संभोग करने की शक्ति तेज हो जाती है।
तालमखाना, समुंद्रशोष, ढाक का गोंद, बीजबंद, बड़े गोखरू, तज और सफेद मूसली को एक साथ मिलाकर कूटकर और पीसकर छान लें। इसके बाद इस चूर्ण के बराबर ही इसमें पिसी हुई मिश्री मिलाकर रख लें। इस चूर्ण को रोजाना सुबह 6 ग्राम की मात्रा में फांककर उसके ऊपर से गाय का धार वाला ताजा दूध पीने से शरीर में ताकत और वीर्य की बढ़ोतरी होती है |

शनिवार, 7 नवंबर 2015

अफीम से उपचार:

अफीम से उपचार:

सामान्य परिचय : अफीम पोस्त के पौधे से प्राप्त की जाती है। इसके पौधे की ऊंचाई एक मीटर, तना हरा, सरल और स्निग्ध (चिकना), पत्ते आयताकार, पुष्प सफेद, बैंगनी या लाल, सुंदर कटोरीनुमा एवं चौथाई इंच व्यास वाले आकार में होते है। इसके फल, पुष्पों के झड़ने के तुरंत बाद ही लग जाते हैं, जो एक इंच व्यास के अनार के समान होते हैं। ये डोडा कहलाते हैं। बाद में ये अपने आप फट जाते हैं। अफीम फल का छिलका पोश्त कहलाता है। सफेद रंग के सूक्ष्म, गोल, मधुर और स्निग्ध दाने बीज के रूप में डोडे के अंदर होते हैं, जो आमतौर पर खसखस के नाम से जाने जाते हैं।
बाजार में अफीम घनाकार बर्फी के रूप में जमाकर बेची जाती है। नमी का असर होते ही अफीम मुलायम हो जाती है। इसका आंतरिक रंग गहरा बादामी और चमकीला होता है, जबकि बाहरी रंग कालिमा लिए गहरा भूरा होता है। इसमें विशिष्ट प्रकार की तीव्र गंध होती है, जो स्वाद में तीखी होती है। गर्म जल में घुल जाने वाली अफीम जलाने से न तो धुआं देती है और न राख ही शेष रहती है।
विभिन्न भाषाओं में नाम :
संस्कृत अहिफेन।
हिंदी अफीम, पोस्त, पोस्ता, अफीम का डोडा।
मराठी आफू, आफीमु।
गुजराती अफीण।
फारसी तियाग।
अरबी लब्नुल, खखास।
बंगाली आफिम।
अंग्रेजी ओपियुम, पोपी।
लैटिन पापवर सोम्नीफेरम।
रंग : अफीम का रंग काला होता है।
स्वाद : इसका स्वाद कडुवा होता है।
स्वरूप : दाना पोस्ता की हरी फली में सुई चुभोकर उसका दूध निकालते हैं जो पहले सफेद और जल्द ही लाल और जम जाने पर काला हो जाता है।
स्वभाव : अफीम गर्म प्रकृति की होती है।
हानिकारक : अफीम को अधिक मात्रा में सेवन करने से शरीर को सांवला कर देती है। लोग भ्रमवश अफीम का प्रयोग संभोग व सेक्स की ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं, जबकि हकीकत यह है कि अफीम खाने से कुछ दिन बाद मर्द नामर्द हो जाता है। संभोग शक्ति क्षीण हो जाती है।
दोषों को दूर करने वाला : भांग के बीज अफीम के दोषों को खत्म कर देती हैं।
खुराक (मात्रा): लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग।
गुण : आयुर्वेदिक मतानुसार : अफीम की प्रकृति गर्म, स्वाद में तीखा, प्रभाव में नशीला, कफ-वात शामक, पित्त प्रकोपक, नींद लाने वाली, दर्दनाशक, पसीना लाने वाली, शारीरिक स्रावों को रोकने वाली होती है।
यूनानी मतानुसार : अफीम मस्तिष्क की शक्ति को उत्तेजित करती है, शरीर की शक्ति व गर्मी को बढ़ाने से आनन्द और संतोष की अनुभूति प्रदान करती है। आदत पड़ने पर निर्भरता बढ़ाना, शारीरिक अंगों की पीड़ा दूर करने की प्रकृति, कामोत्तेजक, स्तम्भन शक्ति बढ़ाने वाली, आधासीसी, कमर दर्द, जोड़ों के दर्द, बहुमूत्र, मधुमेह, श्वास के रोग, अतिसार तथा खूनी दस्त में गुणकारी है।
विशेषज्ञों के मतानुसार : अफीम की रासायनिक संरचना का विश्लेषण करने पर मुख्य रूप से मार्फिन 5 से 31 प्रतिशत, जल 16 प्रतिशत, थोड़ी-सी मात्रा में कोडीन, थीबेन, नार्सीन, नार्कोटीन, पापावरीन, एपोमार्फिन, आक्सीडीमार्फ्रीन, एपोकोडीन, ओपियोनिन, मेकोनिन एसिड, दुग्धाम्ल, राल, ग्लूकोज, अमोनिया, उड़नशील तेल, मैग्नीशियम के लवण आदि तत्त्व पाए गए हैं। एलोपैथिक चिकित्सा में अफीम से प्राप्त मोर्फीन, कोडीन का सबसे अधिक उपयोग किया जाता है। अफीम का प्रभाव मुख्य रूप से मस्तिष्क और वात नाड़ियों के सुशुम्ना केन्द्र पर ज्यादा होता है। इससे पीड़ा कम होती है, नींद आती है, स्त्री-प्रसंग में वीर्य को रोक कर आनन्द देती है, वीर्यस्तम्भन होता है, उत्तेजना मिलती है, मादक असर (नशा) होता है और अधिक पसीना आता है।
दोष : अफीम का अधिक मात्रा में सेवन हानिकारक है और इससे मृत्यु तक हो सकती है।
निवारण : रीठे का जल, नीम का काढ़ा, मैनफल व तम्बाकू का काढ़ा, और करमयक शाक का रस निचोड़कर पिलाने से प्राण त्याग करता हुआ बीमार भी बच जाता है।

विभिन्न रोगों में अफीम से उपचार:

1 सिर दर्द: -आधा ग्राम अफीम और 1 ग्राम जायफल को दूध में मलकर, इस तैयार लेप को मस्तक पर लगाएं या फिर आधा ग्राम अफीम को 2 लौंग के चूर्ण के साथ हल्का गर्म करके खोपड़ी (सिर) पर लेप लगाने से सर्दी और बादी से उत्पन्न सिर दर्द दूर होगा।

2 गर्भस्राव (गर्भ से रक्त के बहने पर): -40 मिलीग्राम अफीम पिण्ड को खजूर के साथ मिलाकर दिन में गर्भस्राव से पीड़ित स्त्री को 3 बार खिलाएं। इससे गर्भस्राव शीघ्र रुकेगा।

3 स्वरदोष (गला खराब होने पर):-अजवायन और अफीम के डोडे समान मात्रा में पानी में उबाकर छान लें और फिर छाने हुए पानी से गरारे करने से स्वरदोष में आराम होगा।

4 कमर का दर्दं:-एक चम्मच पोस्त के दानों को समान मात्रा में मिश्री के साथ पीसकर एक कप दूध में मिलाकर दिन में 3 बार सेवन करने से लाभ होगा।

5 अतिसार (दस्त):-*आम की गिरी का चूर्ण 2 चम्मच, अफीम लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग मिलाकर एक चौथाई चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन कराएं।
*अफीम और केसर को समान मात्रा में लेकर पीस लें तथा लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोलियां बना लें। इसे शहद के साथ देने से अतिसार में लाभ होता है।
*अफीम को सेंककर खिलाने से दस्त में आराम मिलता है।
*लगभग 4 से 9 ग्राम तक पोस्त के डोडे पीसकर पिलाने से दस्त मिटता है।"

6 आमातिसार (आंवयुक्त पेचिश):-*भुनी हुई लहसुन की कली में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम मिलाकर खाने से इस रोग में राहत में मिलती है।
*5 ग्राम अफीम, मोचरस, बेलगिरी, इन्द्रजौ, गुलधावा, आम की गुठली की गिरी को 10-10 ग्राम लें। प्रत्येक औषधि को अलग-अलग पीसकर चूर्ण बना लें। फिर सबको एकत्रकर उसमें अफीम मिला लें। लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग चूर्ण को लस्सी के साथ सेवन करने से पेचिश के रोगी का रोग ठीक हो जाता है।"

7 उल्टी:-*कपूर, नौसादर और अफीम बराबर मात्रा में मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां शहद के साथ बना लें। दिन में 3 बार 1-1 गोली पानी के साथ लें।
*अफीम, नौसादर और कपूर को बराबर मात्रा में लेकर पीसकर रख लें। फिर इसके अंदर पानी डालकर मूंग के बराबर की छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इस 1-1 गोली को ठंडे पानी के साथ खाने से उल्टी और उबकाई आना बंद हो जाती है।"

8 अनिद्रा (नींद का कम आना):-गुड़ और पीपलामूल का चूर्ण बराबर की मात्रा में मिला लें। इसकी 1 चम्मच की मात्रा में अफीम की लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग मात्रा मिलाकर रात्रि में भोजन के बाद सेवन करने से लाभ होता है।

9 नपुंसकता लाने वाला: -कुछ लोग भ्रमवश अफीम का प्रयोग संभोग व सेक्स की ताकत बढ़ाने के लिए करते हैं, जबकि वास्तविकता यह है कि अफीम खाने से कुछ दिन व्यक्ति नामर्द हो जाता है और उसकी संभोग (सेक्स) शक्ति क्षीण हो जाती है।

10 मस्तक पीड़ा:-1 ग्राम अफीम और 2 लौंग को पीसकर लेप करने से बादी और सर्दी के कारण उत्पन्न मस्तक पीड़ा मिटती है।

11 आंखों के रोग: -आंख के दर्द और आंख के दूसरे रोगों में इसका लेप बहुत लाभकारी है।

12 नकसीर (नाक से खून आने पर):-अफीम और कुंदरू गोंद दोनों बराबर मात्रा में पानी के साथ पीसकर सूंघने से नकसीर बंद होती है।

13 केश (बाल): -अफीम के बीजों को दूध में पीसकर सिर पर लगाने से इसमें होने वाली फोड़े फुन्सियां एवं रूसी साफ हो जाती है।

14 दंतशूल (दांत का दर्द): -*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम और लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग नौसादर, दोनों को दांतों में रखने से दाड़ की पीड़ा मिटती है और दांत के छेद में रखने से दांतों का दर्द मिटता है।
*अफीम और नौसादर बराबर की मात्रा में मिलाकर कीड़ा लगे दांत के छेद में दबाकर रखने से दांत दर्द में राहत मिलती है।"

15 कान का दर्द: -*अफीम को ग्लिसरीन में मिलाकर बूंद-बूंद करके रोजाना हर 3-4 घंटे के बाद 2 बूंदे कान में डालने से कान का दर्द कम हो जाता है।
*अफीम की लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग भस्म को गुलाब के तेल में मिलाकर कान में टपकाने से पीड़ा मिटती है।
*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम को आग पर पका लें। फिर इसे गुलरोगन के साथ पीसकर कान में डालें। इससे सर्दी की वजह से कान में होने वाला दर्द ठीक हो जाता है।
*4 चावल भर अफीम के पत्तों की राख को गुलाब के तेल में मिलाकर कान में डालने से कान का दर्द दूर हो जाता है।"

16 खांसी: -*पोस्त के बीज सहित इसके 60 ग्राम डोडे का काढ़ा बना लें, उसमें 50 ग्राम बूरा मिलाकर शर्बत बनाकर पिलाने से नजला-जुकाम व खांसी मिटती है।
*पोस्त के डंठल अलग करके, इसके दो डोडे लें तथा इन्हें 2 ग्राम सेंधानमक के साथ 350 मिलीलीटर पानी में उबाल लें, जब 100 मिलीलीटर पानी शेष रह जाए तो छानकर सोते समय पिलाने से खांसी मिटती है।
*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम को मुनक्के में रखकर निगल लें। खांसी का दौरा शांत होकर नींद आ जाएगी।
*20 से 40 मिलीलीटर वन्यकान्हू के अफीम बीजों का काढ़ा रोजाना 3-4 बार सेवन करने से खांसी ठीक हो जाती है।
*1 से 2 ग्राम वन्यकान्हू की अफीम को सुबह-शाम सेवन करने से खांसी में लाभ मिलता है।
*क्षय (टी.बी.) रोग के रोगी को यदि खांसी के कारण नींद न आती हो तो शाम के समय लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम को मुनक्का में भरकर निगल लेने से रात में चैन की नींद आती है और खांसी भी बार-बार नहीं आती है।"

17 आमाशय की सूजन और दर्द: -आमाशय की झिल्ली की सूजन और पेट के दर्द में इसका लेप करने से आमाशय की सूजन और पेट के दर्द में बहुत लाभ मिलता है।

18 संग्रहणी (पेचिश): -अफीम और बछनाग 3-3 ग्राम, लौह भस्म 250 ग्राम और अभ्रक डेढ़ ग्राम इन चारों वस्तुओं को दूध में घोटकर लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की गोलियां बनाकर दूध के साथ प्रतिदिन सेवन करनी चाहिए। खाने में जल को त्याग करके केवल दूध का ही लेना चाहिए।

19 खुजली :-अफीम को तिल के तेल में मिलाकर मालिश करने से खुजली मिटती है।

20 जोंक के डंक मारने पर: -जोंक का डंक अगर पक जाए तो उस पर इसके दानों को पीसकर लेप करना चाहिए।

21 बुखार: -*अफीम एक डोडे और सात कालीमिर्चों को उबालकर सुबह-शाम पिलाने से चतुर्थिक (चार दिन के अंतर पर आने वाला बुखार) ज्वर मिटता है।
*अफीम तथा कपूर को एक साथ पीसकर देने से पुराना बुखार ठीक हो जाता है।"

22 नासूर: -मनुष्य के नाखून की राख में लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम मिला लें, फिर इसे आग पर पकाकर खाये। इससे नासूर में लाभ होता है।

23 गर्भाशय की पीड़ा:-प्रसव (बच्चे के जन्म देने) होने के पश्चात् गर्भाशय की पीड़ा मिटाने के लिए अफीम के डोडों का काढ़ा (इसका उबला हुआ पानी) पिलाना चाहिए।

24 श्वास रोग: -वनकान्हू की अफीम 1 से 2 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से श्वास में लाभकारी होता है।

25 काली खांसी: -एक ग्राम अफीम, 10 ग्राम मुलहठी का चूर्ण, 10 ग्राम बबूल का गोंद, 10 ग्राम निशासता को पीसकर मूंग के आकार की गोलियां बना लेते हैं। यह 1 से 2 वर्ष वाले को बच्चे को 1 गोली, 2 से 4 वर्ष वाले को 2 गोली तथा 4 से 8 वर्ष वाले को 3 गोली सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से काली खांसी, कुकर खांसी के रोग मे लाभ होता है। यदि कफ कड़ा हो तो प्रवाल भस्म लगभग 1 ग्राम का चौथाई भाग शहद से देना चाहिए। इससे खांसी के साथ बलगम निकलकर आराम आ जाता है।

26 दांतों में कीड़े लगना: -हींग एवं अफीम मिलाकर गोली बना लें। इन गोलियों को दांत के गड्ढ़े में रखने से कीड़े मर जाते हैं तथा दर्द में आराम मिलता है।

27 बंद जुकाम: -थोड़ी सी अफीम खाकर उसके ऊपर से गर्म दूध पीने से सर्दी का जुकाम दूर हो जाता है।

28 दस्त: -*एक ग्राम अफीम और एक ग्राम केसर को मिलाकर छोटी-छोटी गोलियां बना लें। इसके बाद एक-एक गोली दिन में 3 बार शहद के साथ खुराक के रूप में सेवन करने से अतिसार में लाभ होता है।
*अफीम और समुद्रफेन को मिलाकर खाने से दस्त का आना रुक जाता है। अफीम, मोचरस और धाय के फूल को मिलाकर चूर्ण बनाकर रख लें, फिर इस बने चूर्ण की 3 से 6 ग्राम मात्रा गाय के दूध से जमे दही में मिलाकर लेने से अतिसार में लाभ मिलता है।
*अफीम 3 ग्राम, अकरकरा 7 ग्राम, झाऊ के फूल 14 ग्राम, सामक 14 ग्राम, हुबुलास 14 ग्राम को लेकर अच्छी तरह पीसकर बबूल के गोंद के रस में मिलाकर छोटी-छोटी लगभग 3-3 ग्राम की गोलियां बनाकर रख लें। फिर इन बनी गोलियों को सेवन करने से दस्त का आना बंद हो जाता है। "

29 बवासीर (अर्श): -*अफीम तथा कुचला को पीसकर मलहम बनायें। मलहम को मस्सों पर लगाने से मस्से सूखते हैं और दर्द में आराम रहता है।
*बवासीर के मस्सों पर रसवंती तथा अफीम को पीसकर लेप करने से दर्द कम होता है तथा खून का बहना भी बंद हो जाता है।
*धतूरे के पत्तों के रस में अफीम मिलाकर लेप करने से दर्द जल्द ही बंद हो जाता है। "

30 वात रोग: -लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम खाने से गठिया के तेज दर्द में भी आराम हो जाता है।

31 नाक के रोग: -अफीम और कुंदरू के गोंद को बराबर मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को सूंघने से नाक से खून आना बंद हो जाता है।

32 वीर्य रोग : -अफीम लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग के घोल में एक मुठ्ठी चने भिगोकर सुबह-शाम अंकुरित होने पर 1-1 चना चबा लें। केवल 21 दिन तक यह प्रयोग करने से स्वप्नदोष (नाइटफाल) और धातु (वीर्य) कमी दूर होती है।

33 अंगुलियों का कांपना: -तिल के तेल में अफीम और आक के पत्ते मिलाकर गर्म करके लेप करने से हाथ-पैर की अंगुलियों का कम्पन दूर हो जाता है।

34 जोड़ों (गठिया) में दर्द: -*लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अफीम और लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग कपूर की गोली बनाकर खायें। इससे शरीर में पसीना अधिक मात्रा में आकर गठिया के दर्द में जल्दी लाभ मिलता होता है।
*4 ग्राम कपूर और एक ग्राम अफीम को पीसकर 20 गोलियां बनाकर छाया में सुखा लें। इसकी एक-एक गोली सुबह-शाम गर्म पानी से लें, इससे जोड़ों के दर्द में आराम मिलेगा।
*250 मिलीलीटर सरसों का तेल, 10 ग्राम अजवायन, 3 पुती लहसुन कुचली हुई दो लौंग का चूर्ण और चुटकी भर अफीम सबको मिलाकर आग पर अच्छी तरह पका लें। जब अजवायन, लहसुन आदि सभी जलकर काले पड़ जाएं, तो तेल को आग से नीचे उतारकर छान लें। इस तेल की मालिश सुबह-शाम प्रतिदिन जोड़ों पर करने से रोगी को लाभ मिलता है।"

35 हैजा: -कालीमिर्च, हींग और अफीम आदि को समान मात्रा में लेकर पीसकर रख लें। इसे लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग प्रत्येक 2 से 4 घण्टे पर रोगी को सेवन करायें। यह योग हैजा के प्रथम अवस्था में ही देने से रोग आगे नहीं बढ़ता और रोग ठीक हो जाता है।

36 हाथ-पैरों की ऐंठन: -*1.25 ग्राम अफीम या इतनी ही मात्रा में भांग का सेवन करने से हाथ-पैरो की ऐंठन दूर हो जाती है।
*अफीम का मैल, तेल में मिलाकर गर्म करके मालिश करने से हाथ-पैरों की ऐंठन दूर हो जाती है।"

37 मानसिक उन्माद (पागलपन): -अफीम को थोड़ी मात्रा में खिलाने से मानसिक उन्माद (पागलपन) और घबराहट दूर हो जाती है।

38 बालरोग: -अफीम, भुनी हुई हल्दी, भुना हुआ सुहागा को उबाले हुए पानी में मिलाकर घोल बना लें। इस घोल की 4 बूंद आंखों में डालने से सर्दी में आई हुई आंख का दर्द, आंखों का सूजना और लाल होना दूर हो जाता है।

39 वन्यकाहू के बीज: -वन्यकाहू के बीज के तेल से सिर में मालिश करने से बालों में बहुत लाभ होता है।

40 गले के रोग: -मूंग की दाल के दाने की आधी मात्रा के बराबर अफीम खाने से सर्दी लगने की वजह से बैठा हुआ गला खुल जाता है।

लवण भास्कर चूर्ण

लवण भास्कर चूर्ण
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इस योग को आचार्य भास्कर ने बनाया था।
ऊपर से नमक डालने के बजाय थोड़ी मात्रा में लवन भास्कर का उपयोग करे , ये आम , वात और कफ दोषों को दूर करेगा।
घटक द्रव्य-सेंधानमक,विडनमक,पीपल,पिपलामूल,तेजपात, काला जीरा,तालीस पत्र,नागकेशर, अम्लवेत,सौचल नमक,जीरा,काली मिर्च,सोंठ,समुद्री नमक,अनार दाना,बड़ी इलायची,दाल चीनी आदि।
यह खाना पचाने का एक जायकेदार योग है।यह एक निरापद योग है जो 1 से 3 ग्राम की मात्रा में लेने पर उदर संबंधी रोगों को अपने से दूर रखा जा सकता है।इसे लेने से लार और पाचक रस सही मात्रा में बनते है। यह योग वैसे छाछ या मट्ठे के साथ सर्वोत्तम लाभ प्रदान करता है किन्तु काँजी,दही का पानी या सामान्य गर्म जल के साथ भी लिया जा सकता है व इसके लाभ प्राप्त किये जा सकते हैं।रात को सोने से पहले गर्म पानी से लिया हुआ चूर्ण सुबह को साफ व खुलकर शौच लाता है और कब्ज से राहत प्रदान करता है।यह कफ को दूर करता है इसलिए सर्दी ज़ुकाम और सांस की बीमारियों में राहत देता है। त्वचा सम्बन्धी बीमारियों और आम वात की बीमारियाँ जैसे अर्थराइटिस में लाभकारी।
इस योग के प्रयोग से पेट की वायु,डकार आना तथा भूख न लगना आदि रोगों का शमन बड़ी ही आसानी से हो जाता है।यह पित्त को बढाए बिना अग्नि जठराग्नि यानी भूख को बढ़ाता है।
सावधानी -सामान्य नमक की तरह ही गुर्दे की बीमारियों और उच्च रक्तचाप पर इसे नहीं लेना चाहिए।गर्भवती स्त्रियों को भी इसे नहीं लेना चाहिए।

गुरुवार, 5 नवंबर 2015

आयुर्वेदिक चाय


आयुर्वेदिक चाय
लाभ-- इस पेय के सेवन से शरीर में स्फूर्ति व मस्तिष्क में शक्ति आती है । पाचनक्रिया में सुधार होता है और भूख बढ़ती है । सर्दी, बलगम, खांसी, दमा, श्वास, कफजन्य ज्वर और न्युमोनिया जैसे रोग होने की सम्भावना कम हो जाती है । इसे ओजस्वी चाय नाम दें तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी ।
सामग्री
(१) गुलबनपशा २५ ग्राम
(२) छाया में सुखाये हुए तुलसी के पत्ते २५ ग्राम
(३) तज २५ ग्राम
(४) छोटी इलायची १२ ग्राम
(५) सोंफ १२ ग्राम
(६) ब्राह्मी के सूखे पत्ते १२ ग्राम
(७) छिली हुई जेठीमधु १२ ग्राम
विधि-- उपर्युक्त प्रत्येक वस्तु को अलग-अलग कूटकर चूर्ण बना के मिश्रित कर लें । जब चाय-कॉफी पीने की आवश्यकता महसूस हो, तब मिश्रण में से ५-६ ग्राम चूर्ण लेकर ४०० ग्राम पानी में उबालें । जब आधा पानी बाकी रहे तब नीचे उतारकर छान लें । उसमें दूध-खांड मिलाकर धीरे-धीरे पियें । चीन जैसे देशों में तो आयुर्वेदिक चाय का प्रचलन बढ़ रहा है, फिर हमारे देशवासी चाय-कॉफी पीकर अपनी तबाही क्यों करें ?